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'बांग्ला भाषी तो हैं बस बहाना, मकसद है बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाना...', असम सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने TMC के आरोपों का दिया जवाब

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने कहा कि राज्य में एक धर्म विशेष के लोगों की अवैध घुसपैठ के कारण स्वदेशी और मूल असमिया लोग खतरे की भावना महसूस कर रहे हैं और असम की जनसंख्या संरचना (डेमोग्राफी) तेजी से बदल रही है. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस द्वारा लगाए गए बांग्ला भाषियों के खिलाफ अभियान चलाने के आरोपों को खारिज करते हुए इसे बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाने की एक राजनीतिक साजिश बताया.

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16 Jul 2025
( Updated: 05 Dec 2025
08:55 PM )
'बांग्ला भाषी तो हैं बस बहाना, मकसद है बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाना...', असम सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने TMC के आरोपों का दिया जवाब
Himanta Biswa Sarma (File Photo)
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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने राज्य में हो रही अवैध घुसपैठ को लेकर गंभीर चिंता जताई है. उनका कहना है कि राज्य के पारंपरिक और मूल निवासी अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि एक खास धर्म से जुड़े लोगों की लगातार हो रही घुसपैठ से डेमोग्राफी (जनसंख्यकीय संतुलन) बदल रही है.

‘बांग्लादेशी घुसपैठ से ध्यान भटकाने की साजिश’

मुख्यमंत्री सरमा ने यह भी स्पष्ट किया कि असम सरकार की घुसपैठ के खिलाफ चल रही कार्रवाई किसी भाषा या समुदाय के खिलाफ नहीं है. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि बांग्ला भाषियों को निशाना बनाया जा रहा है. सरमा ने आरोप लगाया कि ऐसे बयान देकर असली मुद्दे यानी कि बांग्लादेशी घुसपैठ से ध्यान भटकाने की कोशिश हो रही है.

सरमा का यह बयान ऐसे समय में आया है जब असम में जनसंख्या, पहचान और संसाधनों पर कब्जे को लेकर बहस तेज होती जा रही है. उन्होंने दोहराया कि राज्य सरकार केवल अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, न कि किसी वैध नागरिक या भाषा-समुदाय के.

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‘बांग्लादेशी मुस्लिमों पर कार्रवाई को बंगालियों से जोड़ रही TMC’

असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने मंगलवार को आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस उनकी सरकार द्वारा अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों पर लिए गए कठोर रुख को जानबूझकर बंगाल-विरोधी के रूप में प्रचारित कर रही है. उनका यह रवैया महज बांग्लादेश से आए गैरकानूनी मुस्लिम घुसपैठियों को संरक्षण देने की एक हताश कोशिश है.

मंगलवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी सरकार की अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को तृणमूल जानबूझकर बंगाली विरोधी बताकर पेश कर रही है. उन्होंने इस रणनीति को बांग्लादेश से आए अवैध मुस्लिम घुसपैठियों को बचाने की एक नाकाम और निराशाजनक कोशिश करार दिया.

‘घुसपैठियों को बचाने की कोशिश’
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि उनकी मीडिया में की गई टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है, ताकि उनकी सरकार के अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों के खिलाफ लिए गए कड़े रुख को बंगाल विरोधी बताया जा सके. उन्होंने इसे एक ऐसी विफल कोशिश बताया जिसका मकसद केवल बांग्लादेश से आए अवैध मुस्लिम घुसपैठियों को बचाना है, वे घुसपैठिए जिनकी मौजूदगी देश की जनसांख्यिकीय संरचना को खतरे में डाल रही है. सरमा ने जोर देकर कहा कि असम के लोग, जिनमें बांग्ला बोलने वाले भारतीय नागरिक भी शामिल हैं, इस मसले की गंभीरता को भलीभांति समझते हैं और अवैध घुसपैठ के खिलाफ उनकी सरकार की स्पष्ट नीति का समर्थन करते हैं.

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बांग्ला को मातृभाषा के रूप में शामिल करने पर गर्म हुई सियासत

गौरतलब है कि 12 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस ने मुख्यमंत्री सरमा की उस टिप्पणी की आलोचना की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि जनगणना के दस्तावेजों में बांग्ला को मातृभाषा के तौर पर दर्ज करने से राज्य में विदेशी तत्वों की पहचान हो सकेगी.

‘राज्य के 35 में से 15 जिले मुस्लिम बहुल’

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असम विधानसभा के उपाध्यक्ष डॉ. नुमल मोमिन ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि राज्य के कुल 35 जिलों में से अब 15 जिले मुस्लिम बहुल हो चुके हैं. उनका कहना है कि यह बदलाव असम की सामाजिक संरचना के लिए खतरे की घंटी है. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस की नीतियां और विचारधारा असम को एक इस्लामी राज्य की ओर धकेलने का प्रयास कर रही हैं.

1947 में नहीं था एक भी मुस्लिम बहुल जिला!

एक साक्षात्कार में डॉ. मोमिन ने कहा, “देश की आज़ादी के समय असम में एक भी मुस्लिम बहुल जिला नहीं था. लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल गई है. निचले असम से लेकर मध्य और ऊपरी असम तक योजनाबद्ध ढंग से अतिक्रमण और जनसंख्या परिवर्तन हो रहा है, जो बेहद चिंताजनक है.”

‘स्वदेशी असमियों की अस्मिता पर संकट’

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उन्हेंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वे बच्चे थे, तब उनके निकटवर्ती जिले गोलाघाट के सरुपाथर इलाके में मुश्किल से 60 से 70 मुस्लिम घर होते थे, लेकिन अब यह संख्या 6000 से 7000 के बीच पहुंच चुकी है. “यह महज जनसंख्या में बदलाव नहीं, बल्कि असम के मूल निवासियों की पहचान और अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा है,” उन्होंने कहा.

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