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कौन हैं ये संघ के सिपाही, जिन्होंने संसद में टेबल पर निकालकर रख दिए दोनों पैर, वामपंथियों ने काट डाली थी टांगें!

संसद से सामने आई इस मार्मिक तस्वीर ने सबका ध्यान खींच लिया. सांंसद सी. सदानंदन मास्टर ने अपने दोनों आर्टिफिशियल लिंब्स (कृत्रिम पैर) टेबल पर रख दिए। इसी एक दृश्य ने वामपंथी पार्टियों की कथनी और करनी के बीच का फर्क, उनकी हिंसक राजनीति और पाखंड का इतिहास उजागर कर दिया.

सी सदानंदन मास्टर ने सदन में टेबल पर रखे अपने दोनों लिंब (पैर) (स्क्रीनग्रैब)
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लेफ्ट इकोसिस्टम खुद को सेक्युलर, लिबरल और अभिव्यक्ति की आज़ादी का चैंपियन बताता रहा है. वामपंथी पार्टियां वर्षों से खुद को मानवाधिकार, मजदूरों, शोषितों और वंचितों की रहनुमा बताती आई हैं, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है. राज्यसभा में बीते दिन बीजेपी के नामित सांसद सी. सदानंदन मास्टर ने जो मार्मिक खुलासा किया, उसके बाद यह कहा जाने लगा है कि असहमति को दबाने और कुचलने वाली उनकी वैचारिक हिंसा और घोर पाखंड पूरी तरह बेनकाब हो गया है.

क्या है सदानंदन मास्टर के दोनो कटे पैर के पीछे की मार्मिक कहानी?

आपको बता दें कि बीजेपी के राज्यसभा सांसद सी. सदानंदन मास्टर ने उच्च सदन में अपना पहला भाषण दिया. यह सिर्फ उनकी पहली स्पीच नहीं थी, बल्कि देश के सामने राजनीतिक प्रतिशोध और बर्बरता का ऐसा सच था, जिसे उन्होंने खुद झेला है. उन्होंने खुलासा किया कि 1994 में कथित तौर पर सीपीआई(एम) से जुड़े लोगों ने उन पर जानलेवा हमला किया था.

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बजट सत्र के दौरान की इस बेहद मार्मिक तस्वीर ने पूरे देश का ध्यान खींचा. बीजेपी के नामित सदस्य सी. सदानंदन मास्टर ने अपने दोनों आर्टिफिशियल लिंब्स (पैर) निकालकर सदन की टेबल पर रख दिए और 1994 में अपने ऊपर हुए हमले की कहानी सुनाने लगे. हालांकि वे ऐसा नहीं करना चाहते थे, लेकिन देश के जाने-माने वकील और राज्यसभा सांसद उज्ज्वल निकम ने जब स्वयं उनके पैर सदन के पटल पर रखे, तो पूरे सदन में मानो भूचाल आ गया. इस दृश्य से सीपीआई(एम) के सांसद बौखला गए. वे जानते थे कि इन लिंब्स का सच क्या है और अगला खुलासा किसके खिलाफ होने वाला है.

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सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि जैसे ही दोनों पैर सदन के पटल पर रखे गए, वामपंथी सांसद उठकर विरोध जताने लगे. इसके बावजूद सी. सदानंदन मास्टर विचलित नहीं हुए और उन्होंने मजबूती के साथ भाषण जारी रखा. उन्होंने वामपंथी पार्टियों की कथनी और करनी की परत-दर-परत पोल खोली. उन्होंने न सिर्फ 31 साल पहले, 1994 में हुए हमले की कहानी सुनाई, बल्कि लोकतंत्र और मानवाधिकार की दुहाई देने वाले पूरे इकोसिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया.

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उन्होंने बताया कि वामपंथी हमलावरों ने बेरहमी से उनके दोनों पैर काट डाले थे. सदानंदन मास्टर ने कहा कि संसद में लोकतंत्र-लोकतंत्र का शोर बहुत सुनाई देता है, लेकिन लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वालों ने ही एक मजबूत, सक्षम व्यक्ति को अपंग बना दिया.

उन्होंने कहा,“ये मेरे दो पैर हैं. जब मैं आज लोकतंत्र पर लेक्चर सुनता हूं, तो मुझे सच याद करने पर मजबूर होना पड़ता है. 31 साल पहले इन्हीं सीपीआई(एम) के लोगों ने मुझ पर हमला किया था और बेरहमी से मेरे पैर काट दिए थे.”

उन्होंने कहा कि कभी उनके भी दो मजबूत पैर थे, लेकिन आज उन्हें इन्हीं आर्टिफिशियल लिंब्स के सहारे चलना पड़ता है. सी. सदानंदन मास्टर ने सदन को बताया कि यह हमला तब हुआ, जब वे अपने अंकल के घर से लौट रहे थे, जहां उनकी बहन की शादी को लेकर बातचीत हुई थी. बस से उतरते ही बाजार में पहले से घात लगाए बैठे संगठित अपराधियों ने उन्हें पीछे से पकड़ लिया, सड़क पर गिराया और दोनों पैरों पर घातक हमला किया. उन्होंने बताया कि हमलावर राजनीतिक नारे लगा रहे थे और यह हिंसा पूरी तरह राजनीतिक प्रतिशोध का परिणाम थी. उन्होंने सवाल उठाया कि जो लोग आज लोकतंत्र, सहिष्णुता और मानवता की बातें करते हैं, उनका अतीत राजनीतिक हिंसा से भरा क्यों रहा है.

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जब वामपंथियों ने काट दी थी सदानंदन मास्टर की दोनो टांगें!

धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए सी. सदानंदन मास्टर ने एक भावुक और गंभीर वक्तव्य के माध्यम से अपने जीवन पर हुए राजनीतिक हमले का उल्लेख किया और सदन का ध्यान लोकतंत्र, सहिष्णुता और हिंसा की राजनीति की ओर आकृष्ट किया. उन्होंने कहा कि वे कभी पूरी तरह सक्षम व्यक्ति थे, लेकिन आज कृत्रिम पैरों के सहारे जीवन जी रहे हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह स्थिति किसी बीमारी या दुर्घटना की वजह से नहीं, बल्कि 31 वर्ष पहले हुए राजनीतिक हमले का नतीजा है.

अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने अपने आर्टिफिशियल पैर सदन की सीट पर रखे, जिस पर केरल से वामपंथी सांसदों ने नियमों का हवाला देते हुए आपत्ति जताई. इस पर सी. सदानंदन मास्टर ने कहा,
“मैं देश के सामने, जनता के सामने और इस सदन के सामने यह दिखाना चाहता हूं कि असली लोकतंत्र क्या होता है. केवल शब्दों में लोकतंत्र की बात करना आसान है, लेकिन हिंसा पर आधारित राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है.”

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उन्होंने जोर देकर कहा कि राजनीतिक हिंसा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकती. लोकतंत्र का अर्थ असहमति को स्वीकार करना और विचारों से मुकाबला करना है, न कि हिंसा के जरिए विरोधियों को कुचलना. उन्होंने कहा कि वे राष्ट्र के नाम शपथ लेकर यह बात कह रहे हैं कि राजनीतिक हिंसा लोकतंत्र को कमजोर करती है और समाज को गहरी चोट पहुंचाती है. भाषण के अंत में उन्होंने सभापति का धन्यवाद करते हुए कहा कि वे नियमों और संसदीय मर्यादाओं का पूरा सम्मान करते हैं.

अपने संबोधन में उन्होंने एक देशभक्ति प्रार्थना की पंक्तियों का भी उल्लेख किया, जिसे उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीखा है, जो अपने सौ वर्षों की यात्रा पूरी कर रहा है. उन्होंने कहा कि उस प्रार्थना का सार यही है कि व्यक्ति अपना जीवन मातृभूमि को समर्पित करे और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करे.

विदेश नीति और वैश्विक भूमिका पर बोलते हुए सी. सदानंदन मास्टर ने कहा, “भारत कभी भी नफरत या शत्रुता की भावना के साथ अन्य देशों से व्यवहार नहीं करता.” उन्होंने कहा कि भारत सभी देशों को मित्र मानता है, चाहे उनकी जनसंख्या कितनी भी हो, त्वचा का रंग कुछ भी हो या उनकी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो. यह भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को दर्शाता है.

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कौन हैं सी. सदानंदन मास्टर?

मोदी सरकार द्वारा राज्यसभा सांसद के रूप में नामित किए जाने के बाद सी. सदानंदन मास्टर की कहानी देशभर में चर्चा का विषय बनी. वे वर्तमान में केरल में बीजेपी यूनिट के उपाध्यक्ष हैं. राजनीति में आने से पहले वे एक स्कूल शिक्षक के रूप में कार्यरत थे. सीपीआई(एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने पॉइंट ऑफ ऑर्डर उठाते हुए सदन में किसी वस्तु के प्रदर्शन पर आपत्ति जताई, जिस पर सदानंदन मास्टर ने कहा कि लोकतंत्र, सहिष्णुता और मानवता की बातें करने वाले लोग ही सबसे बेहिचक राजनीतिक हिंसा करते रहे हैं.

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बीजेपी ने वामपंथी दलों पर साधा निशाना

सी. सदानंदन मास्टर ने अपने लंबे भाषण के अंत में कहा कि सीपीआई(एम) द्वारा किए गए अत्याचार की वजह से वे आज सदन में खड़े होकर भाषण देने में सक्षम नहीं हैं, जिसका उन्हें गहरा दुख है.वहीं, उनकी दर्दनाक और मार्मिक कहानी के दौरान सीपीआई(एम) के विरोध को लेकर बीजेपी ने वामपंथी दलों पर तीखा हमला बोला. बीजेपी ने कहा कि यही लाल आतंक का असली चेहरा है—लोकतंत्र का उपदेश देना, लेकिन क्रूरता का अभ्यास करना.

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बीजेपी ने आगे कहा कि दशकों तक यह हिंसा राजनीतिक संरक्षण और वैचारिक चुप्पी के तहत पनपती रही. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने एक लाल रेखा खींच दी है. सी. सदानंदन मास्टर को संसद में लाकर यह सुनिश्चित किया गया कि पीड़ितों की आवाज अब वहीं गूंजे, जहां कानून बनते हैं. इस तरह वामपंथी उग्रवाद का अंत किया जा रहा है, सिर्फ बल से नहीं, बल्कि सच्चाई, साहस और न्याय के जरिए.

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