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संन्यासियों का क्यों नहीं होता अंतिम संस्कार? जानें कैसे दी जाती है समाधि, कब्र से कितनी अलग होती है

संन्यास परपंरा से जुड़े लोगों का दाह संस्कार क्यों नहीं होता है? आख़िर उन्हें भू समाधि दी क्यों दी जाती है. किसी भी संन्यासी की समाधि उसके पद के अनुसार होती है, अगर कोई बड़ा संन्यासी है तो उसे बक्से में बिठाकर समाधि दी जाती है.

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जोधपुर में कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा के निधन के बाद आज उनके शरीर को उनके गांव बालोतरा में लाकर समाधि दे गई. जिसमें बड़ी संख्या में साधु-संत और लोग मौजूद रहे. साध्वी को दी गई समाधि के बाद से ही अब लोगों के मन में ये सवाल उठ रहा है कि आख़िर संन्यास परपंरा से जुड़े लोगों का दाह संस्कार क्यों नहीं होता है? आख़िर उन्हें भू समाधि दी क्यों दी जाती है. 

किसे दी जाती है समाधि?

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष स्वामी रवींद्रपुरी जी महाराज की मानें तो प्रत्येक साधु को समाधि नहीं दी जाती है. शरीर शांत होने के बाद समाधि सिर्फ उन्हीं लोगों को दी जाती है, जो मृत्यु से पहले विधी-विधान से कुंभ के दौरान संन्यास की दीक्षा लेता है. वैष्णव परंपरा से जुड़े बैरागी साधुओं को समाधि नहीं दी जाती है. 

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स्वामी रवींद्रपुरी के अनुसार किसी भी व्यक्ति को संन्यास की दीक्षा देने से पहले उसे सफेद कपड़ा पहनाया जाता है. उसे जनेऊ और शिखा के साथ ब्रह्मचारी रूप में रखा जाता है. फिर इसके बाद उसका पिंडदान कराया जाता है. क्योंकि वो अपना पिंडदान कर चुका होता है, इसलिए उसका जब कभी भी वो अपनी आयू पूरी करता है या फिर निधन होता है, तो उसका दाह संस्कार नहीं होता है, बल्कि उसे भू समाधि दी जाती है.

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कितने दिनों में पूरी होती है समाधि की प्रक्रिया?

जिस तरह एक आम इंसान के अंतिम संस्कार की प्रकिया 13 दिनों में पूरी होती है. उसी तरह संन्यासियों की समाधि की प्रक्रिया 16 दिनों में जाकर पूरी होती है. जब किसी संन्यासी की मृत्यु होती है तो उसे ब्रह्मलीन या फिर कैलाशवास होना कहा जाता है. संन्यासी के देहांत होते ही सभी संतगण वहां इकट्ठे होते हैं, वहां पर शंखनाथ होता है. समाधि में बिठाने से पहले मृत संन्यासी को चंदन, भस्म आदि लगाता जाता है. संतगण और शिष्यगण दिवंगत संन्यासी को माला और शॉल पहनाते हैं. इसके बाद उन्हें विधि-विधान से समाधि दी जाती है. 

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किसी भी संन्यासी की समाधि उसके पद के अनुसार होती है, अगर कोई बड़ा संन्यासी है तो उसे बक्से में बिठाकर समाधि दी जाती है. 

क्या होता है षोडषी भंडारा?

संन्यासी को समाधि देने के बाद उसके लिए गीता का पाठ रखा जाता है, इसके बाद 16वें दिन षोडषी भंडारा किया जाता है. इस भंडारे में उन 16 संन्यासियों को बुलाया जाता है, जिन्होंने विधिवत संन्यास की दीक्षा ली होती है और वो संन्यास के नियमों का पालन करते हैं. इस षोडषी भंडारे में उन्हें विशेष रूप से एक झोले में 16 वस्तुएं रखकर दी जाती है. इसके बाद जिस तरह आम आदमी की तेरही के बाद बरसी की परपंरा होती है, वैसे ही संन्यासी का वार्षिक भंडार लोग अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार करते हैं. 

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कितने प्रकार की होती है समाधि?

सनातन परंपरा में किसी भी संन्यासी को मुख्य रुप से दो तरह से जल और भूसमाधि दी जाती रही है. इसमें जल समाधि की प्राचीन परंपरा रही है. जिसके तहत संन्यासी को गंगा जी में सीधे समाधि दी जाती थी. इसके पीछे मान्यता ये थी कि गंगा जी में समाधि पाने वाले संन्यासी को सीधे बैकुंठ की प्राप्ति होती है, लेकिन गंगा में बढ़ते प्रदूषण के चलते अब जल समाधि की परंपरा बंद हो गई है और सिर्फ भू समाधि ही प्रचलन में है. इसी प्रकार सनातन परंपरा में पहले जीवित समाधि लेने की भी परंपरा रही है, जो अब बंद हो गई है. 

क्या कब्र से अलग होती है समाधि?

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स्वामी रविंद्र पुरी जी के अनुसार समाधि कब्र से बिल्कुल अलग होती है. उनके अनुसार कब्र में मृत व्यक्ति को लिटाकर मिट्टी दी जाती है, जबकि संन्यासी को भजन की मुद्रा में बिठाकर उसके हाथ में माला देकर समाधि दी जाती है. किसी भी संन्यासी की मृत्यु के बाद उन्हें बैठी हुई मुद्र में आश्रम के उत्तर दिशा में गढ्ढा खोदकर समाधि दी जाती है. समाधि में उनके शरीर पर चीनी, नमक आदि डाला जाता है. 

भगवान शिव को क्यों प्रतिष्ठित किया जाता है?

जिस प्रकार कोई व्यक्ति यात्रा में निकलता है तो उसके लिए खाने-पीने की चीजें और पात्र दिए जाते हैं. वैसे ही अनंत यात्रा पर निकले संन्यासी के लिए भी रोट और कमंडल आदि वस्तुएं रखी जाती हैं. इसके बाद उस संन्यासी को मिट्टी देकर ढक दिया जाता है. इसे कच्ची समाधि कहते हैं. एक साल बीते के बाद समाधि पक्की कर दी जाती है और उस पर भगवान शिव को प्रतिष्ठित किया जाता है. देश के तमाम आश्रम में समाधि स्थल को बाद में गुरु स्थान या फिर कहें देव स्थान मान कर पूजने की परंपरा चली आ रही है. 

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संन्यासी क्यों करते हैं अपना पिंडदान

हिंदू धर्म में संन्यास लेने के लिए पिंडदान इसलिए जरूरी माना गया है, क्योंकि ऐसा करने के बाद उसका किसी से कोई कनेक्शन नहीं रह जाता है. और संसार के सभी माया-मोह से दूर हो जाता है. स्वामी रविंद्र पुरी के अनुसार जब व्यक्ति के सिर पर शिखा और कंधे पर जनेऊ है तब तक वो कर्मकांड और संसार से जुड़े हैं. लेकिन पिंडदान करते ही वो सभी प्रकार के बंधन से मुक्त हो जाता है. 

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. NMF News इसकी पुष्टि नहीं करता है

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