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भारत दुनियाभर में मध्यस्थता के झमेले में क्यों नहीं पड़ता? इतिहास के कड़वे अनुभव या दूरगामी रणनीति, क्या वजह है?
खाड़ी में जैसे ही पाकिस्तान ने पोस्टमैन की भूमिका निभाई, सीजफायर सहमति बनी, कुछ लोग भारत की नीति और ताकत की तुलना एक कंगाल और हर लिहाज से फेल मुल्क से करने लगे. ऐसे में सवाल ये उठता है कि भारत दुनियाभर के झगड़ों को खत्म करने के लिए क्यों नहीं मध्यस्थता क्यों नहीं कराता, क्या ऐतिहासिक वजह है.
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मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के दौरान पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों और दो हफ्ते के लिए सीजफायर के ऐलान को पाकिस्तान के अलावा भारत में वामपंथी और तथाकथित 'लिबरल इकोसिस्टम' दिल्ली की हार और फजीहत के तौर पर पेश कर रहा है. विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि 'आतंकिस्तान' के रूप में मशहूर और आतंकवाद को अपनी राजकीय नीति (State Policy) के रूप में इस्तेमाल करने वाला इस्लामाबाद विश्व मंच के केंद्र में आ गया है, वहीं मोदी सरकार मूकदर्शक बनी बैठी है. यानी इसे ऐसे प्रोजेक्ट किया जा रहा है जैसे भारत बैकफुट पर है, क्योंकि ट्रंप ने ईरान के साथ युद्धविराम के लिए मोदी की बजाय मुनीर को तवज्जो दी. ऐसे में जिज्ञासा यह पैदा होती है कि आखिर नई दिल्ली ने इस जंग में मध्यस्थता (Mediation) क्यों नहीं की, जबकि उसके संबंध अमेरिका-इजरायल और ईरान के साथ समान रूप से बेहतर हैं और उसकी बात का वजन भी पाकिस्तान से कहीं ज्यादा है, जिसकी कूटनीति और वैश्विक मानकों पर भारत से तुलना ही नहीं की जा सकती.
आखिर भारत क्यों नहीं मध्यस्थता में नहीं पड़ता?
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति और सबसे तेजी से विकास करने वाली इकोनॉमी होने के बावजूद भारत ने ईरान-इजरायल-अमेरिका जंग में मध्यस्थता क्यों नहीं की? आखिर क्या वजह है कि ट्रंप ने मोदी की बजाय मुनीर से संपर्क किया? याद रहे कि दुनिया के अन्य देशों ने भी इसमें मध्यस्थता की कोशिशें नहीं कीं. नॉर्वे, जिसे दुनिया का सबसे खुशहाल देश माना जाता है और 'ऑल वेदर मेडिएटर' व 'फैसिलिटेटर' कहा जाता है, आखिर उसने पहल क्यों नहीं की? यूरोपीय देशों को छोड़िए, गाजा और इजरायल के बीच सीजफायर को लेकर 'गाजा पीस कॉन्फ्रेंस' आयोजित करने वाले मिस्र को इस काम में क्यों नहीं लगाया गया?
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आखिर पाकिस्तान ही क्यों? वजह साफ है-पाकिस्तान और मुनीर न केवल ईरान के पड़ोसी हैं, बल्कि उनका धार्मिक दृष्टिकोण भी ईरान से मेल खाता है. इस लिहाज से उसे केवल एक 'पोस्टमैने' (दूत) के तौर पर इस्तेमाल किया गया, जिसका एकमात्र काम अमेरिका के 15 सूत्रीय पीस प्लान को ईरान तक पहुँचाना और तेहरान के जवाब को वाशिंगटन तक भेजना था. इसीलिए आपने देखा कि कैसे शहबाज शरीफ के सीजफायर वाले संदेश को व्हाइट हाउस ने ड्राफ्ट किया था; 'न्यूयॉर्क टाइम्स' (NYT) ने इस संदेश को लिखने वाले सूत्र के हवाले से इसकी पुष्टि भी की है.
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भारत ने मध्यस्थता की कोशिश क्यों नहीं की?
खैर, मूल सवाल यह है कि भारत ने मध्यस्थता की कोशिश क्यों नहीं की? इसका जवाब भारत के अब तक के अनुभवों, वैश्विक व्यवस्था की प्रासंगिकता पर अविश्वास, अपनी स्वयं की बनाई नीति और दूरगामी सोच में छिपा है. बीते दिनों खाड़ी और होर्मुज संकट को लेकर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कांग्रेस सांसद तारिक अनवर के पाकिस्तान से संबंधित सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि भारत, पाकिस्तान जैसा 'दलाल' देश नहीं है और हम किसी के लिए मध्यस्थता नहीं करते.
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भारत का मिडिएशन पर क्या रहा है स्टैंड?
यही भारत की आधिकारिक नीति भी रही है. वैश्विक मध्यस्थता को लेकर भारत के अनुभव सुखद नहीं रहे हैं; इसने मुद्दों को सुलझाने के बजाय उलझाया ही है. कश्मीर मुद्दा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है. जब यह मामला संयुक्त राष्ट्र (UN) में ले जाया गया, तब से वैश्विक शक्तियों ने इसे सुलझाने के बजाय एक 'काउंटर बैलेंस' के रूप में इस्तेमाल किया है. कश्मीर संकट पर अमेरिका, ब्रिटेन और चीन के दखल के कारण ही भारत ने शिमला समझौते के समय एक ऐतिहासिक कूटनीतिक फैसला लिया और पाकिस्तान को भी इसके लिए राजी किया. यह एक ऐसा समझौता था जिसने पाकिस्तान को हमेशा के लिए पंगु बना दिया. वह लगातार कोशिश करता रहता है कि कैसे कश्मीर सहित भारत के आंतरिक मामलों को UN में ले जाए या किसी बड़े देश को शामिल कर भारत को असहज करे. मसलन, अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद पाकिस्तान बहुत छटपटाया, लेकिन वह इसका अंतरराष्ट्रीयकरण नहीं कर पाया.
भारत का मध्यस्थता को लेकर अनुभव ठीक नहीं रहा है?
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इतना ही नहीं, जब पहलगाम आतंकी हमले के बाद 'ऑपरेशन सिंदूर' की कार्रवाई हुई और पाकिस्तान के भीतर आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया, तब CCS की बैठक में दशकों से जारी 'सिंधु जल समझौते' को रद्द कर दिया गया और पाकिस्तान की लाख कोशिशों के बावजूद उसे बहाल नहीं किया गया. भारत ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के फैसले को मानने से भी इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि यह मामला द्विपक्षीय है और इसे वैसे ही हल करेंगे. 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद शिमला में हुई संधि (शिमला समझौता) में भारत की तरफ से इंदिरा गांधी और पाकिस्तान की तरफ से ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो शामिल थे. इसमें भारत ने पाकिस्तान को अपने मुद्दों को द्विपक्षीय रूप से हल करने के लिए प्रतिबद्ध किया था.
शिमला समझौते ने पलट दी पूरी बाजी!
अर्थात, भारत ने 50 साल पहले जो समझौता किया था, उसी के तहत वह देश के आंतरिक और बाहरी मुद्दों को डील करता है. जो नीति भारत अपने लिए अपनाता है, वही दूसरों के मुद्दों पर भी लागू करता है. यदि भारत पाकिस्तान-बांग्लादेश के साथ विवादों में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करता, तो वह स्वयं किसी दूसरे के विवाद में मध्यस्थता की पहल कैसे कर सकता है? यह सिर्फ युद्ध का मसला नहीं है, बल्कि जल विवाद और सीमा विवाद जैसे अन्य मामलों में भी यही सिद्धांत लागू होता है. उदाहरण के लिए, पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता या बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल और भूमि विवाद.
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इस लिहाज से भारत की आधिकारिक स्थिति यह रही है कि उसने अपने मुद्दों में किसी दूसरे देश की मध्यस्थता को न कभी स्वीकारा था और न ही कभी स्वीकार करेगा. इसीलिए 'ऑपरेशन सिंदूर' के समय जब ट्रंप मध्यस्थता की बात करते रह गए, तब भी भारत ने कभी नहीं माना कि सीजफायर में किसी तीसरे देश की भूमिका थी. प्रधानमंत्री मोदी ने भी संसद में कहा था कि इसमें किसी अन्य देश का कोई हस्तक्षेप नहीं था.
भारत खुद जिस चीज का विरोध करता है, उसके लिए दूसरों को किस हक से बोले?
अपनी इसी नीति और अनुभवों के आधार पर भारत ने मध्यस्थता की पहल न पहले की थी और न ही अब कर रहा है. भारत का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि उसकी सोच और नीति में निरंतरता (Consistency) रही है. वह जो कहता है, वही करता है. इस तर्क के साथ कि यदि वह अपने मामलों में किसी को हस्तक्षेप नहीं करने देता, तो वह दूसरों के विवादों में कैसे पड़ सकता है.
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जहाँ तक ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध या रूस-यूक्रेन युद्ध की बात है, भारत ने हमेशा समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देने की बात की है. मिडिल ईस्ट के हालिया संघर्ष में भारत की पूरी कोशिश रही है कि लड़ाई रुके, इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न देशों के साथ व्यक्तिगत (One-to-One) बातचीत की है. ईरान भी भारत का मित्र है और खाड़ी के वे देश भी जिन पर ईरान मिसाइलें दाग रहा था. इजरायल भी हमारा रणनीतिक साझेदार (Strategic Partner) है. ऐसे में हमारे लिए सभी के साथ मजबूत संबंध सर्वोपरि हैं.
भारत ने मध्यस्थता के झमेले में पड़ने की बजाय सप्लाई लाइन पर किया फोकस!
इसके अलावा, भारत ने स्पष्ट किया है कि उसके लिए अपने नागरिकों के हित और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) की गारंटी पहली प्राथमिकता है. भारत ने इस मोर्चे पर अद्भुत कार्य किया है. आप देखेंगे कि जहाँ दुनिया भर के जहाज होर्मुज में फंसे हुए थे, वहीं भारतीय ध्वज वाले जहाज वहां से सुरक्षित निकल रहे थे. ईरान ने भारत, चीन और रूस को सबसे पहले जहाज निकालने की अनुमति दी, जिसके बाद पाकिस्तान को मंजूरी मिली.
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पाकिस्तान की पोस्टमैन की भूमिका!
इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में भारी ऊर्जा खपत के बावजूद गैस और तेल को लेकर कोई संकट (Crisis) पैदा नहीं हुआ. यानी भारत ने अपनी आंतरिक जरूरतों को 'अंतरराष्ट्रीय नेतागिरी' पर तरजीह दी है. वहीं पाकिस्तान, जिसे 'मेडिएटर' कहा जा रहा है और जो 'पीस मेकर' बनने का श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है, उसके यहाँ स्थिति क्या थी? अगर वह इतनी ही बड़ी शक्ति है, तो उसके यहाँ तेल और गैस को लेकर हाहाकार क्यों मचा? तेल के दाम 250% तक क्यों बढ़ाए गए? पेट्रोल-डीजल की कीमतें 500 PKR को पार कर गईं और शहबाज शरीफ द्वारा 80 PKR की कटौती के बावजूद ये अब भी 378 PKR पर हैं. इतना ही नहीं, पाकिस्तान ने आने वाले विमानों को तेल देने से यह कहकर इनकार कर दिया कि वे अपना ईंधन साथ लेकर आएं, क्योंकि वहां फ्यूल रीफिलिंग की सुविधा समाप्त हो गई थी.
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भारत मध्यस्थता का दिखावा नहीं करता बल्कि मदद करता है!
दूसरी ओर, भारत ने मध्यस्थता के दावों से इतर अपने पड़ोसियों की वास्तविक मदद की. नेपाल और भूटान को ऊर्जा आपूर्ति जारी रखी, बांग्लादेश की मांग पर डीजल-तेल की सप्लाई दी, श्रीलंका को हजारों मीट्रिक टन रसद भेजी और मालदीव व बुर्किना फासो को भी जरूरी सामान पहुँचाया. यानी भारत केवल बातें नहीं, काम करके दिखाता रहा है.
भारत ग्लोबल साउथ का लीडर है, उसी नाते सही कर रहा है?
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भारत की नीति रही है कि 'ग्लोबल साउथ' के नेता के रूप में उनकी आवाज उठाए और मदद करे. कोरोना काल से लेकर मिडिल ईस्ट युद्ध तक, भारत ने हर संभव सहायता दी है. हिंदुस्तान का मुख्य ध्यान अपने लोगों के उत्थान, घरेलू मामलों, अर्थव्यवस्था और विकास पर है. वही नीति जिसके जरिए चीन आज दुनिया की दूसरी महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है. यदि चीन ने मध्यस्थता नहीं कराई, तो क्या वह पाकिस्तान से छोटा हो गया?
भारत पाकिस्तान की तरह दलाल नहीं बन सकता!
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कुल मिलाकर देखें तो भारत कभी भी 'बिचौलिया' नहीं बनना चाहता था. वह वैश्विक सुर्खियां बटोरने के बजाय अपनी सप्लाई लाइनों को मजबूत करने और ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा था. ऐसे में जो लोग सरकार के प्रति पूर्वाग्रह रखते हैं, वे पाकिस्तान के शामिल होने को भारत की हार बता रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है. यदि भारत में खुदा-न-खास्ता तेल या गैस की भारी किल्लत हो जाती, तो यही लोग कहते कि अपनी आंतरिक जरूरतों को छोड़कर सरकार 'चौधरी' बनने चली है और मोदी को 'विश्वगुरु' बनने का शौक है.