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आजादी के 8 दशक बाद हर कोई जश्न में डूबा, भारत के इन 4 गांव में पहली बार फहराया गया तिरंगा, ग्रामीणों के लिए सबसे भावुक पल

79वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत के उत्तर महाराष्ट्र के एक जिले के 4 गांव में पहली बार तिरंगा फहराया गया. यह पूरा कार्यक्रम एक एनजीओ के कार्यकर्ताओं और 30 बच्चों के द्वारा सम्पन्न हुआ.

आजादी के 8 दशक बाद हर कोई जश्न में डूबा, भारत के इन 4 गांव में पहली बार फहराया गया तिरंगा, ग्रामीणों के लिए सबसे भावुक पल
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देशवासियों ने बीते 15 अगस्त को 79वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाया. आजादी के इस खास मौके पर गांव, शहर, कस्बा और हर एक जगह तिरंगे के रंग में रंग सा गया, लेकिन देश में 4 ऐसे भी गांव थे, जहां पिछले 8 दशक से कभी तिरंगा नहीं फहराया गया था, यह कहानी उत्तर महाराष्ट्र के नंदुबार जिले के आदिवासी गांव उदाड्या की है. हैरानी की बात यह है कि इन गांवों में अभी तक लाइट नहीं पहुंचा है.

8 दशक में पहली बार फहराया तिरंगा

बता दें कि उत्तर महाराष्ट्र के सतपुड़ा की घनी पहाड़ियों के बीच बसे आदिवासियों के इन गांव में आज तक न तो कभी बिजली पहुंचा और न ही मोबाइल नेटवर्क है. हालांकि, कभी-कभार नेटवर्क मोबाइल में दिख जाता है, लेकिन एक एनजीओ ने अपने कार्यकर्ताओं की मदद से 30 बच्चों संग आजादी के जश्न में पहली बार तिरंगा फहराया. 

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एनजीओ के संस्थापक ने क्या कहा? 

जिस एनजीओ के जरिए यह कार्यक्रम पहली बार संपन्न हुआ. उसके संस्थापक संदीप देओरे ने कहा कि 'यह इलाका प्राकृतिक सुंदरता, उपजाऊ मिट्टी और नर्मदा नदी से समृद्ध है. लेकिन पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां तक पहुंचने में कई तरह की परेशानी होती है. यहां सिर्फ झंडा फहराना मकसद नहीं था, बल्कि स्थानीय लोगों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में बताना था.'

'यहां के आदिवासी बहुत आत्मनिर्भर जीवन जीते हैं'

संदीप देओरे ने यह भी कहा कि 'यहां के आदिवासी बहुत आत्मनिर्भर जीवन जीते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वह सभी हमारे संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को जानते हों. यहां के मजदूर जब भी बाहर मजदूरी करने के लिए जाते हैं, तो फिर रोजमर्रा के मजदूरों को लेन-देन में अक्सर शोषण किया जाता है, उन्हें लूटा जाता है.'

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'लोगों का विश्वास जितना काफी कठिन था'

देओरे ने यह भी बताया कि 'शुरुआत में लोगों का विश्वास जीतना काफी कठिन था, लेकिन जब वह इस काम के उद्देश्य को समझ गए, तो उनका सहयोग आसान हो गया. हम अपने एनजीओ, शिक्षकों के वेतन और स्कूलों के बुनियादी ढांचे की व्यवस्था के लिए दान पर ही निर्भर हैं. लेकिन इस स्कूल में सरकारी स्कूलों की तरह मध्याह्न भोजन योजना लागू नहीं की जा सकती, क्योंकि यह अनौपचारिक है.' 

'दूसरे इलाकों में पहुंचने के लिए लोग घंटों पैदल चलते हैं'

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इस गांव के एक निवासी भुवान सिंह पावरा ने बताया कि 'गांव के लोग दूसरे इलाकों तक पहुंचने के लिए या तो कई घंटे पैदल चलते हैं या फिर वह नर्मदा नदी में संचालित नौका का प्रयोग करते हैं. यहां एनजीओ का स्कूल उनकी जमीन पर चलता है. शिक्षा की यहां बहुत कमी है, यह सबसे बड़ी समस्या है. हम नहीं चाहते कि हमारी अगली पीढ़ी भी इसी तकलीफ से गुजरे. हम सभी सोलर पैनल पर ही निर्भर हैं. अभी तक हमारे इन गांव में बिजली नहीं पहुंची है. इन गांवों के लोग पावरी बोली बोलते हैं, यह सामान्य मराठी या हिंदी से काफी ज्यादा अलग है, जिसकी वजह से बाहरी लोगों से बातचीत करना काफी ज्यादा मुश्किल होता है.'

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