क्या है रोमियो-जूलियट क्लॉज? जो नाबालिगों के प्यार की करेगा हिफाजत! SC ने दिया लागू करने का संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पॉक्सो कानून में रोमियो-जूलियट क्लॉज जोड़ने पर विचार करने के निर्देश दिए है. SC ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को रद्द करते हुए इसका जिक्र किया.
Follow Us:
Romeo Juliet Clause: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पॉक्सो एक्ट (Pocso Act) के गलत इस्तेमाल पर संज्ञान लेते हुए रॉमियों-जूलियट क्लॉज जोड़ने की बात कही है. सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए कदम उठाने के निर्देश दिए हैं. ताकि नाबालिगों के प्यार का मामला कोर्ट और अपराध के दायरे में न पहुंचे.
सुप्रीम कोर्ट में ये मामला UP सरकार के जरिए पहुंचा. सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में जमानत दे दी थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस आदेश को गलत तो माना, लेकिन आरोपी की जमानत को बरकरार रखा. हाई कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए थे, जिसमें यह भी शामिल था कि पॉक्सो अधिनियम के तहत हर मामले में, पुलिस को शुरुआत में ही चिकित्सा आयु-निर्धारण परीक्षण करना होगा. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देते समय निर्देश दिया था कि पॉक्सो के हर मामले में पुलिस को शुरु में ही पीड़ित का मेडिकल कराना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को रद्द किया
मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह ने की. शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए माना कि जमानत के चरण में पीड़ितों की मेडिकल ऐज निर्धारण के संबंध में उच्च न्यायालय का निर्देश दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 (जमानत प्रदान करना) के तहत अधिकार क्षेत्र से बाहर था. हाई कोर्ट पॉक्सो अधिनियम के तहत मामलों में जमानत के प्रोसेस में पीड़ितों की अनिवार्य मेडिकल उम्र निर्धारण का आदेश नहीं दे सकते. शीर्ष अदालत ने साफ किया कि जमानत के चरण में हाई कोर्ट अनिवार्य जांच प्रोटोकॉल जारी नहीं कर सकता और न ही मिनी ट्रायल आयोजित कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि वह पॉक्सो कानून के तहत किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने वास्तविक संबंधों को कानूनी कार्रवाई की कठोरता से बचाने के लिए रोमियो जूलियट क्लॉज शामिल करने पर विचार करे. कोर्ट का कहना है इस के प्रावधान से उन किशोरों को बचाया जा सकेगा, जो नासमझी में आपसी सहमति से रिश्ते बनाते हैं.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, इस कानून का बार-बार दुरुपयोग होते देखा गया है. यानी बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया ये कानून कई बार उनके खिलाफ ही इस्तेमाल किया जाता है. कोर्ट ने माना कि ऐसे केस में न्याय की अवधारणा ही धूमिल हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में एक फैसले की प्रति भारत सरकार के कानून सचिव को भेजने के निर्देश दिए हैं. इसका मकसद पॉक्सो के गलत इस्तेमाल को रोकने और खतरे से बचाना है.
क्या है रोमियो जूलियट क्लॉज?
रोमियो जूलियट क्लॉज पॉक्सो कानून के तहत ही आता है. इसका मकसद नाबालिग किशोरों के बीच सहमति से चलने वाले यौन संबंधों की रक्षा करना है. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. जैसे 17 साल की लड़की के 18 साल के लड़के के साथ सहमति से संबंध बनते हैं. ऐसे रिलेशनशिप में परिवार लड़के के खिलाफ पॉक्सो के तहत मामला दर्ज करा देते हैं और पॉक्सो में सहमति की कोई जगह नहीं है. ऐसे में नाबालिग होते हुए भी आरोपी को गंभीर सजा भुगतनी पड़ती है. अब सुप्रीम कोर्ट नाबालिगों को गंभीर सजा से बचाने के लिए रोमियो जूलियट क्लॉज जोडने पर विचार कर रहा है. खासकर जब संबंध सहमति से बनें हों. शीर्ष अदालत का मानना है कि ऐसे कानून लाएं जाएं जो यह पहचान सके कि कौन से मामले गलत हैं और कौन से वास्तव में अपराध है. यानी दो किशोर सहमति से संबंध में हैं और उम्र में करीब हैं, तो अदालतें मामले का फैसला करते समय इस पर विचार कर सकती हैं. तो अदालतें अधिक उदार दृष्टिकोण अपनाती हैं. लेकिन अगर उम्र में बड़ा अंतर है या जबरदस्ती शामिल है, तो कानून अपना काम करेगा.
पॉक्सो अधिनियम में रोमियो जूलियट का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में इसका जिक्र करना जरूरी हो जाता है. कोर्ट ने कहा कि इन कानूनों (पॉक्सो एक्ट) के दुरुपयोग का बार-बार न्यायिक संज्ञान लिया जा चुका है, इसलिए इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए, ताकि वे इस समस्या को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने पर विचार करें. इसमें वास्तविक किशोर संबंधों को इस कानून के दायरे से छूट देने वाला रोमियो-जूलियट खंड शामिल करना भी शामिल हो. कोर्ट ने कहा, एक ऐसा सिस्टम बनाया जा सके जिससे उन लोगों पर केस हो जो इन कानूनों का गलत इस्तेमाल करके बदला लेना चाहते हैं.
Advertisement
यह भी पढ़ें
Advertisement