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ट्रंप के इशारे पर कई मुस्लिम देश आए आगे, तो भारत ने दिया झटका; ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से मोदी सरकार ने बनाई दूरी, जानें पूरा मामला

दावोस में WEF से इतर डोनाल्ड ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ लॉन्च किया, जिसे गाजा समेत वैश्विक संघर्षों के समाधान का मंच बताया जा रहा है. हालांकि उद्घाटन से भारत नदारद रहा और अमेरिका को छोड़कर न UNSC के स्थायी सदस्य, न ही G7 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए.

ट्रंप के इशारे पर कई मुस्लिम देश आए आगे, तो भारत ने दिया झटका; ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से मोदी सरकार ने बनाई दूरी, जानें पूरा मामला
Donald Trump (Social Media)
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स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (WEF) के इतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने महत्वाकांक्षी ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का औपचारिक शुभारंभ कर दिया. इस नए अंतरराष्ट्रीय निकाय को लेकर दुनिया भर में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. ट्रंप का दावा है कि यह बोर्ड वैश्विक शांति स्थापित करने, खास तौर पर गाजा जैसे संवेदनशील संघर्षों के समाधान में अहम भूमिका निभाएगा. लेकिन इसके गठन के साथ ही कई बड़े सवाल भी खड़े हो गए हैं. सबसे अहम बात यह रही कि इस उद्घाटन समारोह से भारत पूरी तरह अनुपस्थित रहा. भारत के अलावा अमेरिका को छोड़कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का कोई भी अन्य स्थायी सदस्य और न ही G7 देशों का कोई प्रतिनिधि इस कार्यक्रम में नजर आया. इससे इस बोर्ड की वैश्विक स्वीकार्यता और इसकी मंशा पर संदेह और गहरा गया है.

सूत्रों के मुताबिक भारत उन 60 देशों में शामिल था, जिन्हें इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया था. इसके बावजूद दावोस के रिसॉर्ट में हुए हस्ताक्षर समारोह में भारत का कोई अधिकारी मौजूद नहीं था. भारत सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम पर फिलहाल कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है. माना जा रहा है कि भारत इस पहल को बेहद सावधानी से देख रहा है और जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहता.

किसे चुनौती देगा यह बोर्ड?

‘बोर्ड ऑफ पीस’ के आधिकारिक चार्टर ने अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों को चौंका दिया है. इस चार्टर में गाजा का नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं है. इसके बजाय बोर्ड को ऐसा व्यापक अधिकार क्षेत्र दिया गया है, जो पहले से मौजूद वैश्विक संस्थाओं, खासकर संयुक्त राष्ट्र, की भूमिका को चुनौती दे सकता है. ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि गाजा में सफल होने के बाद यह बोर्ड अन्य क्षेत्रों में भी काम कर सकता है. उन्होंने यहां तक कहा कि एक बार बोर्ड पूरी तरह स्थापित हो गया, तो यह जो चाहे वह कर सकेगा. हालांकि ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर काम कर सकता है. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता और प्रासंगिकता पर सवाल उठाने से भी परहेज नहीं किया. यही वजह है कि कई देशों को डर है कि यह नया मंच भविष्य में संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों को कमजोर कर सकता है.

ट्रंप ने फिर दोहराया अपना पुराना दावा 

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समारोह के दौरान ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान को लेकर एक पुराना दावा फिर दोहराया. उन्होंने कहा कि पिछले साल मई में उन्होंने दोनों देशों के बीच युद्ध को रुकवाकर करोड़ों लोगों की जान बचाई थी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में ट्रंप ने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने उन्हें लाखों जिंदगियां बचाने का श्रेय दिया है. भारत पहले ही इन दावों को सिरे से खारिज कर चुका है. भारत का स्पष्ट रुख है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच बनी आपसी समझ के बाद खत्म हुआ था. भारत ने साफ कहा है कि इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं थी. ऐसे में ट्रंप के बयान को भारत की कूटनीतिक सोच के खिलाफ माना जा रहा है.

ट्रंप के एक इशारे पर पाकिस्तान सक्रिय 

इस समारोह में पाकिस्तान की सक्रिय मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी. कुल 19 देशों के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया. इनमें इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, हंगरी और कजाकिस्तान जैसे 11 देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए. सऊदी अरब, तुर्की, यूएई और कतर जैसे देशों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ वहां के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की उपस्थिति ने कई सवाल खड़े किए. ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की कमान खुद डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में होगी. 

बोर्ड के आजीवन अध्यक्ष हुए ट्रंप

ट्रंप इसके आजीवन अध्यक्ष होंगे. उन्होंने अपनी पसंद के सात लोगों को बोर्ड में शामिल किया है. इनमें मार्को रुबियो, स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर, टोनी ब्लेयर, अजय बंगा, मार्क रोवन और रॉबर्ट गैब्रियल शामिल हैं. खास तौर पर जेरेड कुशनर की भूमिका पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं.कुशनर ने गाजा के विकास के लिए एक योजना भी पेश की है. लेकिन इस योजना में फिलिस्तीनी राज्य के निर्माण का कोई जिक्र नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि हमास का निशस्त्रीकरण, इजरायली सेना की वापसी और स्थानीय राजनीतिक सहमति जैसे मुद्दों के बिना इस योजना को लागू करना बेहद मुश्किल होगा.

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बहरहाल, भारत की बात करें तो फिलहाल वह ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति पर चल रहा है. माना जा रहा है कि 30-31 जनवरी को नई दिल्ली में होने वाली अरब लीग के विदेश मंत्रियों की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती है. इसके अलावा फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित इजरायल यात्रा भी क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से काफी अहम मानी जा रही है. आने वाले समय में भारत का रुख यह तय करेगा कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ वैश्विक मंच पर कितनी गंभीरता से लिया जाएगा.

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