Advertisement
चंद्रशेखर शताब्दी वर्ष: 'समान कार्य, समान वेतन' के पुरोधा, किया ग्रामीण बैंक कर्मियों के साथ आर्थिक न्याय, सियासी अस्थिरता की चढ़ गया भेंट
जननायक, सच्चा सामजवादी, जिसने बैंकों, सार्वजनिक उपक्रमों में 'समान कार्य, समान वेतन' के सिद्धांत की वकालत की और ग्रामीण बैंक कर्मियों का कायाकल्प किया. ये राजनीति का पुरोधा इससे पहले कि दूसरे संस्थानों के लिए कुछ करता, कांग्रेस की राजनीतिक चाल की भेंट चढ़ गया.
Advertisement
देश वर्ष 2026-27 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी मना रहा है. चंद्रशेखर जी को एक ऐसे निडर बेबाक और सिद्धांतवादी राजनेता के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने हमेशा सत्ता सुख के बजाय जन सरोकारों को प्राथमिकता दी है. इस अवसर पर उनके जीवन के उस ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय को याद करना बेहद प्रासंगिक है जिसने भारत के ग्रामीण बैंकिंग ढांचे में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों को राहत की सांस दी.अपने संक्षिप्त कार्यकाल और भीषण आर्थिक संकट के बीच चंद्रशेखर ने जो फैसले लिए वे उनके अद्वितीय संकट प्रबंधन और साहस का जीवंत उदाहरण है. ग्रामीण बैंकों के लिए आर्थिक न्याय सुरक्षित करने का उनका फैसला आज भी भारतीय श्रम इतिहास में एक मील का पत्थर है.
ग्रामीण भारत की रीढ़ माने जाने वाले ग्रामीण बैंकों की स्थापना, गाँवों तक वित्तीय सेवाएँ पहुँचाने के उद्देश्य से की गई थी.लेकिन विडंबना यह थी कि इन बैंकों के कर्मचारीयों के वेतन और भत्ते व्यावसायिक बैंकों की तुलना में बेहद कम थे.जबकि कर्मचारी व्यावसायिक बैंकों के समान ही कठिन परिश्रम करते थे.
'समान कार्य, समान वेतन के पुरोधा: चंद्रशेखर'
Advertisement
समान काम समान वेतन के सिद्धांत के लिए ऑल इंडिया रिजनल रूरल बैंक इंप्लाइज एसोसिएशन के बैनर तले कर्मचारियों और अन्य विभिन्न संगठनों ने एक लंबा कानूनी संघर्ष लड़ा. अंततः सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित नेशनल इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल ने 30 अप्रैल 1990 को एक फैसला सुनाया कि ग्रामीण बैंक कर्मचारियों को उनके प्रायोजक बैंको के समकक्ष पदों के समान वेतन और भत्ते मिलने चाहिए.
Advertisement
हालाँकि, ट्रिब्यूनल के निर्णय को लागू करना आसान नहीं था. इसके लिए वित्तीय प्रभावों का आकलन आवश्यक था. इसी उद्देश्य से तत्कालीन केंद्र सरकार ने 5 अक्टूबर 1990 को नाबार्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसे ‘इक्वेशन कमेटी’ कहा जाता है. समिति ने 16 जनवरी 1991 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी.
यह वह समय था जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था. विदेशी मुद्रा भंडार चिंताजनक स्तर तक गिर चुका था और केंद्र सरकार पर भारी वित्तीय दबाव था. ऐसे वातावरण में ग्रामीण बैंक कर्मचारियों को उच्चतर वेतनमान देने के प्रस्ताव को लेकर प्रशासन और बैंकिंग तंत्र के भीतर पक्ष और विपक्ष के विभिन्न मत थे.
Advertisement
कुछ अधिकारियों और बैंक प्रबंधनों का तर्क था कि ग्रामीण बैंकों की वित्तीय स्थिति अत्यंत दयनीय और कमजोर है तथा वेतनमान में वृद्धि से अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ेगा. दूसरी ओर कर्मचारी संगठन और श्रमिक प्रतिनिधि यह मानते थे कि समान कार्य करने वालों को समान पारिश्रमिक मिलना चाहिए.
वित्तीय बोझ की जगह श्रमिक न्याय के प्रश्न को पूर्व पीएम चंद्रशेखर ने दी तवज्जो
इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार के सामने यह प्रश्न आया. राजनीतिक दृष्टि से उनकी सरकार अल्पमत में थी और कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर निर्भर थी. इसके बावजूद सरकार ने इस मुद्दे पर निर्णय लेने में विलंब नहीं किया. चंद्रशेखर का राजनीतिक व्यक्तित्व इस मायने में विशिष्ट था कि वे कठिन परिस्थितियों में भी निर्णय लेने से नहीं हिचकते थे. श्रमिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर उनकी संवेदनशीलता पहले से ही जानी जाती थी. चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को केवल वित्तीय बोझ के प्रश्न के रूप में नहीं देखा, बल्कि श्रमिक न्याय के प्रश्न के रूप में भी परखा.
Advertisement
चंद्रशेखर जी के अत्यंत करीबी सहयोगी भारत यात्रा ट्रस्ट के ट्रस्टी और लोकतंत्र सेनानी, गांधीनिष्ठ समाजवादी श्री सूर्यकुमार जी उस ऐतिहासिक दौर को याद करते हुए एक महत्वपूर्ण संस्मरण साझा करते हैं. उनके अनुसार, चंद्रशेखर जी इस नीतिगत विसंगति को दूर करने के लिए बेहद संवेदनशील थे. जैसे ही इस फैसले की फाइल उनके टेबल पर आई, उन्होंने नौकरशाही के तमाम वित्तीय तर्कों और गतिरोधों को दरकिनार करते हुए तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी. सूर्यकुमार जी बताते हैं कि चंद्रशेखर जी का विज़न केवल ग्रामीण बैंकों तक सीमित नहीं था, वे देश के अन्य सभी सार्वजनिक उपक्रमों में भी 'समान कार्य, समान वेतन' के सिद्धांत को लागू करने के लिए एक उच्च स्तरीय टीम बनाने का इरादा रखते थे.
कांग्रेस के कारण सियासी अस्थिरता का शिकार हुए चंद्रशेखर
सूर्यकुमार जी भारी मन से याद करते हुए यह भी जोड़ते हैं कि तत्कालीन कांग्रेस पार्टी द्वारा अपेक्षित राजनैतिक सहयोग न मिलने के कारण उनकी सरकार असमय चली गई और पूरे श्रमिक वर्ग को न्याय के दायरे में लाने का यह व्यापक प्रयास अधर में लटक गया. ज्ञात रहे कि इस पूरे काल में सूर्य कुमार जी भोंडसी आश्रम में रात का भोजन ज्यादातर प्रधानमंत्री के साथ ही किया करते थे और वहां पर सरकारी और राजनीतिक चर्चाएं होती रहती थी.
Advertisement
गौरतलब है कि सूर्य कुमार जी ने ही देवग्राम (बहराइच) में 'स्वाभिमान स्थल' नाम से चंद्रशेखर जी के अस्थि कलश की स्थापना कराई थी, जिसका उद्घाटन पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने किया और अध्यक्षता सांसद भगवती प्रसाद ने की. इसी सम्मेलन में सूर्य कुमार जी ने चंद्रशेखर जी को सर्वप्रथम 'जननायक' कहकर संबोधित किया, जिसके बाद यह उपाधि हमेशा के लिए उनके नाम के साथ जुड़ गई.
ग्रामीण बैंक कर्मियों के साथ चंद्रशेखर ने किया आर्थिक न्याय
22 फरवरी 1991 को केंद्र की चंद्र शेखर सरकार ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया, जिसके माध्यम से ग्रामीण बैंक कर्मचारियों के लिए प्रायोजक बैंकों के समकक्ष वेतनमान लागू करने की प्रक्रिया को स्वीकृति प्रदान की गई. बढ़े हुए वेतन का भुगतान 1 जनवरी 1991 से प्रभावी रूप से शुरू हुआ, जबकि इसके कुछ लाभों को 1 सितंबर 1987 से काल्पनिक प्रभाव के साथ मान्यता दी गई.
Advertisement
यह निर्णय केवल सरकार की पहल का परिणाम नहीं था, इसके पीछे कर्मचारियों के वर्षों के आंदोलन, न्यायालयों के हस्तक्षेप, ट्रिब्यूनल के निर्णय और विभिन्न समितियों की सिफारिशों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी. फिर भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता के दौर में चंद्र शेखर सरकार ने इस निर्णय को लागू करने का विकल्प चुना.
कॉमर्शियल बैंकों के समान ग्रामीण बैकों के कर्मियों को दिया गया समान वेतन-भत्ते
यह ऐतिहासिक निर्णय बाद के वर्षों में सेवा-शर्तों, पेंशन और श्रम अधिकारों के विवादों में एक बुनियादी संदर्भ बिंदु बना. हालांकि बाद के सुधारों के कई कारण रहे, फिर भी 1991 का यह कदम ग्रामीण बैंक कर्मियों की स्थिति मजबूत करने में मील का पत्थर माना जाता है.
Advertisement
चंद्रशेखर सरकार के इस निर्णय का महत्व ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि वर्तमान संविदा, आउटसोर्सिंग और मानदेय व्यवस्था (जैसे शिक्षामित्र, एडहॉक कर्मी) के दौर में आज भी उतना ही प्रासंगिक है.
शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभागों में समान कार्य के बावजूद नियमित और संविदा कर्मियों के वेतन, सुविधाओं व सामाजिक सुरक्षा में बड़ा अंतर है. यद्यपि सरकारें वित्तीय सीमाएं गिनाती हैं, लेकिन श्रमिक संगठन इसे श्रम न्याय के विरुद्ध मानते हैं, इसीलिए 'समान कार्य के लिए समान वेतन' का मुद्दा आज भी सार्वजनिक नीति की बहसों के केंद्र में है.
चंद्र शेखर सरकार के 1991 का यह निर्णय याद दिलाता है कि आर्थिक व प्रशासनिक चुनौतियों के बाद भी श्रमिक न्याय को नीति-निर्माण के केंद्र में रखा जा सकता है. यह उस संवैधानिक आदर्श की पुष्टि था कि श्रम का मूल्य नियुक्ति की श्रेणी से नहीं, बल्कि कार्य के स्वरूप से तय होना चाहिए.
Advertisement
ग्रामीण बैंकों की वेतन समानता का इतिहास यूनियनों, न्यायपालिका और प्रशासनिक प्रयासों के साझा संघर्ष का परिणाम है. इसमें चंद्रशेखर सरकार की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि उसने भीषण आर्थिक व राजनैतिक संकट के बावजूद इस लंबे समय से लंबित समाधान को लागू करने का ऐतिहासिक साहस दिखाया.
अतीत का स्मरण नहीं, भविष्य की श्रम नीतियों पर विचार का अवसर है चंद्रशेखर जन्मशताब्दी वर्ष
इसलिए चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी पर इस प्रसंग को याद करना केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की श्रम नीतियों पर पुनर्विचार का एक अवसर भी है.चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी पर इस ऐतिहासिक प्रसंग का स्मरण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यह हमें बताता है कि राजनीतिक नेतृत्व का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि वह समाज के मेहनतकश और अपेक्षाकृत कमज़ोर वर्गों के अधिकारों के प्रति कितना प्रतिबद्ध है. अतः ये कहा जा सकता है कि चंद्र शेखर जी वास्तव में एक ऐसे जननायक थे जिन्होंने संकट को संभाला भी और देश को परिणाम देकर बदला भी.
Advertisement
यह भी पढ़ें
लेखक:
मोहम्मद इरफान ऊर्फी
नोट: मोहम्मद इरफान ऊर्फी, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के वैचारिक विषयों के शोधार्थी एवं पेशे से फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर हैं.