Advertisement

सोमालिया से टूटकर अलग देश बना, इजरायल ने भी दे दी मान्यता, आखिर क्या है सोमालीलैंड का मुद्दा, जिससे बढ़ी वैश्विक हलचल?

सोमालीलैंड चाहता है कि दुनिया उसे एक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार करे. कुछ देश इस पर विचार कर रहे हैं, जिससे भू-राजनीतिक बहस तेज हो गई है. वहीं इजरायल ने इस मुस्लिम देश को मान्यता देकर वैश्विक हलचल बढ़ा दी है.

Author
01 Jan 2026
( Updated: 01 Jan 2026
09:00 PM )
सोमालिया से टूटकर अलग देश बना, इजरायल ने भी दे दी मान्यता, आखिर क्या है सोमालीलैंड का मुद्दा, जिससे बढ़ी वैश्विक हलचल?

सोमालीलैंड अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में स्थित है. सोमालीलैंड काफी लंबे समय से खुद को एक स्वतंत्र देश मानता रहा है. हालांकि, इजरायल के अलावा दुनिया के किसी भी देश ने इसे एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है. सोमालीलैंड के एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आने से पहले इसका एक लंबा इतिहास रहा है. ऐसा पहली बार नहीं है जब सोमालीलैंड का मुद्दा चर्चा में आया और वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा हो गई. इससे पहले भी ऐसा हो चुका है. 

सोमालीलैंड पहले ब्रिटिश सोमालीलैंड था, जो 1960 में आजाद हुआ. इसके बाद यह इतालवी सोमालीलैंड के साथ मिल गया और सोमालिया बना. हालांकि, 1991 में सोमालिया में गृहयुद्ध छिड़ गया और देश अराजकता की स्थिति में डूब गया. तभी सोमालीलैंड अस्तित्व में आया. हालांकि, सोमालिया आज भी यही कह रहा है कि सोमालीलैंड उसका अभिन्न हिस्सा है.

क्या है सोमालीलैंड का भूगोल?

सोमालीलैंड चाहता है कि दुनिया उसे एक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार करे. कुछ देश इस पर विचार कर रहे हैं, जिससे भू-राजनीतिक बहस तेज हो गई है. सोमालीलैंड रेड सी (लाल सागर) और अदन की खाड़ी के पास स्थित है, जो वैश्विक व्यापार और सैन्य रणनीति के लिहाज से बेहद अहम इलाका है. लाल सागर के पास स्थित होने की वजह से अमेरिका और इजरायल जैसे देशों की दिलचस्पी इसमें काफी ज्यादा है. वहीं मुस्लिम देश नहीं चाहते कि इसे एक अलग देश के रूप में मान्यता मिले.

कैसे सोमालिया से अलग हो गया सोमालीलैंड?

सोमालीलैंड ने बीते तीन दशकों में अपना अलग प्रशासन, संसद, संविधान, चुनावी व्यवस्था, मुद्रा और सुरक्षा तंत्र विकसित कर लिया है. सोमालीलैंड में सोमालिया की तुलना में ज्यादा शांति है. सोमालिया अल-शबाब जैसे आतंकी संगठनों की हिंसा से जूझता रहा है. इसी वजह से सोमालीलैंड खुद को “डी-फैक्टो स्टेट” यानी व्यवहार में एक देश मानता है.

सोमालीलैंड पर क्या है भारत का रुख?

भारत समेत अधिकांश देश सोमालिया की संप्रभुता और एकता का समर्थन करते हैं और सोमालीलैंड को अलग देश के रूप में मान्यता नहीं देते. भारत अफ्रीकी संघ की नीति के अनुरूप संतुलित रुख अपनाता रहा है. सोमालीलैंड को एक देश के रूप में मान्यता देने के पीछे इजरायल की अपनी रणनीति है. दरअसल, लाल सागर और अदन की खाड़ी के करीब स्थित सोमालीलैंड का समर्थन कर इजरायल हूती विद्रोहियों की गतिविधियों पर नजर रखना चाहता है.

इजरायल ने क्यों दी सोमालीलैंड को मान्यता?

इजरायल लंबे समय से मिडिल ईस्ट और अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंध सुधारने की कोशिश में लगा है. हालांकि, गाजा में उसके युद्ध ने इस रास्ते को और भी कठिन बना दिया. सोमालीलैंड को मान्यता देने के बाद इजरायल अमेरिका के समर्थन का इंतजार कर रहा है. इजरायल लाल सागर में अपनी पैठ बनाना चाहता है, और इसके लिए सोमालीलैंड एक सहयोगी के तौर पर उसकी मदद कर सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल का सोमालीलैंड को मान्यता देना लाल सागर में भू-राजनीति के आयाम को बदल सकता है. सोमालीलैंड के जरिए इजरायल को बेरबेरा पोर्ट तक डायरेक्ट पहुंच मिल सकती है. ऐसे में लाल सागर में हूतियों के खतरे के बीच ईरानी प्रभाव को कम करने और सुरक्षा बढ़ाने में मजबूती मिल सकती है.

सोमालिया के उत्तर-पश्चिमी हिस्से पर सोमालीलैंड का नियंत्रण है. इसकी सीमा उत्तर-पश्चिम में जिबूती और पश्चिम और दक्षिण में इथियोपिया से लगती है. यमन के सामने लाल सागर के तट पर बसा यह इलाका इजरायल के लिए खास अहमियत रखता है.

अब क्या होने वाला है?

अमेरिका का समर्थन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी वाले किसी भी कदम के लिए जरूरी है. इस बीच इजरायल और सोमालीलैंड ने ऐलान किया कि उनके रिश्ते अब्राहम समझौते की भावना के हिसाब से बन रहे हैं. इजरायल के अलावा सोमालीलैंड का सिर्फ ताइवान के साथ आधिकारिक संबंध है. 

बता दें कि ताइवान को भी अब तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं मिली है. हालांकि, सोमालीलैंड संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी अच्छे और मजबूत संबंध रखता है. यूएई, बेरबेरा पोर्ट में एक सैन्य बेस भी ऑपरेट करता है, जिसमें एक नेवल पोर्ट और फाइटर जेट और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के लिए एक एयरस्ट्रिप शामिल है.

यह भी पढ़ें

रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों का मानना है कि यह बेस यमन में सना के खिलाफ यूएई के नेतृत्व में चलाए जा रहे अभियान में अहम भूमिका निभाता है. वहीं इथियोपिया ने इस साल की शुरुआत में लाल सागर तक पहुंच पाने के लिए एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर किया था, लेकिन पड़ोसी देशों के दबाव में इस एग्रीमेंट को रोक दिया गया था.

Tags

Advertisement

टिप्पणियाँ 0

LIVE
Advertisement
Podcast video
'हरे सांपों को निकाल फेंको, भारत का मुसलमान भारत के लिए वफ़ादार नहीं' ! Harshu Thakur
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें