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जसपाल राणा का निधन: शूटिंग के ‘गोल्डन बॉय’ से लेकर खिलाड़ी और कोच तक, जानें बेमिसाल करियर के बड़े अचीवमेंट
जसपाल राणा को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए 1994 में अर्जुन पुरस्कार, 1997 में पद्मश्री और कोचिंग में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
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भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज और प्रतिष्ठित कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया. जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित प्रतियोगिता से लौटने के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. खिलाड़ी और कोच, दोनों भूमिकाओं में उन्होंने भारतीय निशानेबाजी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
उत्तराखंड में हुआ जसपाल राणा का जन्म
28 जून 1976 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मे जसपाल राणा को बचपन से ही निशानेबाजी में रुचि थी. जसपाल के पिता सेना के खुद पूर्व अधिकारी थे. ऐसे में पिता नारायण राणा ही उनके पहले कोच बने. 12 साल की उम्र में नेशनल लेवल पर जसपाल ने अपनी काबिलियत का परिचय दिया. 1988 में नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में जसपाल ने सिल्वर मेडल जीता. इसके बाद 1994 में जूनियर वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में भी उनका प्रदर्शन दमदार रहा और इटली में हुई इस चैंपियनशिप ने उन्हें विश्व स्तर पर पहचान दिलाने का काम किया.
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कॉमनवेल्थ खेलों में जसपाल राणा का रहा ऐतिहासिक प्रदर्शन
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जसपाल राणा ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया. हालांकि, वह ओलंपिक में पदक जीतने में सफल नहीं हो सके, लेकिन कॉमनवेल्थ खेलों में उनका प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा. उन्होंने चार कॉमनवेल्थ खेलों में हिस्सा लेते हुए कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण पदक शामिल हैं. 2002 के मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ खेलों में उन्होंने छह पदक अपने नाम किए.
2006 के दोहा एशियाई खेलों में जीते तीन स्वर्ण
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2006 के दोहा एशियाई खेलों में भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा, जहां उन्होंने तीन स्वर्ण और एक रजत पदक जीता. 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में 590 अंक हासिल कर उन्होंने विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की.
खिलाड़ी के रूप में सफलता हासिल करने के बाद जसपाल राणा ने कोच के रूप में भी अपनी अलग पहचान बनाई. उन्होंने अनेक युवा निशानेबाजों को प्रशिक्षित किया और भारतीय शूटिंग को नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली खिलाड़ी दिए. उनकी देखरेख में मनु भाकर ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय निशानेबाज बनीं. अनुशासन और तकनीकी दक्षता के लिए प्रसिद्ध जसपाल राणा ने कई विश्व स्तर के शूटर तैयार किए.
जसपाल राणा को मिले अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार
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जसपाल राणा को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए 1994 में अर्जुन पुरस्कार, 1997 में पद्मश्री और कोचिंग में उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने ऐसे समय में भारत में निशानेबाजी को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई, जब यह खेल सीमित दायरे तक ही सिमटा हुआ था.
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भारतीय निशानेबाजी में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा और उनका निधन खेल जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है. जसपाल के जाने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि शूटिंग के खेल में एक युग का अंत हो गया है.