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नई तकनीक और हाईटेक टेक्नोलॉजी का कमाल...अब देश में ही मिलेगा भरपूर तेल-गैस, भारत ने शुरू किया अपना महा-अभियान

भारत की तेल और गैस को लेकर दूसरे देशों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी. तेल और गैस के नए भंडार खोजने के लिए भारत का 'मेगाप्लान' शुरू हो गया है. अंडमान से लेकर कृष्णा-गोदावरी बेसिन तक नए मिशन की शुरुआत हो गई है.

सांकेतिक तस्वीर: Image Source: CANVA
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भारत कच्चे तेल और गैस का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक देश है. भारत अपनी करीब 60 से 70% ऊर्जा सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है. इस लिहाज से ना सिर्फ देश को अपनी दूसरी ज़रूरतों से समझौता करना पड़ता है, बल्कि क्रूड ऑयल और LPG के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है. पूर्ववर्ती सरकारों से लेकर मौजूदा मोदी सरकार तक ने इससे निपटने के लिए बहुत हद तक काम किया है, लेकिन अभी तक मनमाफिक सफलता नहीं मिल पाई है.

तेल और गैस की खोज के लिए भारत का मास्टरस्ट्रोक

इसी सिलसिले में सरकार अब तेल और गैस के लिए खोजी अभियान को तेज़ करने जा रही है. सूत्रों के मुताबिक, सरकार इसको लेकर बड़े पैमाने पर समंदर की गहराई में छिपे तेल और गैस को खोजने के लिए सर्वे कराने जा रही है. सरकार के इस मेगाप्लान को विशेषज्ञ समय की जरूरत बता रहे हैं. सरकार इस दिशा में ना सिर्फ हाई-टेक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने जा रही है, बल्कि नियामक और बजटीय समस्याएं भी दूर कर रही है. ‘मिशन एनर्जी फ्रीडम’ के तहत जल से लेकर जमीन तक में एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग टेक्नोलॉजी (Advanced Seismic Imaging Technology) के जरिए समुद्र के नीचे छिपे बड़े हाइड्रोकार्बन भंडार तलाशने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.

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अंडमान सागर में प्राकृतिक गैस मिलने के बाद सरकार पूर्वी तट पर ऐसी ही संभावनाएं तलाश रही है. अगर इसमें सफलता मिलती है, तो भारत की ऊर्जा की तस्वीर ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा ही बदल जाएगी.

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आपको बता दें कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है. बढ़ती जनसंख्या और खपत के कारण ना सिर्फ ऊर्जा के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता है, बल्कि दुनिया में कहीं भी कुछ भी हो जाए, उसका असर भारत पर पड़ता ही है. मसलन रूस-यूक्रेन युद्ध, रूस पर सैंक्शन (प्रतिबंध), ईरान पर प्रतिबंध, खाड़ी में जंग, वेनेजुएला में संकट… यानी कि आपके पास पैसे होना ही काफी नहीं है, बल्कि आपको इन सब चुनौतियों से जूझना भी पड़ेगा. ऐसे में अगर देश के पास घरेलू विकल्प उपलब्ध ना हों, तो स्थिति और विकट हो जाती है. मौजूदा चुनौतियों और देश में उत्पन्न हुई LPG और तेल को लेकर समस्या ने सरकार को गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया है कि देश के भीतर ही ऐसे बड़े भंडार खोजे जाएं. जैसे भारत के पास यूरेनियम की समस्या थी, तो भारत ने देश में भारी पैमाने पर मौजूद थोरियम के भंडार को ना सिर्फ खोजा बल्कि उसका इस्तेमाल करना शुरू किया, जिससे कि यूरेनियम के आयात में भी कमी आने की संभावना है.

अंडमान के बाद भारत की ऊर्जा उम्मीदों को लगे पंख!

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इसी कड़ी में सरकार महानदी, बंगाल-पूर्णिया, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिन जैसे क्षेत्रों में बड़े स्तर पर सर्वे शुरू करने जा रही है. News 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, माना जा रहा है कि इन इलाकों में भारी मात्रा में तेल और गैस छिपी हो सकती है. खबर के मुताबिक, इन इलाकों में पहले भी हाइड्रोकार्बन के संकेत मिल चुके हैं. इसी कारण अब नई और उन्नत तकनीकों के जरिए फिर से गहराई में जांच की जाएगी ताकि महज टेक्नोलॉजी की कमी के कारण इतनी बड़ी पूंजी जमीन-तल में दबी ना रह जाए. इसी कारण इस बार सिस्मिक सर्वे का इस्तेमाल किया जा रहा है. आपको बता दें कि सिस्मिक सर्वे में समुद्र के नीचे साउंड वेव (ध्वनि तरंगें) भेजी जाती हैं. ये चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं. वैज्ञानिक इस डेटा को पढ़कर पता लगाते हैं कि जमीन के नीचे तेल या गैस फंसी हुई है या नहीं.

क्या नया है इस बार के सर्वे में?

आपको बता दें कि सरकार पिछले और पुराने तरीकों के भरोसे नहीं बैठ रही है. इसके लिए एडवांस टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जा रहा है. इसके जरिए समुद्र के नीचे कई किलोमीटर तक की गहराई की स्पष्ट तस्वीर बनाई जाएगी. इसके लिए सर्वेक्षण वाले जहाज समुद्र के अंदर तक लंबी केबल यानी स्ट्रीमर छोड़ेंगे. ये उपकरण साउंड वेव के जरिए नीचे मौजूद चट्टानों से लौटने वाली गूंज रिकॉर्ड करेंगे. इसके बाद वैज्ञानिक इस डेटा को प्रोसेस करके पता लगाएंगे कि कहां तेल और गैस फंसी हो सकती है. दुनिया की बड़ी से बड़ी तेल कंपनियां और देश इसी स्ट्रीमर और साउंड वेव सेंसिंग का इस्तेमाल कर ऑफशोर तेल क्षेत्रों की खोज करते हैं.

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कृष्णा-गोदावरी बेसिन से भारत की बड़ी उम्मीदें

भारत अंडमान के बाद अब सबसे बड़ा दांव कृष्णा-गोदावरी यानी KG बेसिन पर लगाने जा रहा है. यह क्षेत्र पहले से ही देश का प्रमुख गैस उत्पादन केंद्र रहा है, जहां पर पहले से ही कई बड़े गैस फील्ड मौजूद हैं, लेकिन सरकार का मानना है कि एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग से यहां और गहरे हिस्सों में नए भंडार तलाशे जा सकते हैं. KG बेसिन में गैस हाइड्रेट्स, डीप वॉटर रिजर्वायर और जटिल पेट्रोलियम सिस्टम मौजूद हैं. अगर यहां नई खोज होती है, तो यह भारत की गैस सप्लाई में गेमचेंजर साबित हो सकता है.

36 महीने तक सर्वे, दुनियाभर की कंपनियां शामिल

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इसके लिए सरकार ने दुनियाभर की जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएं मंगवाई हैं ताकि पुराने और पहले से मौजूद सिस्मिक डेटा को दोबारा प्रोसेस किया जा सके और नए ब्रॉडबैंड 3D सर्वे किए जा सकें. करीब 36 महीने तक चलने वाले इस मिशन में समुद्र के नीचे की चट्टानों और संरचनाओं का हाई-टेक नक्शा तैयार किया जाएगा. विशेषज्ञों की मानें तो इससे उन अनएक्सप्लोर्ड (Unexplored) क्षेत्रों की पहचान हो सकेगी जिन्हें पहले किसी ना किसी वजह से नजरअंदाज कर दिया गया था. आपको बता दें कि इससे ना सिर्फ देश के ऊपर से आयात का बोझ कम होगा, बल्कि मुद्रा भंडार की भी बचत होगी जिससे कि रुपया मजबूत होगा और पैसा देश के विकास में लगेगा.

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