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कहां है कालीचौड़ सिद्धपीठ, ऋषियों की तपस्या का साक्षी रहा है ये मंदिर, दर्शन मात्र से ही पूरी होती है मुराद

कालीचौड़ मंदिर को एक प्रकार से आध्यात्मिक स्थान भी माना जाता है. आदि गुरु शंकराचार्य के उत्तराखंड आगमन के दौरान, वे सर्वप्रथम कालीचौड़ मंदिर आए. उन्होंने यहीं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया. गुरु शंकराचार्य के अलावा, आध्यात्मिक गुरु पायलट बाबा ने भी इसी मंदिर से आध्यात्म को आत्मसार किया था.

Image Credits:Kalichaur Temple/ Instagram/Pushkar Singh Dhami
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उत्तराखंड को तपोभूमि कहा जाता है, जहां भगवान शिव और मां पार्वती ने साक्षात स्थान लिया था. यहां की पावन धरती पर कई ऐसे प्राचीन मंदिर मौजूद हैं, जिनका पत्थर भी इतिहास की गवाही देता है. आज हम आपको ऐसे ही प्राचीन और चमत्कारी मंदिर के बारे में बचाएंगे, जहां मां काली स्वयं प्रकट हुई थी और कई दिव्य ऋषि और मुनियों ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या की है.

कालीचौड़ मंदिर प्राचीन काल से ही ऋषियों की तपस्या का केंद्र रहा है

नैनीताल जिले के काठगोदाम में स्थित कालीचौड़ मंदिर एक प्रसिद्ध मंदिर है. यह मंदिर देवी काली को समर्पित है. कालीचौड़ मंदिर प्राचीन काल से ही ऋषियों की तपस्या का केंद्र रहा है. ऐसा माना जाता है कि सत्ययुग में सप्तऋषियों ने इस स्थान पर भगवती की आराधना की और अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कीं. मंदिर की स्थापना को लेकर कई किंवदंतियाँ हैं.

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किस स्थान पर देवी काली का मंदिर बनवाया गया?

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माना जाता है कि कलकत्ता के एक भक्त को खुद मां काली ने दर्शन दिए और इस स्थान के बारे में बताया था. भक्त ने हल्द्वानी पहुंचकर अपने मित्र को सपने में बारे में बताया और उस दिव्य स्थान की खोज में जुट गए. दोनों मित्रों ने मिलकर उसी स्थान से मां काली और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को जमीन से खोदकर निकाला था. कहा यह भी जाता है कि इस दिव्य स्थान पर पहले से ही एक वृक्ष के नीचे मां काली और शिवलिंग की प्रतिमा मौजूद थी और उस स्थान पर काली की प्रतिमा सहित दर्जनों प्रतिमाएँ धरती से प्रकट हुईं. उसी स्थान पर उन्होंने देवी काली का मंदिर बनवाया.

कालीचौड़ मंदिर को आध्यात्मिक स्थान भी माना जाता है

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कालीचौड़ मंदिर को एक प्रकार से आध्यात्मिक स्थान भी माना जाता है. आदि गुरु शंकराचार्य के उत्तराखंड आगमन के दौरान, वे सर्वप्रथम कालीचौड़ मंदिर आए. उन्होंने यहीं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया. गुरु शंकराचार्य के अलावा, आध्यात्मिक गुरु पायलट बाबा ने भी इसी मंदिर से आध्यात्म को आत्मसार किया था.

मंदिर तक पहुंचने का रास्ता भी आसान नही

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नवरात्रि के समय मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ मंदिर में पहुंचती है. मंदिर तक पहुंचने का रास्ता भी आसान नही है क्योंकि चारों तरफ जंगल ही जगंल है. मंदिर परिसर के ईर्द-गिर्द अन्य देवी-देवताओं के मंदिर में भी मौजूद हैं. मंदिर तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी की बस और रेल सेवा उपलब्ध है.

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