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‘BNP जीते या जमात, डरकर नहीं छोड़ेंगे अपना धर्म…’ चुनाव से पहले बोले बांग्लादेशी हिंदू, सुनाई जुल्म की दास्तान

बांग्लादेश में होने वाले चुनाव से पहले हिंदुओं ने अपने ऊपर हो रहे जुल्म की दास्तान बयां की है. उनका कहना है कि जैसे ही चुनाव आते हैं, उनको निशाना बनाया जाता है. उन्होंने दो टूक कहा कि कोई भी सरकार आए, वे अपने धर्म-परंपराओं से समझौता नहीं करेंगे.

बांग्लादेश में बढ़े हिंदुओं पर अत्याचार के मामले (सांकेतिक तस्वीर)

बांग्लादेश में जल्द ही राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं और देश की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है. दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन वहां बढ़ती राजनीतिक हिंसा और अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे हमलों को लेकर चिंता जता चुके हैं. आगामी 12 फरवरी को होने वाले चुनाव से पहले पूरे देश में हिंसा की घटनाओं में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है. जनवरी महीने में हिंसा से जुड़ी घटनाएं दिसंबर 2025 के मुकाबले कई गुना बढ़ गई हैं. इस दौरान अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले न सिर्फ बढ़े हैं, बल्कि उन्हें चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है.

हिंदुओं के सामने जीवन-मरण का सवाल

इस हालात में बांग्लादेशी हिंदुओं के सामने जीवन और अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया है. आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में हालात और भी खराब हो सकते हैं. इसकी बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को बढ़त मिलती दिख रही है, जबकि जमात-ए-इस्लामी, NCP और इंकलाब मंच पीछे नजर आ रहे हैं.

यह भी आशंका जताई जा रही है कि अगर शेख हसीना की सरकार को हटाने वाले आंदोलन की अगुवाई करने वाली जमात और अन्य कट्टरपंथी दल सत्ता में नहीं आए, तो देश में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क सकती है और हालात अराजकता की ओर जा सकते हैं. ऐसे में अल्पसंख्यक हिंदू सबसे आसान निशाना बन सकते हैं.

हालांकि मजबूरी में हिंदू समुदाय BNP को वोट देने की ओर झुकता नजर आ रहा है. उनके लिए स्थिति ‘इधर कुआं, उधर खाई’ जैसी है, क्योंकि BNP का भारत को लेकर रुख भी सख्त रहा है और उसके पाकिस्तान से करीबी संबंध रहे हैं. इसके बावजूद हिंदू समुदाय यह मान रहा है कि BNP, जमात की तुलना में कम कट्टरपंथी विकल्प है.

‘हम हिंदू हैं, हमारी किस्मत में जुल्म लिखा है’

भारतीय मीडिया दैनिक भास्कर से बातचीत में ढाका की एक हिंदू महिला ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा, “हमें समझ नहीं आता कि चुनाव में क्या करें. जैसे ही चुनाव आते हैं, हमें परेशान किया जाने लगता है. हम हिंदू हैं, हमारी किस्मत में तो जुल्म लिखा है.”

उन्होंने बताया कि ढाका में हालात कुछ हद तक बेहतर हैं, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में स्थिति बेहद खराब है. “मैं ढाका में रहती हूं, इसलिए ज्यादा दिक्कत नहीं होती. लेकिन चटगांव, खुलना, जॉयपुरहाट और लालमोनिरहाट जैसे इलाकों में हिंदुओं पर बहुत जुल्म होते हैं. फिर भी ये देश हमारा है. हम इसे छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे.”

‘डर के मारे नहीं छोड़ेंगे अपना धर्म’

निशा के साथ मौजूद सोमा ने भी दो टूक कहा, “यह मेरा देश है. मेरा जन्म यहीं हुआ है और मैं यहीं रहना चाहती हूं. कोई भी सरकार आए, लेकिन हम अपने धर्म को उसी तरह मानेंगे, जैसे अब तक मानते आए हैं.” उनका साफ कहना था कि चाहे BNP जीते या जमात, वे डर के मारे न अपना धर्म छोड़ेंगे और न अपनी संस्कृति.

जमात या BNP-हिंदू किसे देंगे वोट?

पेशे से डॉक्टर सुनीरमल रॉय ने मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा, “अब चुनाव BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच होना है. शेख हसीना की अवामी लीग पर बैन लग चुका है. फिलहाल साफ नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा.” उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान हिंदू समुदाय पर दबाव बढ़ जाता है. “चुनाव आते ही हमारे लोगों को परेशान किया जाता है. कई बार घरों पर हमले होते हैं और धमकियां दी जाती हैं.”

जब उनसे पूछा गया कि हिंदू समुदाय किसे वोट देगा, तो उन्होंने कहा, “हमें पता है कि जमात-ए-इस्लामी एक कट्टर इस्लामिक पार्टी है. BNP एक लोकतांत्रिक पार्टी है. इसलिए ज्यादातर हिंदू BNP को ही समर्थन देंगे. जमात को बहुत कम हिंदू वोट करेंगे.”

हिंसा के आंकड़े डराने वाले

  •  ईशनिंदा के झूठे आरोपों में गिरफ्तारी: 36 मामले
  • 1 से 27 जनवरी 2026 के बीच सांप्रदायिक हिंसा के केस: 42
  • शेख हसीना सरकार गिरने के बाद धार्मिक हिंसा के मामले: 2000 से अधिक

बांग्लादेश में हिंदू आबादी की स्थिति

  • हिंदू आबादी: लगभग 1.31 करोड़ (कुल आबादी का 7.95%)
  • कुल आबादी: करीब 16.98 करोड़
  • धार्मिक स्थिति: इस्लाम के बाद हिंदू धर्म दूसरा सबसे बड़ा धर्म
  • कोई हिंदू बहुसंख्यक जिला नहीं: किसी भी जिले में हिंदुओं की आबादी 50% से अधिक नहीं

सबसे अधिक हिंदू आबादी वाले जिले:

  • गोपालगंज - 27%
  • मौलवीबाजार - 24%
  • ठाकुरगांव - 22%
  • खुलना - 21%
  • पिरोजपुर - 15%
  • चटगांव - 11%
  • बारीसाल - 11%

चुनाव नजदीक आते ही बढ़ी हिंसा

मानवाधिकार संगठन आइन ओ सालिश केंद्र (ASK) की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी में राजनीतिक हिंसा की 75 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 616 लोग घायल और 11 लोगों की मौत हुई. इसके मुकाबले दिसंबर 2025 में 18 घटनाएं, 268 घायल और 4 मौतें दर्ज हुई थीं. रिपोर्ट के अनुसार, 22 जनवरी को चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद हिंसा और तेज हो गई. 21 से 31 जनवरी के बीच 49 झड़पों में 4 लोगों की मौत और 414 लोग घायल हुए.

पत्रकार भी बने निशाना

ASK ने यह भी बताया कि राजनीतिक हिंसा के बीच पत्रकारों को भी निशाना बनाया जा रहा है. दिसंबर में जहां 11 पत्रकारों के साथ हमले या बाधा की घटनाएं हुईं, वहीं जनवरी में यह संख्या बढ़कर 16 हो गई. यह जानकारी बांग्लादेश के प्रमुख अखबार द डेली स्टार ने दी.

‘निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं’

इस बीच, अमेरिकी थिंक-टैंक अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल रूबिन ने कहा है कि बांग्लादेश में होने वाले चुनाव न तो स्वतंत्र होंगे और न ही निष्पक्ष. उन्होंने कहा,
“बांग्लादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तभी संभव हैं, जब सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने का मौका मिले.” रूबिन के मुताबिक, अवामी लीग पर बैन लोकतांत्रिक सिद्धांत नहीं, बल्कि राजनीतिक डर को दर्शाता है. उनका कहना है कि यही वजह है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र की साख पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.

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