पश्चिम बंगाल में BJP का मिशन 160... बदले समीकरणों पर टिकी रणनीति, जानें क्या है पार्टी की तैयारी
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने अपने मिशन 160 के तहत मजबूत और अनुकूल सीटों पर फोकस बढ़ा दिया है. पिछली बार जीती 77 सीटों के साथ करीब 125 ऐसी सीटें चिन्हित की गई हैं, जहां सामाजिक समीकरण पार्टी के पक्ष में माने जा रहे हैं.
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पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी है. भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में अपना बहुचर्चित 'मिशन 160' तेज कर दिया है. पार्टी की रणनीति साफ है कि मजबूत सीटों पर पूरी ताकत झोंकी जाए और अनुकूल सामाजिक समीकरणों वाली सीटों पर बढ़त बनाई जाए. यह अभियान सिर्फ चुनावी तैयारी नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी माना जा रहा है.
पिछले चुनाव के आंकड़े क्या कहते हैं
पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो मुकाबला भले सीधा था, लेकिन परिणामों में बड़ा अंतर दिखा. तृणमूल कांग्रेस ने 44.91 प्रतिशत वोट पाकर 211 सीटें जीती थीं. वहीं भारतीय जनता पार्टी को 38.15 प्रतिशत वोट मिले और 77 सीटों पर जीत दर्ज हुई. करीब साढ़े छह प्रतिशत वोटों के अंतर ने सीटों की संख्या में भारी फासला पैदा कर दिया था.
साढ़े तीन प्रतिशत वोट पर टिकी रणनीति
बीजेपी के रणनीतिकार मानते हैं कि बदलाव की स्थिति में पुराने आंकड़े ज्यादा मायने नहीं रखते. आम तौर पर दो से तीन प्रतिशत वोटों का झुकाव सत्ता परिवर्तन का कारण बन सकता है. पार्टी का आकलन है कि अगर वह तृणमूल के लगभग साढ़े तीन प्रतिशत वोट अपनी ओर खींच लेती है तो तस्वीर बदल सकती है. इसी सोच के साथ सीटों की गहन समीक्षा की गई है और प्राथमिकता तय की गई है.
ए, बी और सी श्रेणी में सीटों का वर्गीकरण
सूत्रों के अनुसार बीजेपी ने करीब 160 ऐसी सीटों की सूची तैयार की है, जहां जीत की संभावना मजबूत मानी जा रही है. ए श्रेणी में पिछली बार जीती गई 77 सीटें शामिल हैं. बी श्रेणी में लगभग 50 सीटें हैं, जहां सामाजिक और स्थानीय समीकरण अनुकूल माने जा रहे हैं. सी श्रेणी में भी करीब 50 सीटें रखी गई हैं, जहां रणनीतिक लड़ाई लड़ी जाएगी. बाकी सौ से अधिक सीटों पर स्थानीय परिस्थिति के अनुसार अभियान चलाया जाएगा.
रथ यात्रा और संसाधनों पर फोकस
पार्टी की प्रस्तावित रथ यात्रा का मार्ग भी प्राथमिकता वाली सीटों को ध्यान में रखकर तय किया जा रहा है. कोशिश यह है कि उसकी पकड़ वाली लगभग पौने दो सौ सीटों को सीधे जोड़ा जाए. इन क्षेत्रों में पार्टी के बड़े नेता ज्यादा प्रचार करेंगे और संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाएगा. रणनीतिकारों का मानना है कि जब जनता के बीच बदलाव की भावना मजबूत होती है तो चुनावी नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं.
नेतृत्व और अस्मिता की चुनौती
बीजेपी के सामने एक बड़ी चुनौती प्रभावशाली बंगाली नेतृत्व की कमी को लेकर भी मानी जा रही है. दूसरी ओर ममता बनर्जी खुद को बंगाली अस्मिता से जोड़कर लंबे समय से भद्रलोक वर्ग का समर्थन हासिल करती रही हैं. ऐसे में मुकाबला केवल सीटों का नहीं, बल्कि पहचान और भावनाओं का भी बन गया है.
बदलाव बनाम स्थिरता की जंग
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में लगभग सीधा मुकाबला है, इसलिए जनादेश भी स्पष्ट हो सकता है. बीजेपी की रणनीति लोगों में यह विश्वास पैदा करने की है कि इस बार बदलाव संभव है. वहीं तृणमूल कांग्रेस अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए संगठन और नेतृत्व दोनों पर भरोसा जता रही है.
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बताते चलें कि पश्चिम बंगाल की सियासत में अब गणित और मनोविज्ञान दोनों की परीक्षा है. वोट प्रतिशत का मामूली अंतर सीटों के बड़े अंतर में बदल सकता है. आने वाले समय में यह रणनीतिक लड़ाई और तेज होने वाली है.
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