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आज भी लालटेन की रोशनी में होती है यहाँ रामलीला! जानिए क्यों खास है 31 दिनों तक चलने की ये अनोखी परंपरा

इस अनोखी परंपरा का इतिहास दो सदी पुराना है जिसकी शुरुआत हुई थी साल 1783 में। काशी के तत्कालीन नरेश उदित नारायण सिंह ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। वो प्रभु श्री राम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाना चाहते थे। यहाँ जो रामलीला दिखाई जाती है उसका आधार हूबहू तुलसीदास की लिखी रामचरितमानस है। यहाँ होने वाली इस ऐतिहासिक रामलीला को UNESCO के Intangible धरोहर में भी शामिल किया गया है।

आज भी लालटेन की रोशनी में होती है यहाँ रामलीला! जानिए क्यों खास है 31 दिनों तक चलने की ये अनोखी परंपरा
Image Credit: Gemini
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आमतौर पर रामलीला की शुरुआत शारदीय नवरात्रि के पहले दिन से होती है। यानी की 10 से 12 दिनों तक भगवान श्री राम के जीवन की लीलाओं का मंचन किया जाता है और विजयादशमी (दशहरा) के दिन रावण दहन के साथ इसका समापन होता है।

लेकिन क्या आपने कभी ऐसी रामलीला के बारे में सुना है जो 31 दिनों तक चलती है? जी हाँ, उत्तर प्रदेश में वाराणसी जिले के रामनगर में रामलीला नवरात्र में नहीं, बल्कि अनंत चतुर्दशी के दिन से ही शुरू हो जाती है। 

पूरा शहर होता है रामायण का मंच

आमतौर पर रामलीला किसी मंच पर भव्य तरीके से प्रस्तुत किया जाता है लेकिन यहाँ आयोजित होने वाली ये एक ऐसी अनोखी रामलीला है जहाँ कोई तय स्टेज नहीं होता, बल्कि पूरा शहर ही रामायण का मंच बन जाता है। 

इस अनोखी परंपरा का इतिहास दो सदी पुराना है जिसकी शुरुआत हुई थी साल 1783 में। काशी के तत्कालीन नरेश उदित नारायण सिंह ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। वो प्रभु श्री राम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाना चाहते थे। यहाँ जो रामलीला दिखाई जाती है उसका आधार हूबहू तुलसीदास की लिखी रामचरितमानस है। यहाँ होने वाली इस ऐतिहासिक रामलीला को UNESCO के Intangible धरोहर में भी शामिल किया गया है। 

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यहाँ रामलीला के लिए अलग अलग स्थान स्टेज के तौर पर इस्तेमाल होते हैं, जैसे- अयोध्या नगरी, अशोक वाटिका, जनकपुरी, पंचवटी और लंका के लिए अलग-अलग मंचों का निर्माण किया जाता है जो पूरे शहर में फैला होता है। ऐसे में आप किसी एक जगह पर बैठ कर रामायण देखने के बजाए अलग-अलग जगहों पर अलग अलग अध्याय देख सकते हैं। यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण है की आज भी काशी नरेश पुरानी परंपरा के तहत शाही ठाठ-बाट के साथ हाथी पर सवार होकर रामलीला देखने के लिए पधारते हैं। 

रोशनी के लिए लालटेन का होता है उपयोग 

यहाँ की एक और ख़ास बात ये है की आज के जमाने में भी यहाँ माइक्रोफोन और एलईडी लाइटों का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि रोशनी के लिए लालटेन या लैंप का उपयोग किया जाता है। रामलीला में हिस्सा लेने वाले कलाकार माइक के बजाय दर्शकों तक आवाज़ पहुंचाने के लिए अपनी बुलंद आवाज का सहारा लेते हैं।

आपको बता दें, रामनगर की ये रामलीला 25 सितंबर से शुरू हो चुकी है और ये अक्टूबर के आखिरी हफ्ते तक चलेगी। 

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