‘चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को राजनीति से दूर रहना चाहिए, तभी बचेगा लोकतंत्र…’ SC जज नागरत्ना का बड़ा बयान
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि अगर चुनाव कराने वाले लोग उन पर निर्भर हों जो चुनाव लड़ते हैं तो निष्पक्षता कैसे बचेगी?
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पांच राज्यों में चुनावों के बीच विपक्ष चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर रहा है. आयोग पर किसी एक पक्ष के लिए झुकाव होने के आरोप लगना कोई नई बात नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग की प्रक्रिया राजनीतिक दबाव से प्रेरित होती है? अब सुप्रीम कोर्ट की सीनियर जज ने चुनाव आयोग पर बड़ा बयान दिया है.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को पूरी तरह स्वतंत्र रहना चाहिए. कोई राजनीतिक दबाव या प्रभाव इन पर नहीं पड़ना चाहिए.
‘चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं लोकतंत्र की मजबूत नींव हैं और इनकी स्वतंत्रता बिना लोकतंत्र सही मायने में नहीं चल सकता.’
‘संस्थानों की मजबूती पर टिका संविधान’
दरअसल, जस्टिस नागरत्ना पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान में संबोधित कर रही थी. जहां उन्होंने संविधान और उसके मूल अर्थ पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि संविधान केवल अधिकारों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि संस्थाओं की मजबूती पर भी टिका है.
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने तीन संस्थाओं की एक जैसी सरंचना बताई. इनमें,
भारत निर्वाचन आयोग ( Election Commission of India)
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India, CAG)
भारतीय वित्त आयोग ( Finance Commission of India)
बी.वी. नागरत्ना ने कहा, ये तीनों संस्थाएं बाहरी प्रभावों से मुक्त हैं और इन्हें ऐसे काम सौंपे गए हैं जहां सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया निष्पक्षता नहीं दे सकती. जस्टिस नागरत्ना ने साफ कहा कि चुनाव कोई रूटीन प्रक्रिया नहीं है.
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इन सभी संस्थाओं को बाहरी प्रभावों से मुक्त रखा गया है. क्योंकि यह विशेषता पर आधारित हैं. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि, इन संस्थानों का काम ऐसे क्षेत्रों की निगरानी करना है, जहां निष्पक्षता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है और जहां सामान्य राजनीतिक प्रक्रियाएं पर्याप्त नहीं होतीं. जस्टिस नागरत्ना ने कहा,
‘ये वो तंत्र है जिससे राजनीतिक सत्ता बनती है. समय पर चुनाव होने से सरकार बदलती है और लोकतंत्र चलता रहता है. लेकिन अगर इस प्रक्रिया पर काबू कर लिया जाए तो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तें भी तय हो जाती हैं. इसलिए चुनाव आयोग को स्वतंत्र रखना बेहद जरूरी है.’
‘चुनाव लड़ने वालों पर निर्भरता से कैसे बचेगी निष्पक्षता’
जस्टिस नागरत्ना ने 1995 के टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले की याद दिलाई. उन्होंने कहा, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मजबूत संवैधानिक संस्था माना था. अगर चुनाव कराने वाले लोग उन पर निर्भर हों जो चुनाव लड़ते हैं तो निष्पक्षता कैसे बचेगी? यही बात आज भी लागू होती है.
उन्होंने कहा, ‘जब संवैधानिक ढांचा कमजोर पड़ता है तो संस्थाएं एक-दूसरे पर नजर रखना छोड़ देती हैं. चुनाव होते रहते हैं, अदालतें चलती रहती हैं, कानून बनते रहते हैं, लेकिन सत्ता पर असली अंकुश नहीं रहता. नतीजा- लोकतंत्र सिर्फ दिखावे का रह जाता है.’
जस्टिस नागरत्ना का यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब देश में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जारी हैं. उन्होंने साफ तौर पर मैसेज दिया कि चुनाव आयोग से स्वतंत्र रूप से काम करने की अपेक्षा हर नागरिक को है. तभी जनता का विश्वास बना रहेगा और लोकतंत्र सच्चा बनेगा.
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सवाल फिर वहीं है क्या चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव हावी होता है? इसका जवाब और उसकी विश्वसनीयता तो केवल चुनाव आयोग ही साबित कर सकता है लेकिन जस्टिस बीवी नागरत्ना ने साफ संदेश दिया कि इन संस्थाओं की स्वतंत्रता न केवल कानूनी जरूरत है बल्कि यह लोकतंत्र का बेस हैं. जिन पर संविधान टिका हुआ है.
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