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पश्चिम बंगाल में OBC पर बड़ा एक्शन, सुवेंदु सरकार ने 77 मुस्लिम समुदायों की मान्यता की खत्म, जानें किसे मिलेगा आरक्षण

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने OBC आरक्षण से जुड़े दो संशोधन विधेयक पारित किए हैं. नए कानून के तहत अब राज्य में केवल 66 जातियों (54 हिंदू और 12 मुस्लिम समुदाय) को OBC आरक्षण का लाभ मिलेगा, जबकि 77 मुस्लिम समुदायों को सूची से बाहर कर दिया गया है.

Image Source: IANS
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पश्चिम बंगाल की राजनीति और आरक्षण व्यवस्था में सोमवार को एक बड़ा बदलाव देखने को मिला. राज्य विधानसभा में OBC आरक्षण से जुड़े दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों को पारित कर दिया. इन विधेयकों के लागू होने के बाद राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण की पूरी कानूनी व्यवस्था नए ढांचे के तहत संचालित होगी. सरकार का कहना है कि यह फैसला कलकत्ता हाईकोर्ट के मई 2024 के आदेश का पालन करने और आरक्षण प्रक्रिया को कानूनी रूप से अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लिया गया है.

इन संशोधनों के बाद अब पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से बाहर केवल 66 जातियों को ही OBC आरक्षण का लाभ मिलेगा. सबसे बड़ी बात यह है कि पहले OBC सूची में शामिल 77 मुस्लिम समुदायों को नई सूची से बाहर कर दिया गया है. इस फैसले ने राज्य की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक और प्रशासनिक हलकों में भी नई चर्चा शुरू कर दी है.

अब किन समुदायों को मिलेगा OBC आरक्षण का लाभ?

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सरकार द्वारा पेश किए गए नए प्रावधानों के अनुसार अब केवल 66 समुदाय OBC आरक्षण के पात्र होंगे. इनमें 54 हिंदू और 12 मुस्लिम समुदाय शामिल हैं. पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने विधानसभा में 'पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) (संशोधन) विधेयक, 2026' तथा 'पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026' पेश किए. सदन में मतदान के बाद दोनों विधेयकों को मंजूरी मिल गई. सरकार का दावा है कि नई सूची सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर तैयार की गई है और इसमें कानूनी प्रक्रिया का पूरा पालन किया गया है.

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2012 में किए गए बदलावों को किया गया समाप्त

इन संशोधनों का सबसे बड़ा उद्देश्य वर्ष 2012 में तत्कालीन टीएमसी सरकार द्वारा किए गए बदलावों को समाप्त करना बताया गया है. पुराने कानून के तहत OBC श्रेणी A में 65 समुदाय और श्रेणी B में 78 समुदायों को शामिल किया गया था. इन समुदायों की सूची को कानून का हिस्सा बनाया गया था. नए संशोधन के तहत इस वैधानिक सूची को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है. अब OBC सूची को तय करने और उसमें बदलाव करने की प्रक्रिया पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों के आधार पर होगी. सरकार का कहना है कि इससे भविष्य में किसी भी प्रकार की कानूनी चुनौती की संभावना कम होगी.

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बीजेपी ने चुनावी वादा पूरा करने का किया दावा

बीजेपी लंबे समय से आरोप लगाती रही थी कि पिछली सरकार ने कई सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हिंदू समुदायों की अनदेखी करते हुए बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदायों को OBC का दर्जा दिया था. नई सरकार ने सत्ता में आने के बाद अपने चुनावी वादे के अनुसार इस व्यवस्था की समीक्षा की. मंत्री गौरीशंकर घोष ने विधानसभा में कहा कि सरकार ने 1993 की मूल OBC सूची को दोबारा लागू करने का फैसला किया है. उनका कहना था कि पिछली सरकार ने आयोग की उचित जांच प्रक्रिया का पालन किए बिना कई समुदायों को सूची में शामिल किया था, जिसकी वजह से बाद में पूरा मामला अदालत तक पहुंचा.

नए कानून में क्या हैं प्रमुख प्रावधान?

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संशोधित कानून के अनुसार अब राज्य सरकार OBC आरक्षण का प्रतिशत पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह के आधार पर तय करेगी. आवश्यकता पड़ने पर इसमें समय-समय पर बदलाव भी किया जा सकेगा. हालांकि कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी. सरकार को आयोग की सिफारिशों के आधार पर विभिन्न OBC समुदायों को उनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के स्तर के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में बांटने का अधिकार भी मिलेगा. इसके अलावा अब कोई भी व्यक्ति अपनी जाति को OBC सूची में शामिल करने के लिए आवेदन कर सकेगा. यदि किसी जाति को गलत तरीके से सूची में शामिल किया गया है या हटाया गया है, तो उसके खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने का भी प्रावधान रखा गया है. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी. आयोग के सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का रहेगा, जबकि सदस्य-सचिव का कार्यकाल राज्य सरकार तय करेगी.

हाईकोर्ट के फैसले के बाद बदली पूरी व्यवस्था

मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने वर्ष 2010 के बाद जारी किए गए सभी OBC प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था. अदालत ने कहा था कि राज्य सरकार ने OBC सूची में समुदायों को शामिल करने की प्रक्रिया में कानूनी नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया था. इसी फैसले के बाद राज्य सरकार ने नई कानूनी व्यवस्था तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की. सरकार का कहना है कि नए संशोधन हाईकोर्ट की आपत्तियों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं ताकि भविष्य में आरक्षण व्यवस्था पूरी तरह कानून के अनुरूप संचालित हो सके.

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विधानसभा में मतदान के दौरान क्या हुआ?

सरकार को उम्मीद थी कि दोनों विधेयक ध्वनि मत से पारित हो जाएंगे, लेकिन आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी ने डिवीजन के जरिए मतदान कराने की मांग की. विधानसभा अध्यक्ष ने यह मांग स्वीकार कर ली. मतदान के दौरान दोनों विधेयकों के पक्ष में 186 वोट पड़े, जबकि 17 विधायकों ने विरोध में मतदान किया. वहीं 6 सदस्य मतदान प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए. इसके साथ ही दोनों संशोधन विधेयक आधिकारिक रूप से विधानसभा से पारित हो गए.

बताते चलें कि इस फैसले को लेकर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल आरक्षण व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की सामाजिक और राजनीतिक दिशा पर भी इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है. वहीं दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है. ऐसे में आने वाले दिनों में इस विषय पर राजनीतिक बहस और कानूनी चर्चा दोनों तेज रहने की संभावना है.

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