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सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पर घमासान, इतिहास के काले पन्नों को ढाल बनाकर चीन ने रोका जापान का रास्ता

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर चीन ने जापान की दावेदारी को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि उसका आक्रमक इतिहास उसे इस जिम्मेदारी के लायक नहीं बनाते.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 'सुरक्षा परिषद की सीटों के उचित बंटवारे और सदस्यों की संख्या बढ़ाने के मुद्दे' और सुरक्षा परिषद से जुड़े दूसरे मामलों पर अंतर-सरकारी बातचीत की. संयुक्त राष्ट्र में चीन के स्थायी प्रतिनिधि फू थ्सोंग ने अपनी आखिरी बात में दोहराया कि जापान अपने ऐतिहासिक आक्रामक कृत्यों पर पश्चाताप करने से इनकार करता है, युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय शासन को खुलेआम रौंद रहा है, दूसरे देशों की संप्रभुता में दखल दे रहा है और इलाके की शांति और स्थिरता के लिए नए खतरे पैदा कर रहा है. ऐसा देश स्थायी सदस्यता मांगने के लायक ही नहीं है. 

चीन के स्थायी प्रतिनिधि फू थ्सोंग का तीन बातों पर जोर

फू थ्सोंग ने सुरक्षा परिषद सुधार के बारे में तीन बातों पर भी जोर दिया.

  • पहला- सुरक्षा परिषद शक्तिशाली और समृद्ध देशों का 'क्लब' नहीं बन सकती. सुधार से सिर्फ बहुत कम देशों को ही फायदा नहीं होना चाहिए. 
  • दूसरा- विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व और आवाज को सच में बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे स्वतंत्र विदेश नीतियों वाले छोटे और मध्यम आकार के देशों को सुरक्षा परिषद में भागीदारी का मौका मिल सके. खास तौर पर, अफ्रीका के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को ठीक किया जाना चाहिए, और अफ्रीकी देशों की मांगों को प्राथमिकता देते हुए खास इंतजाम किए जाने चाहिए.
  • तीसरा-  सुधार को केवल वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसे एक रणनीतिक दृष्टि और लंबे समय के नजरिए से प्लान किया जाना चाहिए।

चीन क्यों कर रहा है जापान का विरोध?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में जापान की स्थायी सदस्यता को लेकर चीन का रूख बेहद सख्त और आक्रामक रहा है. चीन द्वारा जापान के विरोध के कई कारण हैं. 

  • ऐतिहासिक विवाद- चीन का आरोप है कि जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किए गए अपने सैन्य आक्रमण और अपराधों के लिए कभी दिल से माफी नहीं मांगी. 
  • ताइवान और क्षेत्रिय हस्तक्षेप- हालिया तनाव का सबसे बड़ा कारण ताइवान का मुद्दा है. जापानी नेतृत्व ने बयान दिया था कि ‘ताइवान पर संकट, जापान के लिए संकट है’. जबकि, चीन इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानता है और इसे जापान की ‘सैन्य विस्तारवादी सोच’ का हिस्सा बताता है.

क्या है चीन का कूटनीतिक तर्क?

चीन सीधे विरोध के बजाय अक्सर यह तर्क देता है कि सुरक्षा परिषद को ‘अमीरों का क्लब’ नहीं बनना चाहिए. चीन कहता है कि स्थायी सीटों के लिए अफ्रिका और विकासशील देशों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि जापान जैसे विकसित देशों को. चीन के लिए जापान का विरोध केवल पुरानी दुश्मनी नहीं, बल्कि भविष्य की एशियाई राजनीति पर नियंत्रण बनाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति है. 

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