Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...

भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी होगा SIR! ट्रंप प्रशासन के 'वोटर वेरिफिकेशन' को सुप्रीम कोर्ट से मिली हरी झंडी

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को राहत देते हुए राज्यों को मतदाताओं की नागरिकता सत्यापित करने के लिए SAVE डेटाबेस के इस्तेमाल की अनुमति दे दी. यह फैसला नवंबर चुनाव से पहले आया है.

Image Source: VideoGrab (TruthSocial/ @realDonaldTrump)
Loading Ad...

भारत में जिस SIR को लेकर विपक्षी पार्टियों ने तमाम हंगामा किया, अब उसी SIR की प्रक्रिया को अमेरिका में अपनाया जा रहा है. दरअसल, अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले वोटर वेरिफिकेशन को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 25 सितंबर को ट्रंप प्रशासन के संशोधित SAVE डेटाबेस के इस्तेमाल पर लगी रोक को फिलहाल हटा दिया. इसके साथ ही राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के लिए मतदाता सूची में दर्ज लोगों की नागरिकता की पुष्टि करने के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल करने का रास्ता खुल गया है. हालांकि, SAVE का इस्तेमाल राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं है.

क्या है SAVE डेटाबेस?

SAVE (Systematic Alien Verification for Entitlements) एक संघीय कार्यक्रम है, जिसका इस्तेमाल लंबे समय से नागरिकता और इमिग्रेशन स्टेटस से जुड़ी जानकारी की पुष्टि के लिए किया जाता रहा है. ट्रंप प्रशासन ने 2025 में इसके दायरे को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया. संशोधित सिस्टम में अतिरिक्त सरकारी रिकॉर्ड, जिसमें सोशल सिक्योरिटी से जुड़ी जानकारी भी शामिल है, जोड़ी गई और एक साथ बड़ी संख्या में रिकॉर्ड की जांच करने की सुविधा दी गई.

Loading Ad...

यह भी पढ़े: अमेरिका ने दिया ‘धोखा’ तो सऊदी अरब को मिला इस देश का साथ, हूती विद्रोहियों के खिलाफ उतार दी सेना!

Loading Ad...

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट के बहुमत ने निचली अदालत के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसने संशोधित SAVE सिस्टम को इस्तेमाल करने से प्रशासन को रोका था. कोर्ट ने कहा कि संघीय कानून के तहत राज्यों की ओर से नागरिकता और इमिग्रेशन स्टेटस की पुष्टि के अनुरोधों का जवाब देने की संघीय सरकार की जिम्मेदारी है. अदालत ने यह भी कहा कि निचली अदालत का आदेश सरकार को उस सिस्टम के इस्तेमाल से रोक रहा था, जिसे वह इस काम के लिए उपयुक्त मानती है. इस फैसले पर तीन जजों ने असहमति जताई. जस्टिस सोनिया सोतोमायोर, एलेना कगन और केतनजी ब्राउन जैक्सन ने डिसेंट किया. निचली अदालत ने पहले चिंता जताई थी कि डेटाबेस में मौजूद जानकारी की गलतियां नागरिकों की निजता और मतदाता पंजीकरण पर असर डाल सकती हैं.

Loading Ad...

चुनावों पर कितना पड़ेगा असर?

फैसले के बावजूद नवंबर के चुनाव से पहले इसका तत्काल असर सीमित रह सकता है. चुनाव कानून विशेषज्ञ डेविड बेकर के मुताबिक, ज्यादातर राज्यों में चुनाव से 90 दिन पहले व्यवस्थित तरीके से मतदाता सूची से नाम हटाने पर कानूनी पाबंदियां हैं. इसके अलावा SAVE का इस्तेमाल स्वैच्छिक है और डेटा की सटीकता को लेकर भी सवाल उठे हैं. ऐसे में राज्य इसे मतदाता सूची की जांच के दूसरे तरीकों के साथ इस्तेमाल कर सकते हैं.

यह भी पढ़े: मेलोनी सरकार का बड़ा फैसला, विदेशी छात्रों की संख्या पर 30% सीमा, बुर्का-नकाब पर भी लगेगी रोक

Loading Ad...

यह भी पढ़ें

बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ट्रंप प्रशासन को फिलहाल SAVE सिस्टम आगे बढ़ाने की अनुमति मिल गई है, लेकिन इसका इस्तेमाल कैसे और किस सीमा तक होगा, यह काफी हद तक राज्यों के फैसले और चुनाव संबंधी कानूनों पर निर्भर करेगा.

LIVE
Loading Ad...
Loading Ad...
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...