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शी जिनपिंग को रिझाने चले ट्रंप को रूस ने दी दो-टूक सलाह, शांति के लिए भारत का हाथ पकड़ो, पाकिस्तान नहीं!
Iran-America: ईरान के सामने उनकी स्थिति नाजुक हो गई है. चारों तरफ से घिरे ट्रंप अब पीस डील के जरिए इस संकट को सुलझाना चाहते हैं. लेकिन इस प्रयास में उन्होंने पाकिस्तान को मीडिएटर बनाकर बड़ी चूक कर दी है.
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पश्चिम एशिया में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार गलतियों की वजह से कमजोर पड़ते जा रहे हैं. ईरान के सामने उनकी स्थिति नाजुक हो गई है. चारों तरफ से घिरे ट्रंप अब पीस डील के जरिए इस संकट को सुलझाना चाहते हैं. लेकिन इस प्रयास में उन्होंने पाकिस्तान को मीडिएटर बनाकर बड़ी चूक कर दी है.
अपने देश में महंगाई और युद्ध नीतियों को लेकर आलोचना झेल रहे ट्रंप अब चीन की ओर बढ़ गए हैं, ताकि किसी तरह अपनी साख बचा सकें. लेकिन रूस ने इस बीच उन्हें खरी-खरी सुनाई और सही रास्ता दिखा दिया. रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ब्रिक्स के मंच से साफ कहा कि अगर ट्रंप वाकई शांति चाहते हैं तो उन्हें भारत के कूटनीतिक अनुभव और मदद पर भरोसा करना चाहिए.
रूस का दो-टूक संदेश- भारत को चुनो, पाकिस्तान नहीं
सर्गेई लावरोव ने वाशिंगटन को एकदम स्पष्ट संदेश दिया है. उनका कहना है कि ईरान और अमेरिका के बीच मचे विवाद को शांत करने के लिए पाकिस्तान फिलहाल छोटी-मोटी मदद कर सकता है, लेकिन इस झगड़े का स्थायी और भरोसेमंद समाधान चाहिए तो दुनिया को भारत की ओर देखना होगा.
लावरोव के मुताबिक भारत के पास कूटनीति का पुराना और गहरा अनुभव है. यही वजह है कि भारत सबसे मजबूत और भरोसेमंद मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है. रूस ने अमेरिका को समझा दिया कि पाकिस्तान पर भरोसा करना गलत होगा. शांति के लिए भारत की साख और कूटनीतिक समझ सबसे कारगर रास्ता है.
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ट्रंप चीन क्यों पहुंचे?
इस बीच ट्रंप चीन दौरे पर भी हैं. इसके पीछे उनकी एक रणनीति है. अमेरिका में महंगाई और युद्ध की नीतियों को लेकर ट्रंप की आलोचना हो रही है .अपनी छवि सुधारने के लिए वे चीन से ऐसा समझौता करना चाहते हैं जो ईरान संकट का भी हल निकाल सके.
लेकिन उनकी बेचैनी साफ नजर आ रही है. रूस ने भी इस स्थिति को भांपते हुए अमेरिका को काम की सलाह दी कि पाकिस्तान पर भरोसा न करें, बल्कि भारत के कूटनीतिक अनुभव का सहारा लें.
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पाकिस्तान की भूमिका पर शक
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रूस का बयान सीधे पाकिस्तान की काबिलियत पर सवाल उठाता है. रूस का मानना है कि पाकिस्तान सिर्फ ‘फायर फाइटिंग’ में मदद कर सकता है, लेकिन शांति की बड़ी डील में भारत की तुलना में उसकी भूमिका सीमित है. अमेरिका में भी पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठ चुके हैं.
हाल ही में जब पाकिस्तान ने ईरानी जेट्स को नूर खान एयरबेस पर छुपाया था, तब अमेरिका को बड़ा झटका लगा था. इसका मतलब साफ है: पाकिस्तान पर भरोसा करना भारी पड़ सकता है, जबकि भारत के पास विश्वास और अनुभव दोनों हैं.
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