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अपने ही नायकों पर बुलडोजर चला रहा पाकिस्तान... शेरशाह सूरी की मूर्ति तोड़ी, गजनवी-गौरी भी टारगेट पर, आखिर क्यों?

पाकिस्तान में जिन शासकों को दशकों तक राष्ट्रीय नायक बताया गया, अब उन्हीं की प्रतिमाएं हटाई जा रही हैं. पंजाब के झेलम में शेरशाह सूरी की मूर्ति तोड़कर सुल्तान सरंग खान गखर की प्रतिमा लगाई गई.

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भारत से क्रिकेट मैच हारने पर टीवी तोड़ने की घटनाओं के लिए चर्चा में रहने वाला पाकिस्तान अब अपने ही घोषित नायकों की प्रतिमाएं तोड़ रहा है. जिन शासकों को दशकों तक राष्ट्रीय गर्व और मुस्लिम वीरता का प्रतीक बताया जाता रहा, आज उन्हीं की मूर्तियों पर बुलडोजर चल रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि आखिर पाकिस्तान अपने रोल मॉडल क्यों बदल रहा है. भारत में जो लोग टीपू सुल्तान का महिमामंडन करते हैं, उनके लिए यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान आखिर क्यों शेरशाह सूरी, मोहम्मद गौरी और महमूद गजनवी की प्रतिमाएं हटा रहा है और क्यों उन्हें स्कूलों के पाठ्यक्रम से बाहर किया जा रहा है.

दरअसल, हाल ही में पंजाब प्रांत के झेलम शहर में लगी शेरशाह सूरी की प्रतिमा हटा दी गई. उसकी जगह सुल्तान सरंग खान गखर की मूर्ति स्थापित की गई. सिर्फ झेलम ही नहीं, सिंध प्रांत में भी शेरशाह सूरी की प्रतिमाएं हटाने की खबरें सामने आईं. इसके साथ ही मोहम्मद गौरी और महमूद गजनवी से जुड़ी तस्वीरें, प्रतीक और स्मारक भी हटाए जा रहे हैं. यह बदलाव केवल मूर्तियों तक सीमित नहीं है. शिक्षा पाठ्यक्रम में भी इन नामों की अहमियत कम की जा रही है.

कभी ये थे पाकिस्तान के नायक

पाकिस्तान के गठन के बाद उसकी वैचारिक नींव धार्मिक पहचान पर रखी गई. मोहम्मद अली जिन्ना और उनके समर्थकों ने ऐसे ऐतिहासिक पात्रों को महिमामंडित किया जिन्हें इस्लामी विजय और विस्तार का प्रतीक बताया जा सके. महमूद गजनवी को सोमनाथ मंदिर पर हमले के लिए इस्लाम का योद्धा कहा गया. मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान पर विजय के लिए मुस्लिम शासन की स्थापना का नायक बताया गया. शेरशाह सूरी को ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माता और शक्तिशाली मुस्लिम शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया. पाकिस्तान ने अपनी मिसाइलों के नाम भी इन्हीं पर रखे. गजनवी और गौरी नाम की बैलिस्टिक मिसाइलें आज भी उसके शस्त्रागार का हिस्सा हैं. यह दर्शाता है कि इन ऐतिहासिक शासकों को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया था.

आयातित विरासत और नई असहजता

इतिहासकार बताते हैं कि शेरशाह सूरी अफगान मूल के थे. मोहम्मद गौरी घोर प्रांत से थे और महमूद गजनवी का साम्राज्य गजनी में केंद्रित था. यानी ये सभी मूल रूप से अफगान या तुर्क परंपरा से जुड़े थे. पाकिस्तान ने इन्हें अपनी वैचारिक पहचान का हिस्सा बनाया, लेकिन वे भौगोलिक रूप से उसके मूल निवासी नहीं थे. हाल के वर्षों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंधों में तनाव बढ़ा. सीमा पर झड़पों और राजनीतिक टकराव के बाद राष्ट्रीय विमर्श बदला. जब अफगानिस्तान से टकराव बढ़ा तो अफगान मूल के इन ऐतिहासिक शासकों को लेकर असहजता भी बढ़ी. यही वह मोड़ माना जा रहा है जहां से पाकिस्तान ने अपने इतिहास की नई व्याख्या शुरू की.

क्या यह इतिहास की सफाई है या पहचान का संकट?

जानकारों का मानना है कि यह कदम केवल मूर्तियां हटाने का नहीं, बल्कि पहचान के संकट का संकेत है. दशकों तक जिन पात्रों को गौरव बताया गया, आज उन्हें विदेशी और आक्रांता कहकर हटाया जा रहा है. यह बदलाव बताता है कि राष्ट्र निर्माण केवल प्रतीकों से नहीं होता. समाज की स्थायी पहचान उन मूल्यों से बनती है जो व्यापक और समावेशी हों. बता दें कि भारत में भी इतिहास को लेकर बहस होती रही है. लेकिन यहां छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह और महाराणा प्रताप जैसे नायकों को साहस, स्वाभिमान और जनहित के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. किसी भी समाज के लिए रोल मॉडल वही होते हैं जो प्रेरणा दें, विभाजन नहीं.

बताते चलें कि पाकिस्तान का यह कदम बताता है कि इतिहास की दिशा बदलना आसान नहीं होता. जब राष्ट्र अपनी पहचान उधार के प्रतीकों पर खड़ी करता है तो समय आने पर असहजता पैदा होती है. आज पाकिस्तान जिन नामों को हटाने में लगा है, कल वही उसके राष्ट्रवाद की धुरी थे. इतिहास हमें यही सिखाता है कि नायक वही बनते हैं जो समाज को जोड़ें. कट्टरता और आक्रामकता पर आधारित प्रतीक स्थायी नहीं होते. बदलते पाकिस्तान की यह कहानी केवल मूर्तियां टूटने की नहीं, बल्कि पहचान की खोज की कहानी है. और यह सवाल अब भी खुला है कि आगे उसका नया रोल मॉडल कौन होगा.

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