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भारत में वोटर टर्नआउट बढाने के लिए मिले 21 मिलियन डॉलर, ट्रंप के दावे में कितना दम

साल 2001 से 2024 के बीच, USAID ने भारत को कुल 2.9 बिलियन डॉलर दिए हैं. यह सालाना औसतन 119 मिलियन डॉलर है. इस राशि का 1.3 बिलियन डॉलर या 44.4 फीसदी बीजेपी के नेतृत्व वाली NDA सरकार (2014-2024) के दौरान दिया गया था. कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार (2004-2013) के दौरान, भारत को 1.2 बिलियन डॉलर या 41.3 प्रतिशत अनुदान मिला.

भारत में वोटर टर्नआउट बढाने के लिए मिले 21 मिलियन डॉलर, ट्रंप के दावे में कितना दम
23.6 मिलियन डॉलर देकर बांग्लादेश की सत्ता का तख्तापलट कर दिया गया, ऐसा दावा किया जा रहा है।182 करोड़ भारत में भी दिया गया मोदी को हटाने के लिए, ट्रंप अपने तीन बयानों में भारत को मिले USAID का जिक्र कर चुके है कह चुके है कि वो भारत सरकार से इस बारे में बात करेंगे, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर जांच बिठा दी है। तो आज बात करेंगे ट्रंप के उन तीन बयानों की और आपको सामने आंकड़ें रखेंगे उस पैसे के, जिसके बारे में दावा किया गया कि मोदी को हटाने के लिए इस पैसे का इस्तेमाल किया गया। और वो तो भला हो भारत के लोगों का जो इस जाल में कम फंसे है। तो चलिए शुरु करते है ट्रंप के पहले बयान से। ट्रम्प ने कहा कि मैं हैरान हूं, इतना पैसा पाकर भारत क्या सोचता होगा। ये एक किक-बैक स्कीम है। जो लोग ये पैसा भारत को भेज रहे हैं, उसका कुछ हिस्सा लौटकर उन्हीं लोगों के पास आ रहा है। मैं भारत में वोटर टर्नआउट की परवाह क्यों करूं? हमारी अपनी परेशानियां कम नहीं हैं। हमें अपने टर्नआउट पर ध्यान देना चाहिए। हमने ये सारी स्कीमें बंद कर दी हैं। अब हम सही रास्ते पर हैं।


ये था ट्रंप का आखिरी बयान उससे पहले ट्रंप ने दावा किया था कि बाइडे भारत में किसी और को जिताना चाहते थे। इसी के लिए बाइडेन ने भारत में वोटर टर्नआउट बढाने के लिए 182 करोड़ रुपए का फंड दिया था। ये बड़ा खुलासा है और भारत सरकार से इस बारे में बात करेंगे। ये आरोप कितना खतरनाक है उसका अंदाजा आप इस बात ये लगा सकते है की ट्रंप ने कि यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) ने वोटर टर्नआउट बढ़ाने के नाम पर भारत को 182 करोड़ रुपए का फंड दिया। अमेरिकी चुनाव में रूस ने सिर्फ 2 हजार डॉलर (1.73 लाख रुपए) का इंटरनेट विज्ञापन दिया तो मुद्दा बना था, जबकि अमेरिका भारत को बड़ी रकम दे रहा था।

इसके बाद ट्रंप ने कहा कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा टैरिफ लगाने वाला देश है खासतौर पर हमारे लिए, मै भारत का और उनके प्रधानमंत्री का सम्मान करता हूं लेकिन 182 करोड़ क्यों। तो ट्रंप ने जो आरोप लगाए उसके बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि आरोप चिंताजनक है और हम इस मामले की हम जांच कर रहे है।जांच से पहले कुछ भी कहना गलत है।

अब आप समझ लिजिए की भारत में पैसा किसे मिला क्यों मिला और कब मिला। इंडिया टूडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक।"पिछले 24 साल में भारत को जो अनुदान मिला है, 2.9 बिलियन डॉलर है। ये अनुदान सालाना औसतन 119 मिलियन डॉलर है। इस अनुदान का 1.3 बिलियन डॉलर यानि 44.4 फिसदी हिस्सा 2014 से 2024 के बीच मिला है। मतलब मोदी सरकार में। 2004-2013 के यूपीए के दौरान 1.2 बिलियन डॉलर यानि 41.3 फिसदी हिस्सा मिला है।

2021 और 2024 के बीच 650 मिलियन डॉलर दिया गया।
अकेले 2022 में 228.2 मिलियन डॉलर दिया गया।

तो ये जो 2.9 बिलियन डॉलर मिला है इसका बड़ा हिस्सा स्वास्थय और जनसंख्या में सेक्टर में दिया गया है जो करीब 56 फीसदी था। 'गवर्नेंस' सेक्टर को सिर्फ 4.2 फीसदी या 121 मिलियन डॉलर।
 
चुनाव और लोकतांत्रिक भागीदारी और नागरिक समाज' उद्देश्यों के लिए 14.6 मिलियन डॉलर दिए गए। ये फंड पहली बार यू.एस. वित्त वर्ष 2013 में दिए गए थे।

तो चलिए अब आते है चुनावों पर। भारत में चुनावी लिहाज से जो पैसा दिया गया को CEPPS को दी गई, जिसमें NGO शामिल हैं, जिनका मकसद दुनिया भर में लोकतांत्रिक  संस्थानों को आगे बढ़ाना और उनका समर्थन करना है। 2014 में भारत में चुनाव होने थे और 2013 में CEPPS ने पांच लाख डॉलर का फंड देने की मांग की थी, लेकिन USAID के द्वारा ये फंड़ नहीं दिया गया। मतलब दिया तो गया लेकिन 2013 में ही नहीं दिया गया। ये फंड 2013 और 2018 के बीच दिया गया। और वो भी 484,158 डॉलर। यहां पता चलता है कि  2018 के बाद चुनाव के मकसद के तहत कोई फंड नहीं दिया गया। और गौर करने वाली बात ये है कि 2014 में मोदी सरकार में आ चुके थे।

और मौजूदा वक्त में ये CEPPS की जो वेबसाइट है वो भी चालू नहीं है। हालांकि 2013 में फंड की शुरुआती रकम आ गई थी जो 365,000 डॉलर थी।और बाकी जो अनुदान था वो 2020 से 2024 के बीच आया है। चुनावों में लोकतांत्रिक भागीदारी बढाने के लिए जो पैसा आया है वो कुल 14.1  मिलियन डॉलर था, जो नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट को भी मिला है। ये नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट अमेरिकी गैर-सरकारी संगठन है। जिसका घोषित मिशन नागरिक भागीदारी, खुलेपन और जवाबदेही के माध्यम से दुनिया भर में लोकतांत्रिक संस्थानों का समर्थन और मजबूती प्रदान करना। तो देखिए ये जो 14.1 मिलियन डॉलर मिला है वो भी वैसे तो अमेरिकी एनजीओ को ही मिला है। लेकिन यहां जो दावा किया है कि 21 मिलियन डालर दिया गया है वो दावा कहीं मिला नहीं है।हां बांग्लादेश को जरुर 23.6 मिलियन डॉलर चुनाव के लिए USAID की तरफ से बांग्लादेश को दिए गए थे। जिसका असर वहां देखने को मिला है। हां लेकिन यहां ये भी सोचना जरुरी हो जाता है कि 2013 से 2024 के बीच ज्यादा पैसा क्यों दिया गया। क्या यहां मौजूदा सरकार के खिलाफ नैरिटिव तैयार करना था, और उसी की कारण रहा मोदी सरकार 240 पर सिमट गई। बाकि आंकड़े सारे आपके सामने रखे गए है। 

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