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बंगाल में सुवेंदु सरकार ने OBC लिस्ट से अधिकांश मुस्लिम जातियों को किया बाहर, विधानसभा से पास हुआ कानून

बंगाल विधानसभा से पास हुआ OBC सूची और OBC आरक्षण से जुड़ा संशोधन कानून काफी सुर्खियों में है. इसके बाद OBC लिस्ट से अधिकांश मुस्लिम जातियां बाहर हो गई हैं, अब वो ही बचेंगी जो 2010 से पहले मौजूद थे.

Bengal CM Suvendu Adhikari/ Image Source:IANS
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पश्चिम बंगाल में सीएम सुवेंदु अधिकारी सरकार ने राज्य में OBC लिस्ट में शामिल मुस्लिम जातियों को बाहर कर दिया है. इससे राज्य की राजनीति गरमा गई है. आपको बता दें कि बंगाल विधानसभा ने सोमवार को सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण से संबंधित दो महत्वपूर्ण विधेयक, पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति के अलावा) सेवाओं और पदों में रिक्तियों के आरक्षण (संशोधन) विधेयक 2026 और पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) विधेयक 2026, ध्वनि मत से पारित कर दिया. 

पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं जन शिक्षा विस्तार एवं पुस्तकालय सेवा मंत्री गौरी शंकर घोष द्वारा पेश किए गए इन विधेयकों के पारित होने के साथ ही, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लिए ममता बनर्जी की पिछली टीएमसी सरकार द्वारा तैयार की गई ओबीसी सूची को रद्द करने का रास्ता साफ हो गया है.

सुवेंदु सरकार ने अधिकांश मुस्लिम जातियों को किया OBC लिस्ट से बाहर

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इस फैसले के बाद ममता बनर्जी सरकार और लेफ्ट द्वारा जोड़ी गई मुस्लिम जातियां इस लिस्ट से बाहर हो गई हैं. इसकी पृष्ठभूमि देखें तो 2010 से पहले लेफ्ट फ्रंट के समय सूची में लगभग 66 समुदाय थे, जिनमें से केवल 11 मुस्लिम थे. लेकिन 2010 में तत्कालीन सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार ने राज्य की नौकरियों में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का फैसला लिया और कुल 42 नई जातियों को जोड़ा, जिससे कुल ओबीसी जातियों की संख्या बढ़कर 108 हो गई, जिनमें 53 जातियां मुस्लिम थीं. रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए फरवरी 2010 में भट्टाचार्य सरकार ने मुस्लिम समुदाय के पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी.

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बंगाल ओबीसी लिस्ट में ममता और लेफ्ट सरकार ने किया था झोल!

बंगाल में ओबीसी सूची को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था, जिसमें अधिक पिछड़े 'ओबीसी-ए' (OBC-A) श्रेणी में आने वाली जातियों को 10 फीसदी और 'ओबीसी-बी' (OBC-B) श्रेणी में आने वाली जातियों को 7 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया, जिससे कुल ओबीसी आरक्षण 7% के आधार स्तर से बढ़कर 17% तक हो गया. 2011 में सत्ता बदलने के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार बनने के एक साल बाद 2012 में ओबीसी आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला किया गया और कार्यकारी आदेशों के ज़रिए सूची में 35 और जातियां जोड़ने का काम किया गया. इस तरह लेफ्ट और ममता बनर्जी सरकारों ने मिलकर कुल 77 नई जातियां ओबीसी सूची में शामिल की थीं. 

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ममता बनर्जी सरकार ने राज्य की ओबीसी सूची में मुख्य रूप से मार्च 2010 और मई 2012 के बीच कुल 113 उप-जातियों (सब-ग्रुप्स) को शामिल किया था, जिनमें से 77 मुस्लिम समुदाय से थीं और 36 हिंदू समुदाय से थीं. टीएमसी ने 2012 में कानून में संशोधन किया, जिसमें श्रेणी ए में 65 समुदाय और श्रेणी बी में 78 समुदाय बरकरार रखे गए, और अनुसूचित जाति से ईसाई धर्म में परिवर्तित हुए लोगों को भी श्रेणी बी में शामिल किया गया. 

ममता सरकार के फैसेल के बाद ओबीसी लिस्ट में बहुमत में आ गए थे मुस्लिम

इस विस्तार के बाद कुल ओबीसी सूची काफी बढ़ गई, जो अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार 113 से 179 समूहों के बीच थी, और इसमें मुस्लिम समुदाय बहुमत में आ गए. उदाहरण के लिए, कुल 179 समूहों में से 118 मुस्लिम समूहों के दावे थे, और उप-वर्गीकरण में एक श्रेणी में 51 में से 46 मुस्लिम समूह तथा दूसरी में 25 में से 21 मुस्लिम समूह थे. इस बड़े बदलाव के बाद पश्चिम बंगाल की कुल ओबीसी सूची (ए और बी श्रेणी मिलाकर) में मुस्लिम समुदायों का प्रतिनिधित्व लगभग 86 फीसदी से 90 फीसदी तक पहुंच गया था, जिससे एक तरह से ओबीसी में मुस्लिम जातियों का दबदबा हो गया था.

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अल्पसंख्यक वोट बैंक को खुश करने के लिए लिया गया था फैसला

सदन में बहस के दौरान बोलते हुए भाजपा विधायकों ने आरोप लगाया कि पिछली टीएमसी सरकार ने जानबूझकर मुस्लिम समुदाय के लोगों को बड़ी संख्या में शामिल करके एक पक्षपातपूर्ण ओबीसी सूची तैयार की थी ताकि अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को खुश किया जा सके. पार्टी ने यह भी दावा किया कि संशोधित सूची ने हिंदू समुदायों की कीमत पर मुस्लिम समुदायों को अतिरिक्त लाभ दिए हैं. 

असली ओबीसी जातियों के साथ हो रही थी ज्यादती

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उस समय भी भाजपा ने टीएमसी शासन के दौरान तैयार की गई नई सूची पर आपत्ति जताई थी और दावा किया था कि हिंदू पृष्ठभूमि वाले समुदायों को वंचित किया गया था. अब इन दो संशोधनों से पिछड़ा वर्ग आयोग को ओबीसी सूची में किसी भी समुदाय को शामिल करने या बाहर करने पर आपत्ति उठाने का अधिकार मिल गया है. 

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इन विधेयकों में यह भी प्रावधान है कि राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग के परामर्श से राज्य की नौकरियों में ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रतिशत निर्धारित करेगी, जिसे समय-समय पर संशोधित किया जा सकता है, लेकिन कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा. सरकार को आयोग के परामर्श से पिछड़ेपन के स्तर के आधार पर अन्य पिछड़े समुदायों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत करने का भी अधिकार होगा. नए कानून में पूर्व वाम मोर्चा सरकार द्वारा लागू किए गए आरक्षण कानून की संरचना को भी बहाल किया गया है. टीएमसी के संशोधनों ने मूल कानून की अनुसूचियों को पुनर्गठित कर पहले की अनुसूची 1 और अनुसूची 2 को क्रमशः अनुसूची 2 और अनुसूची 3 में स्थानांतरित कर दिया था. लेकिन सोमवार को पारित विधेयकों के तहत भाजपा सरकार ने वाम मोर्चा युग की मूल अनुसूची 1 को बहाल कर दिया है, जो टीएमसी कानून के तहत अनुसूची 2 के अनुरूप है, जबकि टीएमसी शासनकाल की अनुसूची 1 और अनुसूची 3 को पूरी तरह रद्द कर दिया गया है.

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