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कब है चौरचन पर्व? आखिर क्यों भगवान गणेश ने चंद्रमा को दिया था श्राप, जानिए मिथिलांचल कनेक्शन

बिहार और झारखंड के कुछ हिस्सों में फैला मिथिलांचल अपनी संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. यहां की भाषा, खान-पान, लोक गीत और त्यौहार यहां की संस्कृति को जीवंत रखते हैं

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बिहार और झारखंड के कुछ हिस्सों में फैला मिथिलांचल अपनी संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. यहां की भाषा, खान-पान, लोक गीत और त्यौहार यहां की संस्कृति को जीवंत रखते हैं और इन्हीं में से एक त्यौहार है भगवान गणेश और चंद्रमा से जुड़ा हुआ जिसे चौरचन कहा जाता है, ये पर्व 26 अगस्त के दिन मनाया जायेगा. इसलिए जब इस पर्व के अगले ही दिन गणेश चतुर्थी का त्यौहार भी है तो यह बहुत ही शुभ संयोग है. इससे जुड़ी एक पौराणिक मान्यता के बारे में जानिए.

चंद्रमा को भगवान गणेश का श्राप!

एक पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान गणेश अपने वाहन मूषक पर सवार होकर जा रहे थे, तब उनका विशालकाय शरीर और छोटा सा मूषक देख चंद्रमा उनका मजाक बनाने लगे. इस बात से क्रोधित होकर भगवान गणेश ने उन्हें श्राप देते हुए कहा कि जो कोई भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा को देखेगा उस पर झूठा आरोप लगेगा. हालांकि बाद में गणेश जी ने चंद्रमा को इस श्राप से मुक्त तो कर दिया लेकिन कहा कि जो भी इस दिन चंद्रमा की विधिवत पूजा करेगा और साथ में अर्घ देगा, इस कलंक से मुक्ति मिल जायेगी. इसलिए इस दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है.

चौरचन पर्व का शुभ मुहूर्त!

चौरचन पर्व भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त दोपहर 01:54 बजे से शुरू होगा और 27 अगस्त 03:44 बजे समाप्त होगा. लेकिन हिंदू पंचांग को देखते हुए यह पर्व 26 को ही मनाया जायेगा. इसलिए आप 26 अगस्त की शाम को 7:50 से 8:16 तक पूजा-अर्चना कर सकते हैं.

इस तरह करें पूजा-अर्चना!

चौरचन पूजा के दिन सुबह आप उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहन लें.

फिर भगवान गणेश और चंद्रमा का स्मरण कर व्रत संकल्प लें.

घर की साफ-सफाई के काम से मुक्त होकर आंगन में पीसे हुए चावलों से रंगोली बनाएं.

केले के पत्तों की मदद से चंद्रमा बना लें.

इसके बाद प्रसाद के रूप में मीठे व्यंजन तैयार कर लें.

फिर चौकी पर भगवान गणेश की मूर्ति और चंद्रमा का चित्र एक साथ स्थापित करें.

दोनों का तिलक करने के बाद फूल, दही और खीर का भोग लगाएं.

"ऊँ गं गणपतये नमः" और "ऊँ सों सोंमाय नमः" मंत्र का जाप जरूर करें.

इसके बाद चंद्रमा को दूध और जल का अर्घ दें. इसके बाद उन्हें प्रणाम आदि कर अपने मंगल की कामना करें.

अंत में प्रसाद पूरे घर वालों को बांट दें.

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