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ड्रैगन की बादशाहत खत्म, लाख रुकावटें पैदा करने के बावजूद पिछड़ा चीन, भारत बना सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश

चीन लाख रुकावटें पैदा करता रहा, लेकिन भारत की रफ्तार नहीं रोक पाया. हिंदुस्तान ने ड्रैगन द्वारा खाद की सप्लाई में बाधा डालने के बावजूद उसे पछाड़ दिया है. भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इसमें बहुत हद तक चीन के दुश्मन ताइवान की भूमिका है, जिसने भारत की मदद की.

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05 Jan 2026
( Updated: 05 Jan 2026
09:00 PM )
ड्रैगन की बादशाहत खत्म, लाख रुकावटें पैदा करने के बावजूद पिछड़ा चीन, भारत बना सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश

भारत हर मोर्चे पर लगातार तरक्की कर रहा है. धीरे ही सही, हिंदुस्तान चीन को उन क्षेत्रों में मात दे रहा है, जिन पर उसकी बादशाहत रही है और जो कहीं न कहीं भारत की भी बड़ी ताकत बन सकते थे. यानी कि कृषि उत्पाद, मैन्युफैक्चरिंग को लेकर जमीनी स्थिति और मांग दोनों ही देशों में है, लेकिन किसी वजह से दिल्ली कहीं न कहीं बीजिंग से पिछड़ गया. अब जाकर उसे मात दी जा रही है. इसी कड़ी में एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है. दरअसल, भारत ने चावल उत्पादन के मामले में इतिहास रच दिया है और चीन को पीछे छोड़ अब दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है.

यह सब उस वक्त हुआ है, जब ड्रैगन द्वारा लगातार भारत के कृषि उत्पादन में रुकावट डालने की कोशिश की जाती रही. यहां तक कि खाद की आपूर्ति में भी बाधा डाली गई, ताकि खाद्य उत्पादन में दिक्कतें पैदा हों और उसकी सबसे बड़े चावल उत्पादक देश की सत्ता कायम रहे. हालांकि ऐसा नहीं हुआ और कुल 15.18 करोड़ टन उत्पादन के साथ भारत ने 14.5 करोड़ टन चावल उत्पादन वाले देश को पीछे छोड़ दिया है. इस खुशखबरी की जानकारी केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दी. साथ ही उन्होंने 25 फसलों की 184 नई उन्नत किस्में जारी कीं, जिन्हें इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (ICAR) ने विकसित किया है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक और निर्यातक देश

चौहान ने कहा कि भारत ने यह सफलता उच्च पैदावार वाले बीजों के विकास से हासिल की है. साथ ही, देश अब दुनिया के बाजारों में एक बड़ा चावल निर्यातक देश भी है.
केंद्रीय मंत्री ने राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा विकसित 25 फसलों की 184 उन्नत किस्मों को लॉन्च किया. इन 184 किस्मों में 122 अनाज, 6 दालें, 13 तिलहन, 11 चारा फसलें, 6 गन्ना, 24 कपास और जूट एवं तंबाकू की एक-एक किस्म शामिल हैं.

नई किस्में किसानों तक शीघ्र पहुंचाने के निर्देश!

कृषि मंत्री ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि ये नई किस्में किसानों तक शीघ्रता से पहुंचें. नई उन्नत किस्मों के महत्व को समझाते हुए चौहान ने कहा कि किसानों को इनसे लाभ होगा, क्योंकि इनसे अधिक पैदावार और बेहतर गुणवत्ता वाली फसल प्राप्त करने में मदद मिलेगी.

11 वर्षों में 3,236 उच्च उपज वाली किस्मों को दी गई मंजूरी

केंद्रीय मंत्री ने कृषि वैज्ञानिकों से भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए दालों और तिलहनों के उत्पादन को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने को भी कहा. चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद पिछले 11 वर्षों में 3,236 उच्च उपज वाली किस्मों को मंजूरी दी गई है, जबकि 1969 से 2014 के बीच केवल 3,969 किस्मों को मंजूरी मिली थी.

नई जारी की गई किस्मों को कृषि क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की लवणता, सूखा और अन्य जैविक एवं अजैविक तनावों से निपटने के साथ-साथ प्राकृतिक और जैविक खेती पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए विकसित किया गया है.

भारत को चावल उत्पादन में चीन के दुश्मन देश ने दी थी मदद!

आज अगर भारत चावल का सबसे बड़ा उत्पादक है और चीन को पछाड़ पा रहा है, तो उसमें हरित क्रांति के साथ-साथ चीन के दुश्मन ताइवान की भूमिका भी रही है. दरअसल, आजादी के बाद भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, जिससे निपटने में ताइवान ने मदद दी. हुआ ये कि 1960 के दशक में भारतीय किस्म वाली धान की रोपाई से प्रति हेक्टेयर बेहद कम, करीब 800 किलोग्राम चावल का उत्पादन होता था.

ताइवान ने भारत को दीं TN-1 नाम की बौनी धान की किस्म

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इसे बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरक उपलब्ध तो थे, लेकिन लंबा और कमजोर तना होने के कारण भारतीय किस्में ज्यादा खाद और पानी का भार नहीं सह पाती थीं और फसल गिर जाती थी. समाधान के लिए अर्ध-बौनी, मजबूत तने वाली किस्मों की जरूरत थी, जिसे ताइवान ने मुहैया कराया. ताइवान ने बाद में भारत को ताइचुंग नेटिव-1 (TN-1) नाम की बौनी धान की किस्म उपलब्ध कराई, जिसने कमाल कर दिया. यह किस्म अधिक खाद और पानी का बेहतर उपयोग कर पाती थी और यहीं से भारतीय कृषि में हरित क्रांति को नई दिशा मिली. TN-1 को दुनिया की पहली अर्ध-बौनी चावल किस्मों में गिना जाता है.

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