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प्राचीन मिस्र से लेकर आज तक क्या है काजल की कहानी, क्या इसे लगाना सच में खतरनाक है?

आज हम जो काजल लगाते हैं, वह सिर्फ आंखों की सुंदरता बढ़ाने का साधन नहीं है। इसका एक प्राचीन और बेहद दिलचस्प इतिहास है। क्या आप जानते हैं कि काजल का उपयोग हजारों साल पहले भी होता था? मिस्र की प्राचीन सभ्यता में 3100 ईसा पूर्व के आस-पास काजल का इस्तेमाल शुरू हुआ। लेकिन सिर्फ सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि सूर्य की हानिकारक किरणों और बीमारियों से बचने के लिए भी।

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एक तो कातिल सी नजर, ऊपर से काजल का कहर... काजल को लेकर ऐसी शायरियां तो आपने खूब सुनी होंगी। कजरारी आंखों का जादू ना सिर्फ मोहब्बत में चला बल्कि फिल्मों में भी यह हर जगह छाया रहा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह काजल, जो आंखों को इतना खूबसूरत बनाता है, उसका असली इतिहास क्या है? प्राचीन समय से काजल का इस्तेमाल सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक और औषधीय के रूप में भी किया जाता था। आज जहां काजल महिलाओं के सोलह श्रृंगार का हिस्सा है, वहीं अमेरिका जैसे कई देश इस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं? आखिर ऐसा क्या है काजल में, जो इसे खतरनाक बना रहा है? इस लेख में हम आपको काजल की प्राचीन धरोहर से लेकर आज के विवादित पहलुओं तक की कहानी बताएंगे।

काजल एक ऐसा सौंदर्य प्रसाधन है जो भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा। चाहे छोटे बच्चे हों या महिलाएं, काजल का इस्तेमाल हर घर में देखा जा सकता है। पर क्या आप जानते हैं काजल का इस्तेमाल मिस्र की प्राचीन सभ्यता में 3100 ईसा पूर्व के आस-पास शुरू हुआ था। लेकिन सिर्फ सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि सूर्य की हानिकारक किरणों और बीमारियों से बचने के लिए भी। आप सोच रहे होंगे कि कैसे, काजल जो आज भी कई घरों में एक साधारण प्रसाधन माना जाता है, वो उस समय का एक महत्वपूर्ण औषधीय उपाय कैसे था?  मिस्र की सभ्यता, जो दुनिया की सबसे पुरानी और रहस्यमयी सभ्यताओं में से एक मानी जाती है, उन्होंने सबसे पहले काजल के उपयोग की शुरुआत की थी। लगभग 3100 ईसा पूर्व में, मिस्रवासियों ने पहली बार काजल का इस्तेमाल किया। रानी क्लियोपेट्रा के चित्रों में आपको उसकी आंखों के चारों ओर गहरा काजल देखने को मिलेगा, जिसे आज भी एक ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में जाना जाता है।


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मिस्र की धूल भरी और गर्म जलवायु में, जहां सूरज की तेज किरणें आंखों पर सीधे प्रभाव डाल सकती थीं, ऐसे में काजल एक ढाल के रूप में काम किया करता था। मिस्रवासियों ने न केवल महिलाओं के लिए बल्कि पुरुषों और बच्चों के लिए भी काजल का उपयोग किया। यह सिर्फ एक सौंदर्य प्रसाधन नहीं था, बल्कि एक शक्तिशाली औषधीय उपकरण था जो कई बीमारियों से लड़ने में मदद करता था।

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काजल और सूरज की किरणों से सुरक्षा कैसे?

अब सवाल यह उठता है कि कैसे काजल सूरज की UV किरणों से सुरक्षा प्रदान करता था? प्राचीन मिस्र में, काजल को प्राकृतिक खनिजों और औषधीय तत्वों से तैयार किया जाता था। मुख्य रूप से गैलेना (ग्रे लेड सल्फाइड) और मैलाकाइट (हरा खनिज) उपयोग  करके इसे तैयार किया जाता था। इन खनिजों को पीसकर तेल या पशु वसा में मिलाकर एक पेस्ट तैयार किया जाता था। इसके बाद, इसे लकड़ी या कांसे की छड़ी से आंखों पर लगाया जाता था। गैलेना के काले, चमकदार कण आँखों को सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावायलेट (UV)  से बचाते हैं। उस वक्त प्राचीन मिस्रवासियों को यह जानकारी थी कि काजल का इस्तेमाल उनकी आंखों को सूरज की चमक से बचाने में मदद करता था। और इसलिए वो काजल की काली परत आंखों के आसपास लगाकर एक प्रतिबिंब पैदा करते थे, जो आंखों को सूर्य की तीव्र रोशनी से बचाए।

काजल लगाने के पीछे एक और कारण था, बीमारियों से सुरक्षा। प्राचीन मिस्र में यह मान्यता थी कि काजल लगाने से आंखों के संक्रमण और बीमारियों से बचाव होता है। विशेष रूप से, काजल के एंटीसेप्टिक गुण इसे एक प्राकृतिक उपचार के रूप में उपयोगी बनाते थे। जब लोग रेगिस्तान की कठोर परिस्थितियों में यात्रा करते थे, तो धूल और गंदगी के कारण आंखों में संक्रमण का खतरा अधिक होता था। काजल ने इन खतरों को कम किया और आंखों को स्वस्थ बनाए रखने में मदद की। इतना ही नहीं मिस्रवासियों ने काजल को एक धार्मिक और आध्यात्मिक उपाय के रूप में भी देखा। वे मानते थे कि काजल लगाने से उनकी आत्मा और शरीर को बुरी आत्माओं और बुरी नजर से सुरक्षा मिलती है। इसीलिए, वे बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी के लिए काजल का इस्तेमाल करते थे।

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लेकिन प्राचीन मिस्र में जिस काजल का उपयोग किया जाता था, वह आज भी वैज्ञानिक शोध का विषय बना हुआ है। वैज्ञानिकों ने पाया कि गैलेना, वास्तव में आंखों को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता था। यह एक तरह का सूरज प्रतिरोधी तत्व था, जो सूरज की UV किरणों को आंखों से दूर रखने में मदद करता था। इसके साथ ही, गैलेना में एंटी-बैक्टीरियल गुण भी होते हैं, जो आंखों को संक्रमण से बचाने में सहायक होते हैं।

अब सवाल उठता है कि जिस काजल का उपयोग हजारों सालों से किया जा रहा है, उस पर आज के दौर में क्यों प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं? दरअसल हाल ही में, अमेरिका ने काजल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है और कुछ अन्य देश भी इस दिशा में कदम उठा रहे हैं। इसका कारण है काजल में पाए जाने वाले हानिकारक तत्व। NIH (National Institutes of Health) की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई आधुनिक काजल ब्रांडों में लेड (lead) की अत्यधिक मात्रा पाई गई है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हो सकती है।


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NIH की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ काजल उत्पादों में लेड, प्रिजर्वेटिव्स जैसे पैराबेन्स, फेनॉक्सिथैनॉल और अन्य धातुएं शामिल होती हैं, जो आंखों और शरीर के अन्य हिस्सों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। वैज्ञानिकों ने अध्ययन ने यह प्रूव किया है कि लेड के संपर्क में आने से आंखों में जलन, सूजन, और लंबे समय में नेत्रहीनता तक हो सकती है। इसके अलावा, लेड के अधिक उपयोग से शरीर में इसकी मात्रा बढ़ने से कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे कि किडनी और हड्डियों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा आप एक नजर WHO की रिपोर्ट पर भी डाल सकते हैं। 


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ऐसे में आजकल डॉक्टर और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात को लेकर चिंतित हैं कि बाजार में उपलब्ध कई काजल उत्पाद हानिकारक तत्वों से भरे होते हैं, और इसलिए डॉक्टर यह सलाह देते हैं कि प्राकृतिक और शुद्ध काजल का उपयोग किया जाना चाहिए, जिसे घर पर प्राकृतिक सामग्री से बनाया जाए। आधुनिक बाजार में मौजूद रासायनिक काजल सेहत के लिए खतरा बन सकते हैं, खासकर बच्चों के लिए। इसलिए डॉक्टर आजकल इसे इस्तेमाल करने से पहले सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।


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हालांकि काजल का इतिहास और इसकी सांस्कृतिक विरासत मजबूत है, लेकिन इसके हानिकारक प्रभावों को देखते हुए भविष्य में काजल का गायब हो जाना संभव है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में इसके आयात पर प्रतिबंध लगाने से यह साफ संकेत मिलते हैं कि स्वास्थ्य और सुरक्षा के दृष्टि से इसका रिवैल्यूएशन जरूरी है। भारत और अन्य देशों में जहां काजल का उपयोग परंपरागत रूप से होता आ रहा है, वहां लोगों को अब ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता है।

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