करोड़ों की जायदाद हथिया कर पिता को ठुकराया, कोर्ट ने बेटियों को लगाई फटकार, पीड़ित को वापस दिलाई संपत्ति
84 वर्षीय वैंकटैया को उनकी बेटियों ने देखभाल का भरोसे देते हुए संपत्ति अपने नाम करवा ली, लेकिन बाद में तेवर बदल दिए. आलम ये हो गया कि बुजुर्ग पिता को रोटी और इलाज जैसी जरुरतों के लिए भी भटकना पड़ा.
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‘हमारा क्या है जो है बच्चों का है, बुढ़ापे में बच्चे ही साथ देंगे’ मां-बाप इसी सोच के साथ बच्चों को पाल पोष कर बड़ा करते हैं, उन्हें काबिल बनाते हैं और आखिरी में अपने खून-पसीने की कमाई और संपत्ति भी बच्चों के नाम कर देते हैं, लेकिन क्या हो जब वो ही बच्चे उन्हें रोटी तक के लिए तरसा दें. अपनी छोटी-छोटी जरुरतों के लिए भी बुजुर्ग मां-बाप को भटकना पड़े.
कर्नाटक से कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है. जहां बुजुर्ग पिता ने अपनी करोड़ो की जमीन बेटियों के नाम कर दी, लेकिन जायदाद हथियाने के बाद बेटियों ने पिता को छोड़ दिया. पिता ने मदद के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. अब कर्नाटक हाई कोर्ट ने बुजुर्ग को उनकी संपत्ति वापस दिलाई. साथ ही साथ अहम टिप्पणी भी की.
हाई कोर्ट ने रद्द की गिफ्ट डीड
हाई कोर्ट ने पाया कि बुजुर्ग के साथ अन्याय हुआ है. कोर्ट ने बेटियों को मिली पिता की इस गिफ्ट डीड (स्वेच्छा से संपत्ति ट्रांसफर करने का दस्तावेज) को रद्द कर दिया. हाई कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, बुजुर्ग माता-पिता जब अपनी जमीन बच्चों को देते हैं तो उनके पास बुजुर्ग की रोजमर्रा की जरूरतों की देखभाल करने की जिम्मेदारी होती है. अगर वे इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं करते हैं तो ऐसे मामलों में कोर्ट उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है और बच्चों के नाम की गई जमीन को फिर से उनके बुजुर्ग माता-पिता के नाम कर सकता है. न्यायालय ने इसे भरोसे का दुरुपयोग, गैर जिम्मेदाराना और कानून की नजर में धोखाधड़ी मानते और गिफ्ट डीड को रद्द करते हुए बुजुर्ग को उनकी संपत्ति वापस दिलाई.
क्या है पूरा मामला?
मामला कर्नाटक के टुमकुरु जिले का है. जहां 84 साल के वेंकटैया ने अपनी दोनों बेटियों शिवम्मा और पुट्टम्मा को साल 2023 में अपनी संपत्ति गिफ्ट करते हुए उनके नाम कर दी थी. इसके बदले में बेटियों ने पिता को भरोसा दिया था कि वह उनके खाने से लेकर इलाज और बाकी देखभाल का पूरा जिम्मा उठाएंगी, लेकिन संपत्ति मिलते ही बेटियों ने रंग बदल दिए.
वेंकटैया ने बेटियों पर आरोप लगाया कि दोनों ने उन्हें और उनकी जरुरतों को नजरअंदाज किया. उन्हें खाने और इलाज जैसी जरुरतों के लिए भी भटकना पड़ा. वेंकटैया ने ‘Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007’ की धारा 23 के तहत कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई जस्टिस सुराज गोविंदराज ने की. उन्होंने कहा, यह ट्रांसफर पूरी तरह से भरोसे पर हुआ था. चूंकि वैंकटैया पढ़े लिखे नहीं हैं इसलिए उन्हें दस्तावेजों की पूरी जानकारी नहीं थी.
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस सुराज गोविंदराज ने अपने आदेश में कहा कि वैंकटैया ने लिखित शर्त वाले दस्तावेज के बारे में नहीं सोचा था. वह इतने पढ़े-लिखे नहीं हैं. बुज़ुर्ग ने गिफ्ट डीड को किसी दबाव में नहीं, बल्कि भरोसे के साथ बनाया था, लेकिन बेटियों ने वो भरोसा ही तोड़ दिया. जस्टिस सुराज गोविंदराज ने कहा, बेटियों ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की और उन्होंने पिता को मदद नहीं दी, इसलिए कोर्ट ने गिफ्ट डीड मान्य नहीं है.
वहीं, कोर्ट जब इस गिफ्ट डीड को रद्द कर रहा था तब बैंकटैया की बेटी पुट्टमा ने तो कोई आपत्ति नहीं जताई, लेकिन दूसरी बेटी शिवम्मा के बेटे संपत्ति पर दावा करते हुए सवाल उठाए. दरअसल, शिवम्मा की मौत हो चुकी है. ऐसे में उनकी तरफ से उनके बेटे अदालत में पहुंचे थे. हालांकि कोर्ट ने बेटे का दावा खारिज करते हुए कहा, बेटे का संपत्ति पर अधिकार जताना कानूनन जायज नहीं है.
कोर्ट ने इस मामले में मानवीय पहलू को सबसे ऊपर रखा. हाई कोर्ट ने कहा कि बुजुर्गों की भावनात्मक और आर्थिक निर्भरता एक सामाजिक सच्चाई है. ऐसे मामलों में कानून को संवेदनशीलता के साथ लागू करना जरूरी है. इसी के साथ कोर्ट ने बुजुर्ग वैंकटैया को उनकी संपत्ति का दोबारा पूर्ण मालिक बना दिया. ऐसे मामले बताते हैं कि समाज में दौलत के आगे रिश्तों का कद और भरोसा कितना छोटा हो जाता है.
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