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उत्तराखंड : बागेश्वर में स्थित बागनाथ मंदिर बना आस्था का केंद्र, CM धामी ने तीर्थयात्रियों से की यहाँ आने की अपील

उत्तराखंड के बागेश्वर में स्थित इस मंदिर की मान्यता है कि इसी पावन स्थल पर भगवान शिव ने 'बाघ' (व्याघ्र) का रूप धारण कर महर्षि वशिष्ठ की पूजा सफल की थी, जिससे इस धाम का नाम 'बागनाथ' पड़ा. यहां भगवान शिव 'व्याघ्रेश्वर' (बाघ के रूप में) प्रकट हुए थे.

उत्तराखंड : बागेश्वर में स्थित बागनाथ मंदिर बना आस्था का केंद्र, CM धामी ने तीर्थयात्रियों से की यहाँ आने की अपील
Image Credit: Instagram/@pushkarsinghdhami.uk
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देवभूमि उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद में सरयू और गोमती नदियों के संगम पर स्थित अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर अपनी अनूठी आस्था का केंद्र बना हुआ है. मंदिर की प्राचीन वास्तुकला और यहां का शांत एवं आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.

सावन में बागेश्वर का बागनाथ मंदिर बना आस्था का केंद्र

शुक्रवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के जरिए मंदिर के बारे में बताया. साथ ही, पर्यकटों से मंदिर के दर्शन करने पर भी जोर दिया. मुख्यमंत्री ने वीडियो पोस्ट कर लिखा, "बागेश्वर में सरयू और गोमती नदियों के पावन संगम के निकट स्थित श्री बागनाथ मंदिर भगवान शिव की आराधना को समर्पित एक प्राचीन एवं दिव्य धाम है. पवित्र सावन मास में यहां दर्शन एवं पूजन का विशेष महत्व है. बागेश्वर जनपद आगमन पर इस पवित्र मंदिर के दर्शन अवश्य करें."

 
 
 
 
 
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भगवान शिव यहां 'व्याघ्रेश्वर' (बाघ के रूप में) हुए थे प्रकट 

मान्यता है कि इसी पावन स्थल पर भगवान शिव ने 'बाघ' (व्याघ्र) का रूप धारण कर महर्षि वशिष्ठ की पूजा सफल की थी, जिससे इस धाम का नाम 'बागनाथ' पड़ा. यहां भगवान शिव 'व्याघ्रेश्वर' (बाघ के रूप में) प्रकट हुए थे.

यह मंदिर कुमाऊं राजा लक्ष्मी चंद ने लगभग 1450 ई.पू. बनाया था, लेकिन वहां एक संस्कृत शिलालेख है जो कि पहले की तारीख से है. शिवरात्रि के वार्षिक अवसर पर यहां भक्तों की भीड़ होतीहै.. इस जगह में मंदिरों का एक समूह है प्रमुख मंदिरों में भैरव मंदिर, दत्तात्रेय महाराज, गंगा माई मंदिर, हनुमान मंदिर, दुर्गा मंदिर, कालिका मंदिर, थिंगल भिरव मंदिर, पंचनाम जुनाखरा और वनेश्वर मंदिर हैं.

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मंदिर परिसर में 8वीं से 10वीं शताब्दी की कई दुर्लभ मूर्तियां हैं  

यह उत्तराखंड के चुनिंदा दक्षिणमुखी शिव मंदिरों में से एक है. इस स्थान का धार्मिक महत्व 7वीं शताब्दी से भी पुराना माना जाता है. वर्तमान मुख्य पत्थर का मंदिर नागर शैली में चंद वंश के राजा लक्ष्मी चंद द्वारा लगभग 1450-1602 ईस्वी के दौरान बनवाया या जीर्णोद्धार किया गया था. मंदिर परिसर में 8वीं से 10वीं शताब्दी की कई दुर्लभ मूर्तियां और ऐतिहासिक शिलालेख सुरक्षित रखे गए हैं.

मान्यता है कि यहां शिव और पार्वती स्वयंभू रूप में एक साथ विराजमान हैं.

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