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'जब दुनिया पाकिस्तान के साथ थी, रूस भारत के साथ खड़ा रहा', विदेश मंत्री की US को दो टूक, कहा-इतिहास नहीं भूले हैं

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका को तगड़ा सुना दिया है. उन्होंने कहा कि जब भारत मुश्किल में था, तब दुनिया पाकिस्तान की मिलिट्री रिजीम के साथ थी, रूस ने भारत का साथ दिया, इतिहास नहीं भूले हैं.

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05 Oct 2026
( Updated: 05 Oct 2026
01:56 PM )
'जब दुनिया पाकिस्तान के साथ थी, रूस भारत के साथ खड़ा रहा', विदेश मंत्री की US को दो टूक, कहा-इतिहास नहीं भूले हैं
Image Source-X / @DrSJaishankar
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अमेरिकी कांग्रेस से हाल में ही एक बिल पारित किया गया, जिसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया है कि जो भी देश अमेरिका से ट्रेड करते हैं और रूस से भी तेल-गैस का आयात करते हैं, उन पर 100% टैरिफ लगाया जा सकेगा. इतना ही नहीं भारत पर भी दबाव बनाया जा रहा है कि वो ना सिर्फ रूस के साथ ऑयल ट्रेड खत्म करे, बल्कि उससे रिश्ते भी कम करे. इन्हीं सब कोशिशों के बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दो टूक कहा है कि उस देश का साथ कैसे छोड़ दें, जिसने मुश्किल में साथ दिया. उस वक्त जब दुनिया यहां तक की अमेरिका भी भारत के पड़ोसी और उसके मिलिट्री रिजीम के साथ खड़ी थी, तब सोवियत यूनियन और रूस ही था जो भारत के साथ हर मुद्दे पर खड़ा था.

'जब दुनिया पाकिस्तान के साथ थी, रूस भारत के साथ खड़ा रहा'

उन्होंने आगे कहा कि भारत-रूस के रिश्ते लंबे समय से अच्छे रहे हैं. नई दिल्ली के लिए मॉस्को के साथ रिश्ते सिर्फ आज की स्थिति से तय नहीं होते. ‘भारत और रूस के बीच ऐतिहासिक रूप से बहुत अच्छे संबंध रहे हैं और अपने अनुभवों से दोनों देश आज भी अपने रिश्तों को आकार देते हैं.

इस दौरान उन्होंने सोवियत संघ से लेकर रूस तक, 1950 के दशक से लेकर अब तक, रूस की ओर से मिले समर्थन और मजबूत द्विपक्षीय संबंध पर का हवाला देते हुए कहा कि ‘लोग अच्छे या बुरे इतिहास को नहीं भूलते हैं.’ उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी दुनिया की ओर से पाकिस्तान को मिले कूटनीतिक सपोर्ट और सैन्य मदद पर भी तंज कसा और कहा कि उस वक्त भी रूस ही भारत के साथ खड़ा था. जाहिर सी बात है कि उनका इशारा 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान पाकिस्तान को मिली अमेरिकी मदद और 7वां नौसैनिक बेड़ा भेजने की धमकी और उसे रोकने के लिए सोवियत संघ जिस तरह अपनी फ्लीट भेजी की ओर था.

रूस ने हमेशा दिया भारत का साथ!

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मॉस्को के साथ संबंधों का जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा, ‘दुनिया का हर एक देश अपने अनुभवों के आधार पर दूसरे देशों के साथ अपने रिश्तों का आकलन करता है.’ उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह यूरोप से रूस को लेकर भारत का नजरिया अपनाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है, उसी तरह से नई दिल्ली के फैसले मॉस्को के साथ उसके अपने ऐतिहासिक अनुभवों से तय होते हैं.

उन्होंने कहा, ‘रूस के साथ भारत का अनुभव सकारात्मक और हमेशा से सकारात्मक ही रहा है. 1970 और 1980 के दशक से दोनों देशों की साझेदारी में विस्तार आया है. अब सैन्य और परमाणु सहयोग के साथ-साथ व्यापार, ऊर्जा और संसाधनों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है.’ 

म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे विदेश मंत्री एस. जयशंकर

म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका-चीन मुकाबले पर कहा कि दुनिया 'गोल्डीलॉक्स सिनेरियो' में है, जहां हालात न ज्यादा गर्म हों न ज्यादा ठंडे. उन्होंने कहा कि उभरती और मध्यम ताकतें अब अपने विकल्प बढ़ाने और जोखिम कम करने पर फोकस कर रही हैं और हितों में सीधा टकराव न होने पर वे आपस में सहयोग को तैयार हैं, जिसका उदाहरण 'क्वाड' है.
 
जयशंकर ने कहा क‍ि खासकर अमेरिका और चीन के बीच मुकाबले के संदर्भ में देखें, तो मुझे लगता है कि हम उस स्थिति की ओर देख रहे हैं जिसे अक्सर 'गोल्डीलॉक्स सिनेरियो' कहा जाता है. यानी आप नहीं चाहते कि हालात बहुत ज्यादा गर्म हों, न ही बहुत ज्यादा ठंडे. आप चाहते हैं कि स्थिति इन दोनों के बीच सही संतुलन में रहे तो ऐसे में उभरती हुई और मध्यम ताकत वाले देशों के लिए क्या स्थिति बनती है?

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जयशंकर ने कहा क‍ि मेरा मानना है कि आज इनमें से ज्यादातर देश हर तरह से अपने विकल्प बढ़ाने और जोखिम कम करने पर ध्यान दे रहे हैं. यह सिर्फ उनकी अर्थव्यवस्था या सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अपनी सप्लाई चेन को भी ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद बनाने की कोशिश कर रहे हैं. कई मायनों में ये देश नई व्यवस्थाएं तैयार कर रहे हैं और अलग-अलग मुद्दों के आधार पर सहयोग बढ़ा रहे हैं.

अमेरिकी और चीन के बीच मुकाबले पर भी विदेश मंत्री ने कही बड़ी बात

उन्‍होंने कहा क‍ि उभरती हुई और मध्यम ताकतों के लिए साथ काम करने का आधार एक हद तक विचारों और हितों में समानता होना चाहिए और शायद पहले से ऐसा हो भी रहा है. मुझे लगता है कि वे दिन अब पीछे छूट गए हैं, जब देशों के विचार बिल्कुल एक जैसे होना या उनके हितों में बहुत ज्यादा समानता होना जरूरी माना जाता था. आज के समय में यह उम्मीद कुछ ज्यादा ही है. अगर देशों के बीच सहयोग के लिए पर्याप्त साझा मुद्दे हैं, तो उनके लिए मिलकर काम करने के लिए इतना ही काफी है.

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उन्‍होंने कहा क‍ि जोखिम कम करने, विकल्प बढ़ाने और अलग-अलग रास्ते खुले रखने की इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे एक नया ढांचा तैयार हो रहा है. अब सवाल यह है कि कौन किसके साथ सहयोग करेगा. उभरती हुई और मध्यम ताकतों के बीच अगर हितों का सीधा टकराव नहीं है, तो स्वाभाविक है कि वे आपस में सहयोग मजबूत करना चाहेंगी. साथ ही, यह भी स्वाभाविक है कि वे अमेरिका के साथ और निश्चित रूप से चीन के साथ भी सहयोग करेंगी.

जयशंकर ने कहा क‍ि अब इस तरह के सहयोग के कुछ उदाहरण देखते हैं. एक उदाहरण, जिससे ज्यादातर भारतीय अच्छी तरह परिचित होंगे और राजदूत महोदय, आपने भी हिंद-प्रशांत का जिक्र किया, वह है 'क्वाड'.

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ग्लोबल और मिडिल पावर की विदेश मंत्री ने की वकालत

अगर आज हम समुद्री क्षेत्र और हिंद-प्रशांत को देखें, तो 'क्वाड' एक ऐसा उदाहरण है, जहां उभरती और मध्यम ताकतें एक स्थापित बड़ी ताकत के साथ मिलकर सहयोग कर रही हैं. ऐसे ही आईएमईसी पहल (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कनेक्टिविटी कॉरिडोर), इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर या पोलर रूट (नॉर्दर्न सी रूट), ये सभी सहयोग के विषय हो सकते हैं.

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अगर आप ग्लोबल ऑर्डर में अपनी आवाज को मजबूत करने के नजरिए से देखें, तो 'ब्रिक्‍स' एक अच्छा उदाहरण है. असल में 'ब्रिक्‍स' इस बात का उदाहरण है कि आज कई देश महसूस करते हैं कि उनकी सामूहिक आवाज उनकी अलग-अलग आवाजों की तुलना में कहीं ज्‍यादा मजबूत है. अगर मैं रिसोर्स या टेक्नोलॉजी के क्षेत्र की बात करें तो 'पैक्स सिलिका' एक नया उदाहरण है. अगर आप ग्लोबल भलाई के नजरिए से बड़े पैमाने पर सोचें, तो इंटरनेशनल सोलर अलायंस या कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेज‍िलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (सीडीआरआई) जैसे उदाहरण हैं. इन दोनों की शुरुआत भारत ने की थी और ये बहुत सफल रहे हैं; जैसे आज आईएसए के 100 से ज्‍यादा सदस्य हैं.

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जयशंकर ने कहा क‍ि आज स्थिति यह है कि कई देश जरूरी नहीं कि वे दुनिया के सबसे बड़े, दूसरे या तीसरे नंबर के देश हों, जहां उनके हित एक जैसे होते हैं, वहां वे साथ आते हैं. वे काम करने के तरीके ढूंढते हैं, एक एजेंडा बनाते हैं, कभी-कभी संगठन बनाते हैं और सहयोग की आदतें विकसित करते हैं. और यही आज का उभरता हुआ ग्लोबल ऑर्डर है.

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