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‘क्या वह अभी भी मंत्री हैं…’ बिहार में मंत्री की नियुक्ति पर ठनका CJI का माथा, सरकार और चुनाव आयोग से मांग लिया जवाब

RLM चीफ उपेंद्र कुशावाहा के बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. CJI ने बिहार सरकार से लेकर चुनाव आयोग तक को नोटिस भेजकर जवाब मांग लिया है.

Image Source- IANS
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न विधानसभा का चुनाव लड़ा, न MLC बनकर विधानसभा पहुंचे, फिर मंत्री कैसे बन गए? ये सवाल बिहार सरकार में मंत्री दीपक  से न केवल जनता पूछ रही है बल्कि देश की शीर्ष अदालत ने भी पूछ लिया. RLM चीफ उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश मंत्री पद पर बने हुए हैं, जब ये चीफ जस्टिस सूर्यकांत को पता चला तो उनका माथा भी ठनका. 

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर दोबारा नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है. ये नोटिस बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और चुनाव आयोग को भेजे गए हैं. सुनवाई के दौरान एक मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने पूछा- ‘क्या वह (दीपक प्रकाश) अभी मंत्री पद पर हैं.’

याचिका में किसे दी गई चुनौती? 

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सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका पर नोटिस जारी किए. इस याचिका में दीपक प्रकाश को बिना विधायक चुने बिहार का पंचायती राज मंत्री दोबारा बनाए जाने को चुनौती दी गई है.

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याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह का तर्क है कि दीपक प्रकाश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, इसलिए राज्य सरकार के मंत्रालय में कोई पद नहीं संभाल सकते. याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई व्यक्ति जो विधायक नहीं है, वह लगातार छह महीने तक मंत्री रह सकता है, लेकिन इस दौरान उसे राज्य विधानमंडल की सदस्यता हासिल करनी होगी. यह छूट सिर्फ एक बार मिलने वाला मौका है और सरकार बदलने पर इसे दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. 

6 महीने बाद भी पद पर बरकरार क्यों? 

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20 नवंबर 2025 को दीपक प्रकाश को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंत्री बनाया था, जबकि वे विधानसभा के सदस्य नहीं थे. 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार ने राज्यसभा की सदस्यता ले ली और उनकी मंत्रिपरिषद भंग हो गई. 

सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने और मंत्रिमंडल की तस्वीर बदली. नई सरकार ने दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री नियुक्त किया. 20 नवंबर 2025 को पहली नियुक्ति से दोबारा चुने जाने के लिए 6 महीने का समय 20 मई 2026 को खत्म हो गया था. यानी उन्होंने पहले ही किसी पद के लिए चुनाव लड़ा नहीं और दूसरी बार उन्हें फिर शपथ दिला दी गई. जिसके बाद कई सवाल उठने लगे.

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याचिकाकर्ता ने कहा कि ऐसे में दोबारा नियुक्ति करके उन्हें अतिरिक्त समय देने की कोशिश की गई है. उन्होंने यह भी तर्क है कि बिना चुने गए व्यक्तियों को बार-बार मंत्री पद पर नियुक्त करने की अनुमति देने से संसदीय लोकतंत्र, प्रतिनिधि सरकार, सामूहिक जिम्मेदारी और चुनावी जवाबदेही के सिद्धांतों को नुकसान पहुंचेगा. याचिकाकर्ता की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया. 

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