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महिला सशक्तिकरण पर राहुल गांधी की खोखली बयानबाजी बनाम मोदी सरकार का ठोस रिकॉर्ड
महिला सशक्तिकरण के प्रति मोदी सरकार का दृष्टिकोण मूल रूप से अलग रहा है. यह केवल कल्याण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अधिकार, गरिमा, प्रतिनिधित्व, वित्तीय आत्मनिर्भरता, उद्यमिता और महिला नेतृत्व वाले विकास तक विस्तारित हुआ है. इसकी तुलना में राहुल गांधी की बातें सिर्फ खोखली बयानबाजी लगती हैं.
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-ए. शक्तिवेल
पुणे में महिला सशक्तिकरण पर राहुल गांधी की हालिया टिप्पणी सुनने में आकर्षक लग सकती है, लेकिन यह एक बड़ा सवाल खड़ा करती है: क्या महिला सशक्तिकरण को केवल राजनीतिक भाषणों से मापा जाना चाहिए, या फिर उन कानूनों, अवसरों और संस्थाओं से, जो महिलाओं को वास्तव में अधिकार और अवसर प्रदान करते हैं? इस कसौटी पर नरेंद्र मोदी सरकार का रिकॉर्ड व्यापक है, जबकि महिलाओं से जुड़े महत्वपूर्ण सुधारों के मामले में कांग्रेस बार-बार सवालों के घेरे में रही है.
महिला सशक्तिकरण मोदी सरकार ने काम करके दिखाया, आंकड़े गवाही दे रहे
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महिला सशक्तिकरण के प्रति मोदी सरकार का दृष्टिकोण मूल रूप से अलग रहा है. यह केवल कल्याण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अधिकार, गरिमा, प्रतिनिधित्व, वित्तीय आत्मनिर्भरता, उद्यमिता और महिला नेतृत्व वाले विकास तक विस्तारित हुआ है. तत्काल तीन तलाक को समाप्त करने से लेकर विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण को संवैधानिक आधार देने तक, सरकार ने महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण सुधार किए हैं.
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मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. इस कानून ने तत्काल तीन तलाक को अमान्य घोषित किया और मुस्लिम महिलाओं को कानूनी संरक्षण प्रदान किया. लेकिन मुस्लिम महिलाओं को एक मनमानी प्रथा से सुरक्षा देने वाले इस उपाय का स्वागत करने के बजाय कांग्रेस ने विधेयक के पारित होने के दौरान इसका विरोध किया. इसलिए सवाल आज भी प्रासंगिक है: जब कांग्रेस महिलाओं के अधिकारों की बात करती है, तो उसने मुस्लिम महिलाओं को कानूनी संरक्षण और गरिमा देने वाले कानून का विरोध क्यों किया था?
इसी तरह नारी शक्ति वंदन अधिनियम, संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023, महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम है. यह कानून संवैधानिक व्यवस्था के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है. यह स्वतंत्र भारत में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधारों में से एक है. फिर भी कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने महिलाओं के आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़ी परिसीमन प्रक्रिया पर आपत्तियां उठाई हैं. यदि कांग्रेस वास्तव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहती है, तो वह उस संवैधानिक व्यवस्था पर अड़चन क्यों पैदा करती है जिसके माध्यम से यह प्रतिनिधित्व वास्तविकता में बदलना है?
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महिला सशक्तिकरण पर कांग्रेस का दृष्टिकोण विरोधाभासी
यह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं है. यह कांग्रेस के दृष्टिकोण में एक गहरे विरोधाभास को सामने लाता है. महिलाओं के आरक्षण की बात करना एक बात है, लेकिन उसे वास्तविकता में बदलने वाली संवैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना दूसरी. महिलाओं को राजनीतिक दोहरे मापदंड नहीं, वास्तविक प्रतिनिधित्व चाहिए.
कांग्रेस के अपने राज्यों का रिकॉर्ड देखें तो यह विरोधाभास और गहरा हो जाता है. कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में है और राज्य मंत्रिपरिषद में एक भी महिला को मंत्री नहीं बनाया गया है. जो पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर महिला सशक्तिकरण की बात करती है, उसे अपने ही शासन और संगठनात्मक फैसलों में भी अपनी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए.
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कांग्रेस को अपने संगठन के भीतर महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर भी सवालों के जवाब देने होंगे. प्रियंका चतुर्वेदी ने उन पार्टी कार्यकर्ताओं की बहाली पर आपत्ति जताने के बाद कांग्रेस छोड़ी थी, जिनके बारे में उन्होंने कहा था कि उन्होंने उनके साथ दुर्व्यवहार और धमकी दी थी. राधिका खेड़ा ने भी बाद में पार्टी के भीतर उत्पीड़न और अपमान के आरोप सार्वजनिक रूप से उठाने के बाद कांग्रेस छोड़ दी. ये घटनाएं एक सीधा सवाल खड़ा करती हैं: देश को महिलाओं की गरिमा पर भाषण देने से पहले क्या राहुल गाँधी अपने ही राजनीतिक संगठन में महिलाओं की गरिमा और सम्मान सुनिश्चित कर सकते हैं?
मोदी सरकार का रिकॉर्ड केवल कानूनों तक सीमित नहीं है. महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत 68 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं. अप्रैल 2026 तक कुल 57.79 करोड़ से अधिक ऋण स्वीकृत किए जा चुके थे, जिनकी कुल राशि ₹40.07 लाख करोड़ से अधिक थी. इनमें लगभग दो तिहाई ऋण महिला उद्यमियों को दिए गए हैं. यही जमीन पर वास्तविक सशक्तिकरण है. जब किसी महिला को संस्थागत ऋण मिलता है, तो वह केवल सरकारी सहायता प्राप्त नहीं करती. उसे अपना व्यवसाय शुरू करने या उसका विस्तार करने, आय अर्जित करने और औपचारिक अर्थव्यवस्था में भाग लेने का अवसर मिलता है. मोदी सरकार ने महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में देखने के बजाय उन्हें उद्यमी, रोजगारदाता और आर्थिक निर्णयकर्ता बनाने की दिशा में काम किया है.
यही परिवर्तन स्टार्टअप इंडिया में भी दिखाई देता है. डीपीआईआईटी द्वारा मान्यता प्राप्त लगभग आधे स्टार्टअप में कम से कम एक महिला निदेशक है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, स्टार्टअप इंडिया के तहत 75,000 से अधिक महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप को समर्थन दिया गया है. संदेश स्पष्ट है: महिलाएं पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं. वे तेजी से संस्थापक, नवोन्मेषक और कारोबारी नेतृत्वकर्ता बन रही हैं.
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ग्रामीण महिलाओं की कहानी भी उतनी ही प्रभावशाली है. लखपति दीदी ग्रामीण भारत में महिला नेतृत्व वाले विकास के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक बन चुकी है. इस पहल का उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को कम से कम ₹1 लाख की टिकाऊ वार्षिक आय हासिल करने में सक्षम बनाना है. मई 2026 तक, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार, 3.07 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं. जुलाई 2026 तक सरकार ने बताया कि 3.46 करोड़ से अधिक स्वयं सहायता समूह की सदस्यों को लखपति दीदी बनने में सक्षम बनाया गया हैं.
यह एक गहरा सामाजिक परिवर्तन है. जो महिला कभी पूरी तरह घरेलू अर्थव्यवस्था पर निर्भर थी, वह अब आय अर्जित करने वाली, उद्यमी और निर्णयकर्ता बन रही है. स्वयं सहायता समूहों, बैंक ऋण, कौशल, तकनीक और बाजार तक पहुंच के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है.
राहुल गांधी करते रहे सिर्फ खोखली बयानबाजी!
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नमो ड्रोन दीदी पहल इस सशक्तिकरण को एक कदम और आगे ले जाती है. महिला स्वयं सहायता समूहों को कृषि कार्यों के लिए ड्रोन संचालित करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इससे आजीविका के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और आधुनिक तकनीक भारत के गांवों तक पहुंच रही है. सरकार ने ₹1,261 करोड़ के प्रावधान के साथ चयनित महिला स्वयं सहायता समूहों को 15,000 ड्रोन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है.
वित्तीय समावेशन की कहानी भी महत्वपूर्ण है. जुलाई 2026 तक 32.68 करोड़ जनधन खाते महिलाओं के नाम पर खोले गए हैं, जिससे करोड़ों महिलाओं को औपचारिक बैंकिंग और सरकारी वित्तीय प्रणालियों तक सीधी पहुंच मिली. स्टैंड-अप इंडिया के तहत दो लाख से अधिक महिला उद्यमियों को नए उद्यम स्थापित करने में सहायता दी गई है.
लेकिन महिला सशक्तिकरण की कहानी केवल बैंक खाते, ऋण और उद्यमिता तक सीमित नहीं है. यह महिलाओं के दैनिक जीवन, स्वास्थ्य, सम्मान और समय से भी जुड़ी है. इसी दृष्टि से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने गरीब परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. मई 2026 तक गरीब परिवारों की महिलाओं को 10.57 करोड़ से अधिक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए जा चुके हैं. इससे पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम हुई, घरेलू वायु प्रदूषण में कमी आई और महिलाओं के स्वास्थ्य तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ.
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इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन ने महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे को संबोधित किया. देश में 12 करोड़ से अधिक व्यक्तिगत घरेलू शौचालय बनाए जा चुके हैं. शौचालय केवल स्वच्छता का विषय नहीं है; यह महिलाओं की निजता, सुरक्षा, सम्मान और स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा है. स्वच्छ भारत मिशन ने खुले में शौच की समस्या को समाप्त करने की दिशा में एक व्यापक सामाजिक बदलाव को जन्म दिया है.
मोदी सरकार की योजनाओं में भी महिलाओं को दी गई प्राथमिकता
जल जीवन मिशन ने भी ग्रामीण महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव किया है. अगस्त 2019 में मिशन शुरू होने के समय केवल 3.23 करोड़ ग्रामीण परिवारों के पास नल से जल की सुविधा थी. मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक पहुंच गई, यानी लगभग 81.71 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को नल से जल की सुविधा उपलब्ध हो चुकी थी. इसका सबसे बड़ा लाभ उन महिलाओं को मिला है, जिन पर वर्षों से परिवार के लिए दूर-दराज से पानी लाने का बोझ रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार, हर ग्रामीण परिवार तक नल से पानी पहुंचने पर महिलाओं के प्रतिदिन 5.5 करोड़ घंटे तक बच सकते हैं. इस बचाए गए समय का उपयोग महिलाएं शिक्षा, रोजगार, आय अर्जित करने वाली गतिविधियों और परिवार की देखभाल में कर सकती हैं.
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विधायी रिकॉर्ड भी व्यापक है. मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 ने पात्र महिलाओं के लिए सवैतनिक मातृत्व अवकाश 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह किया और क्रेच सुविधाओं तथा घर से काम करने से जुड़े प्रावधान पेश किए. आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 ने यौन अपराधों से संबंधित प्रावधानों को मजबूत किया, जिसमें नाबालिगों से बलात्कार के लिए कड़े दंड शामिल हैं. वेतन संहिता, 2019 ने पारिश्रमिक में लैंगिक समानता के ढांचे को मजबूत किया. सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 का उद्देश्य महिलाओं को शोषण से बचाना है, जबकि चिकित्सकीय गर्भसमापन (संशोधन) अधिनियम, 2021 ने निर्धारित परिस्थितियों में सुरक्षित और कानूनी गर्भसमापन सेवाओं तक पहुंच का विस्तार किया.
बड़ी तस्वीर भी स्पष्ट है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 और 2023-24 के बीच महिलाओं के रोजगार में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है, जबकि पिछले एक दशक में जेंडर बजट में 429 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. सरकार इस बदलाव को महिला विकास से महिला नेतृत्व वाले विकास की ओर बढ़ने के रूप में बताती है.
राहुल गांधी पता होना चाहिए कि महिला सशक्तिकरण केवल भाषणों से शुरू और समाप्त नहीं हो सकता. इसे इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि क्या महिलाओं को अधिक अधिकार, अधिक प्रतिनिधित्व, पूंजी तक अधिक पहुंच, अधिक आर्थिक आत्मनिर्भरता और अधिक गरिमा मिली है.
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भाषणों से निकलकर जमीन पर उतरा महिला सशक्तिकरण
मोदी सरकार का मॉडल अलग है. वह केवल महिलाओं से भारत के विकास में भाग लेने के लिए नहीं कह रही है; वह ऐसी परिस्थितियां बना रही है जिनमें महिलाएं उस विकास का नेतृत्व कर सकें.
तीन तलाक से नारी शक्ति वंदन तक, मुद्रा से स्टार्टअप इंडिया तक, जनधन से लखपति दीदी तक, उज्ज्वला से स्वच्छ भारत और जल जीवन मिशन तक, तथा नमो ड्रोन दीदी से अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक, जोर महिलाओं को अधिकार, संसाधन, अवसर और एक बड़ी आवाज देने पर है.
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इसलिए जब कांग्रेस महिला सशक्तिकरण की बात करती है, तो देश एक सरल सवाल पूछने का हकदार है: जब महिला सशक्तिकरण को कानून में बदलने का अवसर आया था, तब कांग्रेस की यह प्रतिबद्धता कहां थी?
क्योंकि अंततः महिलाओं को सशक्तिकरण पर राजनीतिक भाषणों की जरूरत नहीं है. उन्हें ऐसे कानून चाहिए जो उनकी रक्षा करें, ऐसे अवसर चाहिए जो उन्हें मजबूत बनाएं और ऐसी संस्थाएं चाहिए जो उन्हें आवाज दें. यही वह रिकॉर्ड है जिसे मोदी सरकार ने बनाया है.
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लेखक: ए. शक्तिवेल
अधिवक्ता और सामाजिक टिप्पणीकार
एडिट: केशव झा