जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

रामकाज और सामाजिक समरसता को समर्पित रहा महंत अवेद्यनाथ का जीवन, 12वीं पुण्यतिथि पर बुधवार को CM योगी की अध्यक्षता में होगी श्रद्धांजलि सभा

अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है. महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के बाद मंदिर आंदोलन की कमान महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने संभाली.

रामकाज और सामाजिक समरसता को समर्पित रहा महंत अवेद्यनाथ का जीवन, 12वीं पुण्यतिथि पर बुधवार को CM योगी की अध्यक्षता में होगी श्रद्धांजलि सभा
Image Credits: UPPRD/IANS
Advertisement

गोरक्षपीठ में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह का समापन बुधवार, 30 सितंबर को होगा। आश्विन कृष्ण चतुर्थी के अवसर पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। गोरखनाथ मंदिर स्थित महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में देशभर के प्रतिष्ठित साधु-संत और धर्माचार्य भी शामिल होंगे।

ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ का जीवन रामकाज और सामाजिक समरसता की स्थापना को समर्पित रहा। सामाजिक समरसता को अपने जीवन का ध्येय बनाने वाले महंत अवेद्यनाथ श्रीराम मंदिर आंदोलन के प्रमुख संत नेताओं में रहे। नाथपंथ की लोककल्याणकारी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के साथ राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वह पांच बार मानीराम विधानसभा और चार बार गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन को निर्णायक पड़ाव तक पहुंचाने में उनकी भूमिका के लिए उन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा। 18 मई 1919 को गढ़वाल, उत्तराखंड के ग्राम कांडी में जन्मे महंत अवेद्यनाथ जी का बचपन से ही धर्म और अध्यात्म के प्रति गहरा झुकाव था। गोरक्षपीठ में उन्हें महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज का सानिध्य मिला। 8 फरवरी 1942 को उन्होंने गोरक्षपीठ में विधिवत दीक्षा ली। वर्ष 1969 में महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की चिरसमाधि के बाद 29 सितंबर को वह गोरखनाथ मंदिर के महंत और पीठाधीश्वर बने। योग एवं दर्शन के मर्मज्ञ पीठाधीश्वर के रूप में उन्होंने अपने गुरुदेव के लोककल्याण और सामाजिक समरसता के आदर्शों को आगे बढ़ाया। वर्ष 2014 में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को चिरसमाधि लेने तक उनका यह अभियान निरंतर जारी रहा।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण रहा जीवन का प्रमुख मिशन

अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के बाद मंदिर आंदोलन की कमान महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने संभाली। नब्बे के दशक में उनके नेतृत्व में श्रीराम मंदिर आंदोलन को व्यापक स्वरूप मिला और यह आंदोलन गांव-गांव तक पहुंचा। महंत अवेद्यनाथ ने विभिन्न मत-पंथों के धर्माचार्यों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। इसी क्रम में 21 जुलाई 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ और सर्वसम्मति से महंत अवेद्यनाथ जी को इसका अध्यक्ष चुना गया। वह जीवनभर इस समिति के अध्यक्ष रहे।श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और श्रीराम जन्मभूमि निर्माण उच्चाधिकार समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संतों, राजनीतिज्ञों और आमजन को आंदोलन से जोड़ने में भूमिका निभाई। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग आगे चलकर उनके शिष्य और वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में पूर्णता तक पहुंचा।

सामाजिक समरसता को मजबूत करने के लिए चलाया अभियान

Advertisement

महंत अवेद्यनाथ ने सामाजिक समरसता को अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाया। उन्होंने हिंदू समाज में छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव को दूर करने के लिए लगातार अभियान चलाया। अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देशभर के संतों को भी इस अभियान से जोड़ा।दक्षिण भारत के मीनाक्षीपुरम में दलित समाज के सामूहिक धर्मांतरण की घटना से वह बेहद चिंतित हुए। इसके बाद उन्होंने हिंदू समाज की सामाजिक कुरीतियों और जातिगत विभाजन को दूर कर समाज को एकजुट करने पर विशेष जोर दिया।उन्होंने दलित बस्तियों में सहभोज की परंपरा शुरू की, जहां जातिगत भेदभाव से अलग सभी लोग एक साथ भोजन करते थे। काशी में डोमराजा के घर संतों और साधु समाज के साथ भोजन कर उन्होंने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों पहली शिला रखवाने को भी इसी सामाजिक समरसता के संदेश से जोड़कर देखा जाता है। दलितों और वंचितों के घर सहभोज के जरिए सामाजिक एकता का संदेश देने का सिलसिला उनके जीवनकाल में लगातार चलता रहा। सामाजिक एकता के सवाल पर महंत अवेद्यनाथ अपने स्पष्ट विचारों के लिए जाने जाते थे और अस्पृश्यता तथा सामाजिक भेदभाव के खिलाफ मुखर रहे।

श्रीराम और मां दुर्गा के उदाहरणों से समझाते थे सामाजिक एकता की ताकत

नाथपंथ और गोरक्षपीठ के अध्येता तथा महंत अवेद्यनाथ के जीवन के शोधार्थी डॉ. प्रदीप कुमार राव के अनुसार, महंत अवेद्यनाथ सामाजिक समरसता का संदेश सरल उदाहरणों के माध्यम से देते थे। वह प्रभु श्रीराम और देवी दुर्गा के प्रसंगों के जरिए समाज में एकता की ताकत समझाते थे। महंत जी बताते थे कि प्रभु श्रीराम ने शबरी के बेर खाए, निषादराज को गले लगाया, गिद्धराज जटायु का अंतिम संस्कार अपने हाथों किया और वनवास के दौरान वनवासियों से मित्रता की। उनके अनुसार, इन प्रसंगों में समरस समाज की भावना दिखाई देती है।इसी तरह वह देवी दुर्गा की आठ भुजाओं का उदाहरण देते हुए समाज के चारों वर्णों की एकता को शक्ति का प्रतीक बताते थे। उनका संदेश था कि समाज के विभिन्न वर्ग एकजुट होकर सामूहिक शक्ति का निर्माण कर सकते हैं।

Advertisement

महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को दिया व्यापक विस्तार

शिक्षा के क्षेत्र में भी महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने अपने गुरुदेव महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के प्रयासों को आगे बढ़ाया। अपनी निष्ठा, दीर्घकालीन तपस्या और अनुभव के माध्यम से उन्होंने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को व्यापक स्वरूप प्रदान किया। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अंतर्गत प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, चिकित्सा संस्थान और सेवा संस्थान संचालित हो रहे हैं। पारंपरिक शिक्षण संस्थानों के साथ तकनीकी और स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े संस्थानों में भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

राजनीति में भी रहा लंबा और प्रभावी सफर

Advertisement

यह भी पढ़ें

महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति के क्षेत्र में भी लंबा सफर तय किया। उन्होंने 1962, 1967, 1969, 1974 और 1977 में मानीराम विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर सदर संसदीय सीट से सांसद रहे। वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष और महासचिव के रूप में भी सक्रिय रहे। राजनीतिक जीवन में उन्होंने राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा, शैक्षिक पुनर्जागरण और हिंदू समाज की एकता जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह उनके धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक योगदान को स्मरण करने का अवसर होगा। गोरक्षपीठ और देशभर से जुटने वाले संत-धर्माचार्य इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
G
Guest (अतिथि)
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें