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मतुआ वोटबैंक पर फोकस, रानाघाट से बीजेपी का चुनावी बिगुल फूंकेंगे पीएम मोदी

भाजपा के पश्चिम बंगाल इकाई के एक पदाधिकारी के अनुसार, 20 दिसंबर को रानाघाट में रैली की तिथि तय की गई है. रानाघाट को राज्य के दो प्रमुख मतुआ गढ़ों में से एक माना जाता है.

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06 Dec 2025
( Updated: 10 Dec 2025
11:56 PM )
मतुआ वोटबैंक पर फोकस, रानाघाट से बीजेपी का चुनावी बिगुल फूंकेंगे पीएम मोदी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महीने पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रानाघाट में एक विशाल रैली के जरिए मतुआ समुदाय की नागरिकता से जुड़े विवाद पर तृणमूल कांग्रेस के आरोपों का मुकाबला करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का बड़ा चुनावी अभियान शुरू करेंगे.

मतुआ मुद्दे पर टीएमसी को घेरेंगे पीएम मोदी

तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि राज्य में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान कई मतुआ समुदाय के लोगों के मतदान अधिकार छिन सकते हैं, जिसका नतीजा उनकी नागरिकता खत्म होने के रूप में सामने आएगा. इसके विपरीत, भाजपा का दावा है कि तृणमूल जानबूझकर गलत प्रचार कर रही है और समुदाय को भ्रमित कर रही है.

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रानाघाट से शुरू होगा बीजेपी का बड़ा चुनावी अभियान

भाजपा के पश्चिम बंगाल इकाई के एक पदाधिकारी के अनुसार, 20 दिसंबर को रानाघाट में रैली की तिथि तय की गई है. रानाघाट को राज्य के दो प्रमुख मतुआ गढ़ों में से एक माना जाता है. दूसरा प्रमुख क्षेत्र उत्तर 24 परगना जिले का बगनान है.

गौरतलब है कि रानाघाट लोकसभा सीट वर्तमान में भाजपा के जगन्नाथ सरकार के पास है, जो 2019 और 2024 दोनों में लगातार इस सीट से निर्वाचित हुए हैं.

कौन हैं मतुआ?

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मतुआ समुदाय सामाजिक रूप से पिछड़े हिंदू प्रवासी हैं, जो समय के साथ धार्मिक शरणार्थी के रूप में बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल आए. इनकी उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों में भारी चुनावी ताकत है. 2019 लोकसभा चुनाव के बाद से समुदाय के बड़े हिस्से ने हर चुनाव में भाजपा का समर्थन किया है.

2026 मिशन में मतुआ सीटें निर्णायक

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के विधानसभा चुनावों में बंगाल की सत्ता पर कब्जा करने के लिए भाजपा को मतुआ-बहुल सीटों पर जीतना बेहद महत्वपूर्ण है. इसी वजह से पार्टी ने मतुआ-बहुल रानाघाट को प्रधानमंत्री की रैली के लिए चुना है, ताकि तृणमूल कांग्रेस के एसआईआर को लेकर फैलाए जा रहे “प्रचार” का जवाब दिया जा सके.

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विश्लेषकों के अनुसार, विधानसभा चुनावों में अभी एक साल बाकी होते हुए भी चुनाव अभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री से करवाना यह संकेत देता है कि भाजपा अपने नारे “2024 में ओडिशा, 2025 में बिहार और 2026 में पश्चिम बंगाल” को गंभीरता से जमीन पर उतारने में जुट चुकी है.

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