जिस पार्टी में 'ममता दीदी' का चलता था सिक्का... अब उसी TMC में अपने ही नेताओं ने खोल दिया मोर्चा, उठने लगी नेतृत्व बदलने की मांग
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद TMC में अंदरूनी असंतोष बढ़ता दिख रहा है. ममता बनर्जी के खिलाफ अब पार्टी के नेता खुलकर आवाज उठाने लगे हैं. पुराने सहयोगी तारक सिंह ने भी नेतृत्व बदलने की मांग कर दी है.
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय बड़ा उथल-पुथल देखने को मिल रहा है. विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है. जिस पार्टी में कभी ममता बनर्जी का फैसला अंतिम माना जाता था, अब उसी पार्टी के नेता उनके नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे हैं. हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि पार्टी के अंदरूनी मतभेद आने वाले दिनों में और गहरे हो सकते हैं.
पार्टी नेतृत्व पर उठने लगे सवाल
टीएमसी लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाए हुए थी. लेकिन हालिया चुनावी हार ने पार्टी की रणनीति और नेतृत्व दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे ज्यादा चर्चा उस समय शुरू हुई जब पार्टी के पुराने और भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले पार्षद तारक सिंह ने खुलकर ममता बनर्जी को नेतृत्व से हटाने की मांग कर दी.
तारक सिंह के बयान से मचा सियासी भूचाल
एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में तारक सिंह ने बिना किसी झिझक के कहा कि जो नेतृत्व असफल हो चुका है, उसे बदलना जरूरी है. जब उनसे साफ तौर पर पूछा गया कि क्या वह ममता बनर्जी की बात कर रहे हैं, तो उन्होंने खुलकर ‘हां’ कहा. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पार्टी से निकाले जाने का डर नहीं है. तारक सिंह के बयान ने बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है, क्योंकि वह ममता बनर्जी के चार दशक पुराने सहयोगी माने जाते हैं.
अभिषेक बनर्जी को लेकर भी दिखी नाराजगी
इतना ही नहीं, उन्होंने अभिषेक बनर्जी को लेकर भी नाराजगी जाहिर की. हालांकि उन्होंने सीधे अभिषेक पर हमला नहीं बोला, लेकिन यह जरूर कहा कि वह उस व्यक्ति के खिलाफ हैं जिसने अभिषेक को आगे बढ़ाया। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि यह बयान सीधे तौर पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना है.
शांतनु सेन के इस्तीफे ने बढ़ाई मुश्किलें
दूसरी तरफ, पूर्व राज्यसभा सांसद और टीएमसी नेता शांतनु सेन ने भी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर सियासी माहौल को और गर्म कर दिया है. अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि अब उनके लिए पार्टी का बचाव करना नैतिक रूप से सही नहीं लगता. उन्होंने माना कि कई बार उन्होंने अपनी अंतरात्मा के खिलाफ जाकर भी टीवी डिबेट और मीडिया मंचों पर पार्टी का पक्ष रखा, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. शांतनु सेन ने आरजी कर घटना, नौकरी घोटाले और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि जनता ने इन मामलों के कारण पार्टी को नकार दिया है. ऐसे में वह अब प्रवक्ता के रूप में इन बातों का समर्थन नहीं कर सकते. उनका यह बयान टीएमसी के लिए बड़ी परेशानी माना जा रहा है, क्योंकि इससे साफ संकेत मिल रहा है कि पार्टी के भीतर असहमति लगातार बढ़ रही है.
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बताते चलें कि टीएमसी की मौजूदा स्थिति को देखते हुए राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर जल्द ही पार्टी नेतृत्व ने नाराज नेताओं को मनाने की कोशिश नहीं की, तो टीएमसी को आने वाले समय में और बड़े झटके लग सकते हैं. फिलहाल बंगाल की राजनीति में हर किसी की नजर इस बात पर टिकी है कि ममता बनर्जी इन बगावती सुरों का जवाब किस तरह देती हैं.
जिस पार्टी को ममता दीदी ने खड़ा किया, आज उसी पार्टी में नेताओं का खुलकर विरोध करना दिखाता है कि अंदरूनी असंतोष काफी बढ़ चुका है। चुनाव में हार के बाद आत्ममंथन जरूरी होता है, लेकिन नेतृत्व बदलने की मांग बताती है कि TMC के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। अब देखना होगा कि पार्टी इसे लोकतांत्रिक चर्चा मानती है या फिर विरोध की आवाज़ों को दबाने की कोशिश करती है।
ye to hona hi tha