बांग्लादेश का कौन हो सकता है अगला प्रधानमंत्री, सर्वे में हो गया खुलासा, जानें किस पार्टी को मिल रही कितनी सीटें!
बांग्लादेश में आगामी चुनाव से पहले एक चुनावी सर्वे सामने आया है. इसमें एक तरह से नतीजों को लेकर स्पष्टता मिलती दिख रही है. इतना ही नहीं ये भी करीब-करीब पता चल रहा है कि कौन होगा मुल्क का प्रधानमंत्री.
Follow Us:
बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं. सोमवार को चुनावी कैंपेन का आखिरी दिन रहा. चुनावी तैयारियां अपने आखिरी चरण में पहुंच चुकी हैं. इसी बीच एक चुनावी सर्वे सामने आया है, जिसमें सामने आया है कि इस बार सीधा मुकाबला पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान की अगुआई वाली बीएनपी और शफीकुर रहमान की कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की अगुवाई वाले गठबंधन के बीच है. जमात ने इस चुनाव में NCP के साथ गठबंधन किया है. वहीं पूर्व पीएम शेख हसीना की अवामी लीग को बैन कर मैदान से ही बाहर कर दिया गया है. ऐसे में कट्टरपंथियों बनाम अति कट्टरपंथी के बीच जोरदार टक्कर होने जा रहा है.
आपको बता दें कि भारत में इस बार बांग्लादेश के चुनाव को संशय और चिंता की नजर से देखा जा रहा है. एक ओर जहां जमात-ए-इस्लामी का एजेंडा ही अल्पसंख्यकों, महिलाओं और भारत के विरोध में रहा है तो दूसरी ओर बीएनपी को भी पाकिस्तान परस्त जमात के तौर पर जाना जाता है. ऐसे में कोई भी पार्टी सत्ता में आए, दिल्ली को अपने कदम फूंक-फूक कर रखने होंगे.
बांग्लादेश का कौन होगा अगला प्रधानमंत्री!
बांग्लादेश में होने वाले चुनाव को लेकर वहां के बड़े अखबार प्रथोमोलो ने एक सर्वे कराया है. इस सर्वे के मुताबिक बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को बड़ी जीत मिल सकती है. अनुमान है कि बीएनपी 200 से ज्यादा सीटें जीत सकती है और ऐसे में तारिक रहमान बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री बन सकते हैं. खास बात यह है कि तारिक रहमान करीब 17 साल बाद ब्रिटेन से बांग्लादेश लौटे हैं. वहीं हाल ही में उनकी मां बेगम खालिदा जिया की मौत का भी चुनाव में उन्हें सहानुभूति वोट के तौर पर मिल सकता है. यही राजनीतिक सर्वे में भी सामने आ रहा है. जिससे पार्टी को बड़ा राजनीतिक फायदा मिलता दिख रहा है.
चुनावी सर्वें में किसे कितनी सीटें!
सर्वे के अनुसार बीएनपी को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना है. वहीं भारत विरोधी माने जाने वाली जमात-ए-इस्लामी की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं बताई जा रही है. हालांकि जमात विपक्ष की भूमिका जरूर निभा सकती है. जमात-ए-इस्लामी इस चुनाव में शफीकुर रहमान के नेतृत्व में मैदान में उतरी है.
सर्वे में दावा किया गया है कि बीएनपी जहां 200 से ज्यादा सीटें जीत सकती है, वहीं जमात-ए-इस्लामी के खाते में करीब 50 सीटें जा सकती हैं. बांग्लादेश की जातीय पार्टी को करीब 3 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि बाकी सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में जा सकती हैं.
गौरतलब है कि बांग्लादेश की संसद में कुल 350 सीटें होती हैं. इनमें से 300 सांसदों को जनता सीधे चुनती है, जबकि 50 सीटों पर मनोनयन के जरिए सदस्य चुने जाते हैं. भारत की तरह ही बांग्लादेश में भी सांसदों का कार्यकाल पांच साल का होता है.
यूनुस क्यों करा रहे बांग्लादेश में जनमत संग्रह!
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने देशवासियों से 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों के साथ-साथ प्रस्तावित जनमत संग्रह में ‘हां’ में वोट देने की अपील की है. उन्होंने लोगों से अपने सुधार पैकेज का समर्थन करने का आग्रह किया है.
सोमवार देर रात वरिष्ठ सचिवों और शीर्ष नौकरशाहों को संबोधित करते हुए मोहम्मद यूनुस ने कहा कि अगर जनमत संग्रह में ‘हां’ के पक्ष में ज्यादा वोट पड़ते हैं तो बांग्लादेश के भविष्य का निर्माण ज्यादा सकारात्मक दिशा में होगा. उन्होंने साफ कहा कि यह जनमत संग्रह देश को बेहतर शासन की ओर ले जाने का एक बड़ा मौका है.
यूनुस ने कहा कि जनमत संग्रह में ‘हां’ में वोट करने से देश में फैले ‘कुशासन’ को दूर करने में मदद मिलेगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि सुधारों के बिना बांग्लादेश आगे नहीं बढ़ सकता.
बताया जा रहा है कि मोहम्मद यूनुस का प्रशासन पिछले कई हफ्तों से एक व्यापक अभियान चला रहा है, ताकि जनता से जटिल 84-सूत्रीय सुधार पैकेज के लिए समर्थन जुटाया जा सके. सरकार का मानना है कि इन सुधारों के लागू होने से शासन व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और देश को स्थिर व मजबूत भविष्य की ओर ले जाया जा सकेगा.
चुनावी सुरक्षा सुनिश्चित कराने की कोशिश!
इस बीच आयोग ने 12 फरवरी को होने वाले रेफरेंडम और नेशनल पार्लियामेंट्री इलेक्शन में पोलिंग स्टेशन के 400 यार्ड के दायरे में मोबाइल फोन ले जाने और इस्तेमाल करने पर बैन लगा दिया है. यह निर्देश इलेक्शन कमीशन सेक्रेटेरिएट के सीनियर असिस्टेंट सेक्रेटरी एमडी शाहिदुल इस्लाम के साइन किए हुए एक लेटर में जारी किया गया, जिसे रविवार को रिटर्निंग ऑफिसर्स को भेजा गया. चुनाव आयोग ने पिछले साल 11 दिसंबर को 13वें पार्लियामेंट्री इलेक्शन और जुलाई नेशनल चार्टर (संवैधानिक रिफॉर्म) पर रेफरेंडम को एक साथ 12 फरवरी, 2026 को कराने के लिए तारीख का ऐलान किया था.
इसके अवाला बांग्लादेश के चुनाव आयोग के फैसले के मुताबिक सिर्फ तीन कैटेगरी के लोगों को पोलिंग स्टेशन के अंदर मोबाइल फोन ले जाने की इजाजत होगी. वे हैं संबंधित पीठासीन अधिकारी, संबंधित स्टेशन पर सुरक्षा के इंचार्ज पुलिस ऑफिसर और दो अंसार मेंबर (एम्बोडेड अंसार/जनरल अंसार/वीडीपी) जिन्हें ‘इलेक्शन सिक्योरिटी 2026’ एप्लीकेशन इस्तेमाल करने के लिए नियुक्त किया गया है. इस निर्देश के कारण, उम्मीदवारों या पत्रकारों को भी पोलिंग वाले दिन पोलिंग स्टेशन के 400 यार्ड के दायरे में मोबाइल फोन ले जाने या इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी.
चिट्ठी में ढाका और चटगांव के डिविजनल कमिश्नर, सभी 64 जिलों के डिप्टी कमिश्नर और ढाका, चटगांव और खुलना के क्षेत्रीय चुनाव अधिकारी समेत 69 रिटर्निंग ऑफिसर को निर्देश दिया गया कि वे फैसले को ठीक से लागू करें.
बांग्लादेश में इन दिनों क्या चल रही है बहस?
बांग्लादेश में चुनाव के बीच महिलाओं की राजनीति में भागीदारी एक प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आई. आयोग ने जो चुनावी आंकड़े जारी किए उसके अनुसार बांग्लादेश में आगामी चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या बेहद कम है. इस बीच जो निर्दलीय महिला उम्मीदवार मैदान में उतरीं हैं, उनका आरोप है कि उन्हें धमकियों और साइबर अपराध का निशाना बनाया जा रहा है.
मीडिया ने बताया कि कई चुनाव क्षेत्रों की महिला उम्मीदवारों ने ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर साइबरबुलिंग, चरित्र हनन, यौन उत्पीड़न और धमकियों की रिपोर्ट की है. इन कृत्यों का मकसद महिला उम्मीदवारों को डराना और उनके चुनावी कैंपेन को रोकना है. ढाका-19 से नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) उम्मीदवार दिलशाना पारुल ने कहा कि उन्हें लगातार ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा है, खासकर हेडस्कार्फ पहनने के उनके फैसले को लेकर.
बांग्लादेश चुनाव में भाग लेने पर महिलाओं को बनाया जा रहा निशाना!
बांग्लादेशी अखबार 'द ढाका ट्रिब्यून' ने उनके हवाले से कहा, "न सिर्फ विरोधी पार्टियों के समर्थकों बल्कि जो लोग खुद को प्रोग्रेसिव कहते हैं, वे भी इसमें शामिल हैं. मेरा मानना है कि मुझे सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया है." पारुल ने आरोप लगाया है कि उनके अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकियां भी मिली हैं.
लिंग आधारित टारगेटिंग पर जोर देते हुए, पारुल ने कहा कि पुरुष नेताओं की ज्यादातर आलोचना भ्रष्टाचार या नीतियों को लेकर होती है, जबकि महिलाओं पर चरित्र को लेकर हमला किया जाता है. इसके बावजूद, मैं फील्ड में काम करती रहूंगी और अपने चुनाव क्षेत्र के विकास पर ध्यान दूंगी.
Advertisement
यह भी पढ़ें
Advertisement