चुनाव आयोग में सब ठीक था तो 21 सितंबर को क्यों रोका गया ज्ञानेश कुमार का यूपी दौरा? जानें विवाद की पूरी कहानी
ज्ञानेश कुमार को लेकर चुनाव आयोग के अंदर मतभेद की खबरों के बीच विवाद बढ़ गया है. खास बात यह है कि इसकी चर्चा सार्वजनिक होने से पहले ही 21 सितंबर को मेरठ और वाराणसी का उनका प्रस्तावित दौरा स्थगित कर दिया गया था.
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भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है. चुनाव आयोग के अंदर मतभेद की खबर सामने आने के बाद कांग्रेस ने शुक्रवार को देशभर में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है. वहीं कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने ज्ञानेश कुमार से 48 घंटे के भीतर इस्तीफा देने की मांग की है. लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मामला शुरू कहां से हुआ और अचानक चुनाव आयोग के अंदर की बातें सार्वजनिक कैसे हो गईं.
21 सितंबर को ही मिल गया था संकेत
सबसे दिलचस्प बात यह है कि चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की खबर सार्वजनिक होने से पहले ही उत्तर प्रदेश में ज्ञानेश कुमार का प्रस्तावित दौरा स्थगित हो चुका था. रिपोर्टों के मुताबिक, मेरठ और वाराणसी में उनके कार्यक्रमों की तैयारियां 21 सितंबर को ही रोक दी गई थीं. ज्ञानेश कुमार को 25 सितंबर को मेरठ और 28 सितंबर को वाराणसी में बैठकों के साथ युवाओं और जेन-जी से संवाद करना था. हालांकि, 21 सितंबर को ही यूपी के अधिकारियों को कार्यक्रम स्थगित होने की सूचना मिल गई थी. बाद में 24 सितंबर को इसकी औपचारिक जानकारी सामने आई. खास बात यह है कि संबंधित पत्र पर भी 21 सितंबर की तारीख दर्ज थी और कार्यक्रम स्थगित करने की कोई वजह नहीं बताई गई थी. यानी जिस विवाद की खबर देश के सामने 23 सितंबर के बाद आई, उसकी हलचल उससे पहले ही दिखाई देने लगी थी.
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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से खुला मामला
विवाद ने उस समय बड़ा रूप ले लिया जब 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने 23 सितंबर को अपनी रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर मतभेद का दावा किया. रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की थी. इन आपत्तियों का संबंध विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम जोड़ने और हटाने तथा चुनावी डेटा और सॉफ्टवेयर तक पहुंच जैसे मुद्दों से बताया गया है. रिपोर्ट में दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ कदमों को लेकर गंभीर सवाल उठाए जाने की बात कही गई है. यही रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई और विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.
आयोग ने क्या कहा?
विवाद के बीच चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक टूट की बात से इनकार किया है. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, आयोग की ओर से कहा गया कि अलग-अलग मुद्दों पर राय या आपत्ति होना अपने आप में किसी संस्थागत टूट का प्रमाण नहीं है और SIR समेत फैसले सर्वसम्मति से लिए गए. यहीं से पूरा मामला और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एक तरफ दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का दावा है, तो दूसरी तरफ आयोग की ओर से फैसलों में एकराय होने की बात कही जा रही है.
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अब राजनीतिक दबाव भी बढ़ा
विवाद सामने आने के बाद कांग्रेस ने 25 सितंबर को राज्य चुनाव आयोग कार्यालयों तक विरोध मार्च निकालने का ऐलान किया. पार्टी ने ज्ञानेश कुमार को हटाने और उनके कार्यकाल में हुए फैसलों तथा मतदाता सूची में किए गए बदलावों की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है. वहीं CJP ने 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए इस्तीफे की मांग की है और मांग पूरी नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है.
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बहरहाल, इस पूरे विवाद का केंद्र चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां, SIR की प्रक्रिया और निर्णय लेने के तरीके को लेकर उठे सवाल हैं. आने वाले दिनों में इन आरोपों पर आयोग की ओर से विस्तृत जवाब और सामने आने वाले दस्तावेज यह तय करने में अहम होंगे कि विवाद की वास्तविक तस्वीर क्या है.