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ईरान में तख्तापलट की आहट? राष्ट्रपति और विदेश मंत्री के खिलाफ बगावत, कट्टरपंथियों ने दी खुली धमकी
अमेरिका-ईरान युद्धविराम के बाद ईरान में राजनीतिक संकट गहरा गया है. कट्टरपंथी गुटों ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर अमेरिका से समझौता कर इस्लामिक क्रांति के सिद्धांतों से समझौता करने का आरोप लगाया है.
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अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम के बाद दुनिया को उम्मीद थी कि पश्चिम एशिया में तनाव कुछ कम होगा. लेकिन अब हालात बिल्कुल अलग दिशा में जाते दिखाई दे रहे हैं. ईरान के भीतर ही सत्ता को लेकर गंभीर राजनीतिक टकराव शुरू हो गया है. कट्टरपंथी गुट राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और अमेरिका के साथ बातचीत करने वाले नेताओं पर देश के साथ समझौता करने का आरोप लगा रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम ने ईरान की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है और तख्तापलट जैसी चर्चाओं ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कट्टरपंथी संगठनों का कहना है कि सरकार ने अमेरिका के साथ बातचीत कर इस्लामिक क्रांति के मूल सिद्धांतों से समझौता किया है. उनका आरोप है कि यह फैसला सर्वोच्च नेतृत्व की विचारधारा के खिलाफ है. यही वजह है कि युद्धविराम के बाद सरकार और कट्टरपंथी धड़ों के बीच टकराव लगातार तेज होता जा रहा है.
अंतिम संस्कार में खुलकर दिखा सरकार के खिलाफ गुस्सा
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बताया जा रहा है कि दिवंगत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान भी यह नाराजगी खुलकर सामने आई. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के खिलाफ भीड़ ने 'समझौतावादी मुर्दाबाद' के नारे लगाए. वहीं विदेश मंत्री अब्बास अराघची को कट्टरपंथी प्रदर्शनकारियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा. उन पर पथराव किया गया और उन्हें गद्दार तथा बिकाऊ जैसे नारों का सामना करना पड़ा. अराघची वही नेता हैं जिन्होंने अमेरिका के साथ युद्धविराम और कुछ प्रतिबंधों में राहत को लेकर बातचीत में अहम भूमिका निभाई थी. हालात इतने बिगड़ गए कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए वहां से तुरंत निकलना पड़ा.
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राष्ट्रपति को मिली खुली धमकी
मामला केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा. सरकार समर्थक माने जाने वाले कट्टरपंथी धार्मिक गायक मोहम्मद अली बख्शी ने एक जनसभा में राष्ट्रपति को खुली धमकी दे डाली. उन्होंने कहा कि यदि सर्वोच्च नेता की शर्तें पूरी नहीं हुईं तो राष्ट्रपति के लिए हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं. इस बयान ने पूरे देश में राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है. ऐसे बयान यह संकेत देते हैं कि विरोध अब केवल वैचारिक नहीं बल्कि बेहद आक्रामक रूप ले चुका है.
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नए सर्वोच्च नेता की गैर-मौजूदगी पर उठ रहे सवाल
इस पूरे विवाद के बीच नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की गैर-मौजूदगी भी कई सवाल खड़े कर रही है. अपने पिता के निधन के बाद उन्होंने अभी तक न तो देश को संबोधित किया है और न ही किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में दिखाई दिए हैं. इसे लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. कुछ लोगों का मानना है कि सुरक्षा कारणों से वह सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ रहे हैं, जबकि कुछ इसे उनकी खराब सेहत से जोड़कर देख रहे हैं. कट्टरपंथी धड़ा 'जेभ-ए-पायदारी' का आरोप है कि इसी स्थिति का फायदा उठाकर राष्ट्रपति पेजेशकियान और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबफ सत्ता पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. कट्टरपंथी सांसद महमूद नबावियान ने सोशल मीडिया पर तख्तापलट की आशंका जताते हुए लोगों को सतर्क रहने की अपील भी की. हालांकि सरकार की ओर से ऐसे आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.
सरकार ने शुरू की सख्त कार्रवाई
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इसी बीच सरकार ने भी कट्टरपंथी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है. संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति से महमूद नबावियान को हटा दिया गया है. उन पर आरोप है कि उन्होंने अमेरिका के साथ हुई गोपनीय वार्ता से जुड़े दस्तावेज मीडिया में लीक किए थे. माना जा रहा है कि इस कदम का उद्देश्य सरकार के भीतर अनुशासन बनाए रखना और संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक होने से रोकना है.
युद्ध के पक्ष में कट्टरपंथी नेताओं की बयानबाजी
दूसरी तरफ कुछ कट्टरपंथी नेता अब भी अमेरिका और इजरायल के साथ किसी भी तरह के समझौते के खिलाफ हैं. उनका मानना है कि ईरान को सैन्य दबाव बनाए रखना चाहिए. पूर्व विदेश मंत्री मनूचेहर मुत्तकी ने तो यहां तक सुझाव दिया कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाए और अमेरिकी सैनिकों को बंधक बनाया जाए. ऐसे बयान यह दिखाते हैं कि ईरान के भीतर अलग-अलग विचारधाराओं के बीच संघर्ष कितना गहरा हो चुका है.
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बहरहाल, ईरान एक बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है. एक ओर सरकार आर्थिक प्रतिबंधों से राहत और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कूटनीतिक रास्ता अपनाना चाहती है. दूसरी ओर कट्टरपंथी गुट किसी भी समझौते को देश की विचारधारा के खिलाफ मानते हुए उसका विरोध कर रहे हैं. आने वाले दिनों में यह राजनीतिक संघर्ष किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है. यदि यह टकराव और बढ़ता है तो इसका असर केवल ईरान ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर भी पड़ सकता है.