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मोदी की तारीफ के बाद अब कश्मीर पर बयान, आखिर क्यों अपनी ही पार्टी के निशाने पर हैं शशि थरूर?

कांग्रेस सांसद शशि थरूर एक बार फिर विवादों में हैं. श्रीनगर दौरे के दौरान उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात के बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति की ओर बढ़ती प्रगति को लेकर सकारात्मक टिप्पणी की. थरूर ने कहा कि चुनौतियां अभी भी हैं, लेकिन हालात में सुधार के संकेत उत्साहजनक हैं.

Image Source: IANS/Prem Nath Pandey
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर एक बार फिर अपनी ही पार्टी के भीतर विवादों के केंद्र में आ गए हैं. हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ को लेकर उठे राजनीतिक तूफान के बाद अब जम्मू-कश्मीर को लेकर की गई उनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट ने कांग्रेस के कुछ नेताओं को नाराज कर दिया है. इस पूरे घटनाक्रम ने पार्टी के अंदर विचारों के मतभेद और नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चाओं को एक बार फिर सामने ला दिया है.

दरअसल, शशि थरूर हाल ही में श्रीनगर पहुंचे थे, जहां उन्होंने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि उन्हें लोक भवन में उपराज्यपाल के साथ एक बेहद सकारात्मक और उपयोगी बैठक का अवसर मिला. उन्होंने बताया कि बातचीत के दौरान क्षेत्र की वर्तमान स्थिति और सामान्य हालात की ओर बढ़ रही प्रगति पर चर्चा हुई.

बैठक के बाद जताई सकारात्मक उम्मीद

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थरूर ने यह भी कहा कि जब वे वहां पहुंचे तो उपराज्यपाल कश्मीरी लेखक संघ और एक महिला संगठन की अध्यक्ष से बातचीत कर रहे थे. उन्होंने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद स्थापित करना एक सकारात्मक कदम है. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि जम्मू-कश्मीर में अभी कई चुनौतियां मौजूद हैं और बहुत काम किया जाना बाकी है, लेकिन बैठक के बाद उन्हें आशावाद का अनुभव हुआ.

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कांग्रेस नेताओं ने जताई नाराजगी

यहीं से विवाद की शुरुआत हुई. जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के प्रवक्ता रविंद्र शर्मा ने थरूर की टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी भी नेता को केवल अधिकारियों से बातचीत करके निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि थरूर को आम लोगों और उन कांग्रेस कार्यकर्ताओं से भी मिलना चाहिए था, जो पिछले कई वर्षों से राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं. शर्मा का मानना है कि जमीनी हकीकत को समझने के लिए जनता के बीच जाना उतना ही जरूरी है जितना कि प्रशासनिक अधिकारियों से चर्चा करना.

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मोदी की तारीफ पर पहले भी घिर चुके हैं थरूर

हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब थरूर की टिप्पणियों ने पार्टी के भीतर बहस छेड़ी हो. इससे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस भूमिका की सराहना की थी, जिसमें भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए जाने की बात कही गई थी. थरूर ने कहा था कि भारत ने अपने नागरिकों की सुरक्षा और समुद्री नाविकों की रक्षा को लेकर स्पष्ट चिंता जताई है. उनके इस बयान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने तीखी प्रतिक्रिया दी. खेड़ा ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि थरूर की प्रधानमंत्री मोदी के प्रति प्रशंसा अब सामान्य राजनीतिक सीमाओं से भी आगे निकल चुकी है. उन्होंने सवाल उठाया कि जिन बातों का आधिकारिक रिकॉर्ड में जिक्र नहीं है, उन्हें थरूर किस आधार पर प्रधानमंत्री की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. खेड़ा ने यह भी कहा कि विदेश मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी में उन मुद्दों का जिक्र नहीं था, जिनका जिक्र थरूर ने किया. इसी वजह से उन्होंने थरूर के बयान को लेकर कटाक्ष किया और कहा कि शायद कुछ लोगों को वह बातें भी सुनाई देती हैं, जो आधिकारिक तौर पर कही ही नहीं गईं.

विवाद बढ़ने पर थरूर की सफाई

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विवाद बढ़ने के बाद शशि थरूर ने अपनी सफाई भी दी. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को राजनीतिक विवाद का रूप देना दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने कहा कि उनकी चिंता केवल उन भारतीय नाविकों के प्रति थी जिन्होंने अपनी जान गंवाई और उनका मानना है कि नागरिक समुद्री कर्मियों को किसी भी सैन्य संघर्ष का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए. थरूर ने आगे कहा कि यदि कुछ लोग इस मानवीय चिंता को समझने के बजाय राजनीतिक लाभ तलाशने में लगे हैं, तो यह उनके दृष्टिकोण को बताता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय नागरिकों के जीवन और सुरक्षा का मुद्दा राजनीति से ऊपर होना चाहिए और इस पर सभी को एकजुट होकर सोचने की जरूरत है.

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बताते चलें कि शशि थरूर की टिप्पणियों को लेकर कांग्रेस के भीतर जारी बहस यह संकेत दे रही है कि पार्टी के अलग-अलग नेताओं के बीच कई मुद्दों पर सोच में अंतर मौजूद है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर पार्टी की आंतरिक राजनीति पर भी इसका कोई व्यापक असर पड़ता है.

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