किस गुमनामी में खो गए गांधी जी के प्राण रक्षक बत्तख मियां, जिन्होंने बदल दी चंपारण सत्याग्रह और भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा

ऐसे वक्त में जब देश ने गांधी जी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया, तब एक बात कौंधती है कि नाथूराम गोडसे की तो खूब चर्चा होती है, क्या देश को ये पता है कि एक बिहारी और पसमांदा ने गांधी जी की जान बचाई थी, अंग्रेजों के ऑफर को लात मार दी थी. और हमने ऐसे राष्ट्रनायक के साथ क्या किया.

Author
31 Jan 2026
( Updated: 31 Jan 2026
07:49 PM )
किस गुमनामी में खो गए गांधी जी के प्राण रक्षक बत्तख मियां, जिन्होंने बदल दी चंपारण सत्याग्रह और भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा

कृतज्ञ राष्ट्र ने कल 30 जनवरी को देश और दुनिया के साथ मिलकर महात्मा गांधी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धापूर्वक स्मरण किया और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. यह वही दिन है जब सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस के प्रतीक राष्ट्रपिता को एक हिंसक साजिश ने हमसे छीन लिया था. गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवित विचार हैं, जिनका दर्शन और अहिंसक संघर्ष आज भी मानव समाज को न्याय, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.

इतिहास में भुला दिए गए पसमांदा विभूति बत्तख़ मियां!

लेकिन गांधी की पुण्यतिथि के इस स्मरण के साथ यह प्रश्न भी और अधिक प्रासंगिक हो उठता है कि क्या हमने उन गुमनाम नायकों को याद किया है, जिनके साहस और बलिदान के बिना न गांधी की जीवन-यात्रा संभव थी और न ही भारत का स्वतंत्रता संग्राम? ऐसी ही एक उपेक्षित कथा है गाँधी जी के प्राण रक्षक, देशज पसमांदा विभूति बत्तख मियां की, जिन्होंने 1917 के चंपारण सत्याग्रह के दौरान गांधी जी की जान बचाकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा ही बदल दी थी.

यह विडंबना ही है कि महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का नाम आज भी राजनीतिक विमर्श और इतिहास के केंद्र में गूंजता है, जबकि गांधी के प्राण रक्षक बत्तख मियां इतिहास में कहीं भुला दिए गए हैं.

देशभक्ति और सादगी की मिसाल थे बत्तख मियां!

बत्तख मियां का जन्म लगभग 1867 में बिहार प्रांत के मोतिहारी ज़िले में हुआ था. उनके पिता का नाम मोहम्मद अली अंसारी था. बत्तख मियां एक रसोइए के रूप में कार्य करते थे और समाज के उसी निचले पायदान से आते थे, जिसे आज देशज पसमांदा समाज कहा जाता है. वह वर्ग जो श्रम-आधारित पेशों से जुड़ा हुआ था. उनका जीवन ग्रामीण गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन के बीच निरंतर संघर्षों से भरा रहा.

यह पृष्ठभूमि उनके साहसिक कार्य को और भी अधिक महत्वपूर्ण बना देती है, क्योंकि उनके पास न कोई राजनीतिक रसूख था और न ही आर्थिक सुरक्षा. उनका जीवन त्याग, कष्ट और देशभक्ति का एक अद्वितीय उदाहरण है. अपने देशभक्तिपूर्ण कार्यों के कारण अंग्रेज़ों ने उन्हें कठोर यातनाएँ दीं और उनके घर तथा ज़मीन तक को छीन लिया. अंततः 1957 में उनका निधन हो गया. 1917 का चंपारण, बिहार में अंग्रेज़ों द्वारा लागू तीनकठिया प्रणाली के तहत किसानों के शोषण के क्रूरतम दौर से गुजर रहा था.

एक बिहारी, एक पसमांदा मुसलमान ने की थी गांधी की रक्षा!

इन विकट परिस्थितियों से डरे-सहमे किसानों को सहारा देने के लिए चंपारण प्रांत के राजकुमार शुक्ला, पीर मुहम्मद मूनीस अंसारी और अन्य के अनुरोध पर मोहनदास करमचंद गांधी भारत में अपना पहला बड़ा सत्याग्रह शुरू करने के लिए मोतिहारी आ गए.

अंग्रेजों ने किया था गांधी जी को खत्म करने का प्लान!

गांधी जी की बढ़ती लोकप्रियता नील कोठी के अंग्रेज़ मैनेजर डब्ल्यू.एस. इरविन के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी थी. इरविन ने गांधी जी को खत्म करने के लिए बत्तख मियां को मोहरा बनाने की योजना बनाई.

बत्तख मियां ने अंग्रेजों के ऑफर को मारी लात!

नील कोठी के इस क्रूर प्रबंधक ने बत्तख मियां को गांधी जी और उनके साथियों के भोजन में ज़हर मिलाने का आदेश दिया. उसने न केवल धमकी दी, बल्कि धन, सुरक्षा और सुविधाओं का प्रलोभन भी दिया. बत्तख मियां के सामने दो रास्ते थे—एक तरफ अंग्रेज़ मालिक का आदेश, जिसका पालन करने से उसकी नौकरी और जान दोनों सुरक्षित रहतीं, और दूसरी तरफ देश के उस महापुरुष की जान, जिसने लाखों किसानों के भीतर उम्मीद की लौ जगाई थी.

बत्तख मियां ने कैसे बचाई गांधी जी की जान!

बत्तख मियां ने एक साधारण रसोइए की आज्ञाकारिता से ऊपर उठकर एक सच्चे वतनपरस्त का धर्म निभाया. उन्होंने लोभ और भय—दोनों को ठुकरा दिया और अपने देश के प्रति अडिग निष्ठा दिखाई.
देशज पसमांदा समाज से आने वाली अधिकांश विभूतियों के बारे में जानकारी प्रायः मौखिक इतिहास के माध्यम से ही सामने आई है. बत्तख मियां की कथा भी इन्हीं मौखिक स्रोतों में जीवित रही है.

बत्तख साहब ने गांधी जी को कैसे जहर वाला दूध पीने से रोका!

सार यह है कि जब बत्तख मियां ज़हर मिला दूध लेकर गांधी जी के पास पहुँचे, तो वहाँ डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी उपस्थित थे. बत्तख मियां ने बिना किसी हंगामे के, अत्यंत सूझबूझ और साहस के साथ, फुसफुसाकर इशारों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को आगाह किया कि—“दूध में ज़हर है, इसे पीने से रोकिए.”

बत्तख मियां ने न केवल गांधी जी की जान बचाई, बल्कि भारत के अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन के भविष्य को भी सुरक्षित किया. षड्यंत्र विफल होने पर बत्तख मियां को इस देशभक्ति की भारी कीमत चुकानी पड़ी. अंग्रेज़ों ने उन्हें कैद किया, अमानवीय यातनाएँ दीं, उनका घर जला दिया और उनकी ज़मीन-जायदाद छीन ली. वे जीवनभर गरीबी और बदहाली में जीते रहे. बत्तख मियां परिवार सहित अपना गाँव छोड़कर कहीं और गुमनामी का जीवन व्यतीत करने लगे.

गुमनामी में गायब हो गए बत्तख मियां!

महात्मा गांधी के खिलाफ साजिश को नाकाम करने वाले बत्तख मियां को ज़िंदगी भर गरीबी और अभाव में जीवन जीना पड़ा. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और मुल्क के लिए एक महान कार्य किया, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें अपने जीवनकाल में कोई मान्यता नहीं मिल सकी.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद और बत्तख मियां की वो ऐतिहासिक मुलाकात!

बात 1950 के दशक की है. उस समय देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मोतिहारी आए थे. मोतिहारी रेलवे स्टेशन पर राष्ट्रपति को देखने-सुनने के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ी हुई थी. ट्रेन से उतरते ही भीड़ के एक कोने से अचानक शोर-गुल मच उठा. डॉ. राजेंद्र प्रसाद की नजर उसी दिशा में गई.

उन्होंने देखा कि एक बुज़ुर्ग व्यक्ति लोगों की भीड़ को चीरते हुए उनकी ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जब उन्हें देखा तो एक क्षण के लिए ठिठक गए और फिर उनकी आँखों में पहचान की चमक उभर आई. वह बुज़ुर्ग कोई और नहीं, बत्तख मियां थे.

डॉक्टर प्रसाद ने दी अपने साथ बत्तख मियां को मंच पर जगह!

डॉ. राजेंद्र प्रसाद तुरंत आगे बढ़े, उन्हें गले से लगा लिया, हाथ पकड़कर मंच की ओर ले गए और अपनी बगल वाली कुर्सी पर बैठाया. फिर उन्होंने वहाँ एकत्र भीड़ की ओर मुखातिब होकर वह हकीकत सुनाई, जिसके वे स्वयं प्रत्यक्ष साक्षी थे.राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि यदि बत्तख मियां न होते तो गांधी जी का जीवन बच नहीं पाता.

1958 में बत्तख मियां के परिवार का हुआ सम्मान!

1957 में जब बत्तख मियां का निधन हुआ और यह समाचार तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक पहुंचा, तो उन्होंने 3 दिसंबर 1958 को उनके परिवार को राष्ट्रपति भवन बुलाकर सम्मानित किया. 

बत्तख मियां के परिवार के साथ सरकार की वादाखिलाफी!

इतना ही नहीं उनके परिवार को 50 एकड़ ज़मीन देने का आश्वासन दिया. लेकिन अफसोस, यह वादा आज तक पूरी तरह पूरा नहीं हो सका. परिवार को केवल छह एकड़ ज़मीन दी गई, जो नदी किनारे स्थित होने के कारण धीरे-धीरे कटाव में बह गई.

क्या बत्तख साहब के परिवार को मिलेगा उनका हक?

पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी इस दिशा में पहल की थी, लेकिन फ़ाइल वर्षों से सरकारी दफ़्तरों की धूल फाँकने से आगे नहीं बढ़ पाई. स्वतंत्र भारत की सरकारें अब तक बत्तख मियां के परिवार को वह सम्मान और सहायता नहीं दे सकी हैं, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं.

अत्यंत गरीबी में बत्तख साहब की पीढ़ी!

यह विडंबना ही है कि आज बत्तख मियां के वंशज, उनके पोते और परपोते, बिहार के पश्चिमी चंपारण के गाँवों में अत्यंत गरीबी में जीवन बिता रहे हैं. उनका संघर्ष उस ऐतिहासिक उपेक्षा की जीवंत मिसाल है, जो पसमांदा और हाशिये पर पड़े समुदायों के हिस्से आई है. यह विरोधाभास किसी भी संवेदनशील नागरिक को झकझोर देता है कि जिस परिवार ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जान बचाई थी, वह आज भी जीवन की मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है.

बत्तख मियां अंसारी जैसे गुमनाम योद्धा हमारी राष्ट्रीय धरोहर से कम नहीं हैं. उनका साहस यह सिद्ध करता है कि भारत की आज़ादी केवल कुछ बड़े नेताओं की देन नहीं, बल्कि हज़ारों उन नायकों की कुर्बानियों का भी परिणाम है, जो देश के साधारण लोगों में से थे.बत्तख मियां का बलिदान गांधी जी की जान बचाने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह पसमांदा समाज की वतनपरस्ती, नैतिक दृढ़ता और अटूट देशभक्ति का भी प्रतीक है.

इतिहास में बत्तख मियां जैसे नायकों को उनका उचित स्थान मिलना चाहिए. सरकार को चाहिए कि उन्हें आधिकारिक रूप से स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दे, उनके नाम पर स्मारक और संस्थान स्थापित किए जाएँ, उनके वंशजों को स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों जैसी सुविधाएँ दी जाएँ, तथा उनकी गाथा को स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए.बत्तख मियां का साहस आज के युवाओं के लिए प्रेरणा है और यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी सच्चा देशभक्त अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता.

दिग्गज पसमांदा आंदोलन कार्यकर्ता, लेखक, अनुवादक, स्तंभकार, मीडिया पैनलिस्ट और पेशे से आयुष चिकित्सक डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने ना सिर्फ इस लेख के माध्यम से इतिहास के गुमनाम नायक बत्तख मियां साहब के बलिदान को याद किया बल्कि नाथूराम गोडसे की चर्चा के बीच उनके जीवन रक्षक को भी दुनिया और आज के युवाओं के समक्ष लाया. इतना ही नहीं डॉ. फैयाज से बत्तख मियां साहब के साथ हुई सरकारी वादाखिलाफी की भी आवाज उठाई. आशा है सरकार उनके साथ हुए अन्याय पर सुध लेगी और इतिहास की गलती को सुधारने का काम करेगी.

यह भी पढ़ें

लेख: डॉ. फैयाज अहमद फैजी 
एडिट: केशव झा

Tags

Advertisement

टिप्पणियाँ 0

LIVE
Advertisement
Podcast video
Startup का सबसे बड़ा भ्रम | हकीकत जो आपको कोई नहीं बताता | Abhishek Kar Podcast
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें