भोजशाला में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल: नमाज और सरस्वती पूजा साथ-साथ, 8 हजार जवान रहे तैनात
22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला में नमाज और सरस्वती पूजा दोनों की इजाजत दी थी. इस फैसले के बाद बंसत पंचमी और जुमे की नमाज सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई.
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सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद मध्य प्रदेश के धार में भोजशाला में सांप्रदायिक सौहार्द दिखा. भोजशाला में जुमे की नमाज और बसंत पंचमी पर मां वाग्देवी की पूजा साथ-साथ हुई. भोजशाला–कमल मौला मस्जिद परिसर में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने शांतिपूर्वक जुमे की नमाज अदा की, दूसरी ओर शाम को सरस्वती पूजा की गई.
नमाज का समय में दोपहर एक बजे से तीन बजे तक था. कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच प्रशासन ने मुस्लिम प्रतिनिधियों को सुरक्षित तरीके से परिसर तक पहुंचाया. उन्हें बख्तरबंद वाहन में ले जाया गया. कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, दोनों समुदायों के लिए परिसर में अलग-अलग स्थान और आने-जाने के रास्ते तय किए गए थे. नमाज पूरी होने के बाद सभी लोगों को सुरक्षित रूप से परिसर से वापस ले जाया गया.
चप्पे-चप्पे पर तैनात रही पुलिस
प्रशासन ने हर स्थिति से निपटने के लिए व्यापक इंतजाम किए थे. भोजशाला परिसर को 6 सेक्टर में बांट दिया गया था. इसके साथ ही शहर में भी चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात किया गया था. इस दौरान शहर को 7 जोन में बांटा गया. स्थानीय पुलिस, CRPF और रैपिड एक्शन फोर्स के 8 हजार से ज्यादा जवान पूरे शहर में तैनात थे. इसके अलावा ड्रोन कैमरों से भी पैनी नजर रखी गई. इसके लिए AI कैमरों की मदद भी ली गई. पूरे इलाके की 3डी मैपिंग कर चौबीसों घंटे निगरानी सुनिश्चित की गई.
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
दरअसल, 22 जनवरी को हिंदुओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया था. लंबे समय से चले आ रहे इस मामले में दायर एक नई याचिका पर सुनवाई करते हुए SC ने कहा है कि पूजा भी होगी और नमाज भी अदा की जाएगी. अदालत ने बसंत पंचमी पर भोजशाला में सरस्वती पूजा और नमाज पढ़ने के लिए अलग-अलग टाइमिंग की मंजूरी दी थी. कोर्ट ने प्रशासन से सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम करने के आदेश दिए थे. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने मामले में फैसला सुनाया था. बेंच ने बसंत पंचमी पर हिंदू समुदाय को सरस्वती पूजा और उससे जुड़े धार्मिक रीति-रिवाज करने की अनुमति दी थी. वहीं दो घंटे की समय सीमा में मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई.
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अदालत ने अपने फैसले में आपसी सम्मान, सहनशीलता और स्थानीय प्रशासन के साथ पूरे सहयोग पर ज़ोर दिया, ताकि 11वीं सदी के ASI संरक्षित स्मारक में शांति बनी रहे. यह वही स्थल है जिसे हिंदू समुदाय लंबे समय से सरस्वती मंदिर और मुस्लिम समुदाय कमल मौला मस्जिद के रूप में पहचानते आए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दोनों पक्षों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया.
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हिंदू श्रद्धालुओं ने सुबह के समय केसरिया सजावट के साथ फूल चढ़ाकर सरस्वती पूजा की. वहीं मुस्लिम पक्ष ने तय समय के अनुसार नमाज अदा की. इसे संवेदनशील स्थल पर आपसी सह-अस्तित्व की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है. अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, जबकि इस स्थान से जुड़ा मलिकाना हक का बड़ा विवाद अभी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में विचाराधीन है.
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