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पासपोर्ट भी नहीं भारतीय होने का सबूत, फिर क्या है देश के नागरिक होने का ‘आधार’? ऐसे समझें
सच तो यह है कि भारत में ऐसा कोई भी एक यूनिवर्सल या एक ऐसा दस्तावेज नहीं है जो भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण हो. ऐसे में सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई.
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25 जून बुधवार को विदेश मंत्रालय की ओर से एक बयान जारी किया गया. जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट सिर्फ यात्रा का दस्तावेज है न कि देश की नागरिकता का प्रमाण. सरकार के इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर एक सवाल खूब पूछा जा रहा है कि आखिर फिर नागरकिता का प्रमाण क्या है?
आम लोगों से लेकर खास तक, सेलिब्रिटी भी ये ही पूछ रहे हैं, लेकिन इस सवाल का कोई साफ-साफ जवाब नहीं मिल सका है. देश के किन दस्तावेजों को नागरिकता का प्रमाण माना जाए. चलिए इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश करते हैं.
सबसे पहले जानें- विदेश मंत्रालय ने क्या कहा था?
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विदेश मंत्रालय ने 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर एक ब्रीफिंग की थी. जिसमें साफ कहा था कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है. पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है. इसका प्राथमिक मकसद नागरिकों को अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करने की इजाजत देना है. इसके साथ ही पासपोर्ट विदेशों में नागरिकों की पहचान और राष्ट्रीयता को स्थापित करना है.
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विदेश मंत्रालय के मुताबिक, पासपोर्ट विदेश में तो आपकी पहचान बताता है, लेकिन यह अपने आप में नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है.
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 का हवाला दिया. इसके तहत केंद्र सरकार अगर केंद्र सरकार को जरूरी लगे तो वह सार्वजनिक हित में किसी गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है. ऐसी परिस्थिति और कानूनी प्रक्रिया को देखते हुए ही भारत सरकार पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं मान सकती.
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विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारतीय नागरिकता का निर्धारण कानूनी रूप से नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत होता है, पासपोर्ट अधिनियम के तहत पासपोर्ट से जुड़ा मामला है.
अब सवाल ये उठता है कि अगर पासपोर्ट विदेश में राष्ट्रीयता को साबित करता है तो देश की नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं माना जाता?
दरअसल, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के तहत, केंद्र सरकार के पास यह विशेष अधिकार है कि वह सार्वजनिक हित में गैर भारतीय को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है. इसलिए पासपोर्ट का होना नागरिकता का अचूक और अंतिम पैमाना या प्रमाण नहीं हो सकता. यानी कि विदेश में तो यह दस्तावेज राष्ट्रीयता साबित कर सकता है लेकिन देश में किसी की नागरिकता पर सवाल उठे और मामला कानूनी दांव-पेंच तक उलझ जाए तो ऐसी परिस्थिति पासपोर्ट नागरिकता का फैसला करने का आधार नहीं हो सकता. न ही नागरिकता इससे साबित की जा सकते.
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विदेश मंत्रालय का कहना है कि पासपोर्ट नागरकिता ने नहीं बल्कि यात्रा और यात्री की मान्यता से जुड़ा है. जो भारत में किसी शख्स की नागरिकता का प्रमाण साबित करने के लिए मुख्य दस्तावेज नहीं है.
इसकी वजह उस नागरिक का रिकॉर्ड भी है. जैसे अगर कोई शख्स गलत जानकारी देकर या धोखे से भारत का पासपोर्ट हासिल कर लेता है और बाद में वह आपराधिक दायरे में आता है तो पासपोर्ट उसे भारत का नागरिक नहीं साबित कर सकता.
भारत में कैसे साबित होगी नागरिकता?
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भारत में नागरिकता पाने की एक पूरी प्रक्रिया है. यहां नागरिकता सिर्फ जन्म, वंश, पंजीकरण, लंबी अवधि तक भारत में रहने के बाद या किसी क्षेत्र के भारत में शामिल होने के आधार पर मिल सकती है. अदालतों का कहना है कि नागरिकता केवल किसी एक दस्तावेज के होने से नहीं, बल्कि इन कानूनी योग्यताओं के आधार पर तय होती है. भारत में तीन तरह से नागरिकता साबित हो सकती है,
26 जून 1950 से एक जुलाई के बीच जन्में लोगों के लिए सिर्फ जन्म प्रमाण पत्र या जन्म के सबूत
एक जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच भारत में जन्म और माता-पिता में से एक का भारतीय होना जरूरी
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3 दिसंबर 2004 के बाद वालों के लिए भारत में जन्म, माता-पिता में से एक का भारतीय होना और एक का भी अवैध प्रवासी न होना जरूरी है.
अब सवाल ये है कि भारत में पैन कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, रेंट एग्रीमेंट जैसे न जाने कितने दस्तावेज हैं, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इनमें से किसे भारतीय नागरिकता के लिए वैध दस्तावेज माना जाए.
सच तो यह है कि भारत में ऐसा कोई भी एक यूनिवर्सल या एक ऐसा दस्तावेज नहीं है जो भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण हो. केंद्र सरकार के अनुसार, भारत की नागरिकता इस बात पर निर्भर करती है कि आपने इसे कैसे हासिल किया है और आपका जन्म कब और कहां हुआ है.?
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हालांकि विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारतीय पासपोर्ट को कभी भी नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना गया है. यह कानूनी स्थिति नई नहीं है, बल्कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 लागू होने के समय से ही मौजूद है.
विदेश मंत्रालय ने इस संदर्भ में बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के फैसले का भी उल्लेख किया. अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि केवल पासपोर्ट का होना भारतीय नागरिकता साबित नहीं करता. अदालत के अनुसार नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा.
विदेश मंत्रालय के बयान पर प्रतिक्रिया
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इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं. सुप्रीम कोर्ट के वकील और सपा नेता कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो आम नागरिक किस दस्तावेज पर भरोसा करें, वहीं गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने भी सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी करने से पहले संबंधित व्यक्ति की राष्ट्रीयता की जांच की जाती है.
असम ने NRC में नागरिकता का कौनसा मॉडल अपनाया?
नागरिकता साबित करने के लिए पुराने या विरासती दस्तावेजों को भी सबूत माना जाता है. असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (NRC) बनाने के दौरान हुआ. इनमें पुराने भूमि रिकॉर्ड, पैतृक संपत्ति के कागजात, पुरानी मतदाता सूचियां, और पुराने स्कूल प्रमाण पत्र शामिल हैं, जो समय के साथ भारत में निवास के साथ-साथ पीढ़ियों के रिलेशन को साबित करते हैं.
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वहीं, आधार, पैन, वोटर आईडी कार्ड भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकती. कोर्ट और केंद्र सरकार ने कई बार साफ किया कि ये दस्तावेज नागरिकता के निर्णायक प्रमाण नहीं हैं. इन दस्तावेजों को कुछ खास मकसदों और सेवाओं के लिए जारी किया जाता है. वैसे कानूनी रूप से नागरिकता का सबसे निर्णायक प्रमाण गृह मंत्रालय की तरफ से जारी किया गया पंजीकरण प्रमाणपत्र या प्राकृतिककरण प्रमाणपत्र होता है. हालांकि, ये प्रमाणपत्र आमतौर पर उन लोगों को जारी किए जाते हैं, जिन्होंने विदेशी मूल का होने के बाद कानूनी प्रक्रिया से भारत की नागरिकता ली हो.