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नाबालिग से शादी कर बनाए संबंध तो दर्ज होगा POCSO, मुस्लिम पर्सनल लॉ की भी दलील नहीं आएगी काम, कोर्ट का बड़ा फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह वैध होने के बावजूद नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर आपराधिक मामले से छूट नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए एक मुस्लिम शख्स के खिलाफ POCSO के तहत दर्ज केस रद्द करने से इनकार कर दिया.
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नाबालिग मुस्लिम लड़की से शादी और फिर संबंध बनाने के एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला आया है. कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत दर्ज एक केस में आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया और FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने साफ कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई वैध शादी में भी नाबालिग पत्नी यानी कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर दंडात्मक कानून से छूट या सुरक्षा नहीं मिल सकती.
मुस्लिम पर्सनल लॉ से वैध शादी वाली दलील भी नहीं बचा पाएगी
कोर्ट ने साफ कर दिया कि अगर कोई शख्स 18 साल से कम उम्र की लड़की से शादी करता है और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता है या इससे जुड़े मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ की दलील पेश करके बच जाता है, तो फिर POCSO एक्ट का कोई मतलब नहीं रह जाएगा और इस कानून का उद्देश्य कमजोर हो जाएगा.
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नाबालिग पत्नी से यौन संबंध मामले में आपराधिक केस रद्द करने से कोर्ट का इनकार
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आपको बता दें कि न्यायमूर्ति संजीव नरूला की बेंच ने बीते 23 सितंबर के अपने एक आदेश में यह टिप्पणी की. बेंच में 16 साल तीन महीने की लड़की की शादी और उसके गर्भावस्था से संबंधित एक मामले की सुनवाई हो रही थी. कोर्ट ने ये बातें नाबालिग पत्नी के यौन उत्पीड़न के आरोपी के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए कीं. कहा जा रहा है कि शादी के वक्त लड़की नाबालिग थी, उसकी उम्र 16 साल तीन महीने थी और आरोपी व्यक्ति की उम्र 28 साल थी. इसके बाद दोनों पति-पत्नी साथ रहने लगे और लड़की गर्भवती हो गई.
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कैसे पता चला कि लड़की नाबालिग है?
इसके बाद लड़की का गर्भावस्था के सिलसिले में अस्पताल जाना हुआ, जहां सरकारी अस्पताल में उसकी असल उम्र और नाबालिग होने की पहचान हुई. हालांकि लड़की तो बच गई, लेकिन बच्चा नहीं बच पाया. जून में लड़की ने मृत बच्चे को जन्म दिया था. इसके बाद अस्पताल की ओर से पुलिस को मामले की जानकारी दी गई. फिर पुलिस ने आरोपी व्यक्ति के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया.
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लड़की और उसके परिवार की भी कोर्ट ने नहीं मानी दलील!
हालांकि लड़की ने बयान दिया कि ये शादी जोर-जबरदस्ती की नहीं थी. ये शादी उसकी और दोनों परिवारों की सहमति से हुई और कोई दबाव नहीं डाला गया. इससे पहले लड़की के परिवार ने आरोपी व्यक्ति की जमानत याचिका का समर्थन किया और गर्भावस्था के दौरान उसकी मौजूदगी की भी मांग की थी.
'शादी वैध, तो फिर शारीरिक संबंधों के लिए आपराधिक जिम्मेदारी कैसे?'
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वहीं आपराधिक मामला रद्द करने वाली अपनी याचिका में दंपति ने दलील दी थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार यौवनावस्था में पहुंचने के बाद मुस्लिम लड़की विवाह योग्य मानी जाती है. ऐसे में शादी वैध है और जब शादी ही वैध है और बोर्ड से भी शादी को मान्यता प्राप्त है, तो पति-पत्नी के रिश्ते में होने के कारण बने शारीरिक संबंधों के लिए आपराधिक जिम्मेदारी नहीं बनती.
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हालांकि कोर्ट ने साफ कर दिया कि शख्स की मुस्लिम पर्सनल लॉ वाली शादी की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती. कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह के बाद नाबालिग से यौन संबंधों की दलील नहीं मानी और कहा कि इस आधार पर भी इसे POCSO से अलग नहीं किया जा सकता.