ऑपरेशन सिंदूर: 88 घंटे में घुटनों पर आ गया था पाक, स्विस थिंक टैंक ने स्वीकारा भारत का ‘पराक्रम’, रिपोर्ट में खोली पाकिस्तान की पोल
स्विस थिंक टैंक की एक रिपोर्ट ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारतीय सेना के दबदबे की पुष्टि की है, और पाकिस्तान के झूठे दावों की पोल खोलकर रख दी है.
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स्विस मिलिट्री थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर मिलिट्री हिस्ट्री एंड पर्सपेक्टिव स्टडीज’ (CHPM) द्वारा प्रकाशित 47 पृष्ठों के एक विस्तृत दस्तावेज में भारतीय वायुसेना के पराक्रम का उल्लेख किया गया है. इस रिपोर्ट के अनुसार, ‘ऑपरेश सिंदूर’ के दौरान भारत ने पाकिस्तान पर निर्णायक बढ़त हासिल की थी.
88 घंटे तक चली थी भीषण लड़ाई
7 मई से 10 मई 2025 के बीच चले इस 88 घंटे के भीषण हवाई संघर्ष में भारतीय वायुसेना ने सीमा पार स्थित आतंकी ठिकानों नेस्तनाबूद कर दिया था. राफेल और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों का उपयोग करते हुए भारत ने बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद और मुरीदके में लश्कर-ए-तैयबा के मुख्य ठिकानों को सटीकता से ध्वस्त कर दिया था.
पाकिस्तान ने किया सरेंडर
युद्ध के दौरान पाकिस्तान की ओर से पीएल-15 मिसाइलों और 900 से अधिक ड्रोनों के जरिए हमले की कोशिश की गई, लेकिन भारत के S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम इन सभी हमलों को हवा में विफल कर दिया. वहीं, अपनी सैन्य प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह खो देने के बाद पाकिस्तान ने 10 मई की दोपहर तक युद्धविराम का प्रस्ताव रखा, जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया.
संघर्ष की शुरुआत कब हुई?
पहलगाम हमले के बाद देश के अंदर गुस्सा था. भारतीय सेना ने पाकिस्तान में छिपे आतंकियों को सबक सिखाने के लिए 7 मई की रात को ही सीमा पार आतंकियों के ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर के तहत हमला कर दिया. इस हमले में आतंकियों के सभी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया गया. उसके बाद पाकिस्तान बौखलाया लेकिन अंततः युद्धविराम ही उसके लिए एक मात्र उपाय बना.
क्या कहता है ‘स्विस स्टडी’?
सैन्य इतिहासकार एड्रियन फोंटानेलाज ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है. ये रिपोर्ट स्विस वायु सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल और रक्षा विशेषज्ञों के एक उच्च स्तरीय पैनल ने किया है. रिपोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष है कि भारत ने अपने राजनीतिक और सैन्य उद्देश्यों को पूरी तरह से हासिल किया. इस कार्रवाई के माध्यम से भारत ने न केवल सीमा पार सक्रिय आतंकी नेटवर्क को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि पाकिस्तान की हवाई प्रतिरोध क्षमता को भी निष्प्रभावी कर दिया. यही कारण रहा कि यह टकराव आधुनिक समय के अन्य युद्धों की तरह लंबा खिंचने के बजाय बहुत जल्द ही निर्णायक साबित हुआ.
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