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ISRO के बैक टू बैक मिशन फेल, क्या हुई विदेशी साजिश...NSA डोभाल का स्पेस सेंटर का गुप्त दौरा, 2 दिन तक सीक्रेट मीटिंग!
ISRO के दो फेमस स्पेस मिशन के बैक टू बैक फेल होने से मोदी सरकार के भी कान खड़े कर दिए हैं. सूत्रों के मुताबिक मोदी सरकार ने संभवत: इसी की जांच के लिए NSA डोभाल को VSSC भेजा. उनकी करीब 2 दिन तक गुप्त मीटिंग्स की भी खबर है. पूरी स्टोरी जानें.
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के भरोसेमंद रॉकेट PSLV (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) की 2025 और 2026 में लगातार दो लॉन्च विफल हो गईं. इन विफलताओं के बाद सुरक्षा चिंताओं के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल ने विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC), तिरुवनंतपुरम का दौरा किया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह दौरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर हुआ था, हालांकि इसरो ने इस दौरे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है.
ISRO की सफलता से विदेशी एजेंसियों के कान खड़े!
एक समय स्पेस टेक्नोलॉजी के मामले में संघर्ष करने वाला भारत आज इस क्षेत्र में नित नए आयाम छू रहा है और लगातार कीर्तिमान रच रहा है. इसरो ने एक के बाद एक कामयाबी, खोज और सफल प्रक्षेपणों के जरिए न सिर्फ अपना बल्कि देश का नाम एक अग्रणी स्पेस पावर के रूप में स्थापित किया है. एक ओर जहां NASA, SpaceX और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसियां महंगे स्पेस प्रोग्राम्स की वजह से दबाव में दिखती हैं, वहीं इसरो अपनी सस्ती, टिकाऊ और भरोसेमंद तकनीक के कारण दुनिया में अलग पहचान बना चुका है.
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PSLV के दो मिशन फेल, मोदी सरकार अलर्ट!
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ऐसे में देशवासियों को इसरो से हर बार सफलता की उम्मीद रहती है. लेकिन जब कोई मिशन विफल होता है, तो चिंता बढ़ना स्वाभाविक है. और जब पूरी तैयारी के बावजूद बार-बार मिशन असफल होने लगें, तो सरकार के स्तर पर भी गंभीरता बढ़ जाती है. इसी सिलसिले में मोदी सरकार को एक अहम कदम उठाना पड़ा. दरअसल महज 9 महीनों के भीतर भारत के सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV के लगातार दो मिशन असफल हुए, जिसे सरकार ने गंभीरता से लिया.
NSA अजित डोभाल का क्यों हुआ VSSC का सीक्रेट दौरा!
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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हालात को देखते हुए सरकार ने संकटमोचक माने जाने वाले NSA अजित डोभाल को सक्रिय किया. सूत्रों के अनुसार बीते दिनों अजित डोभाल ने विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर का गोपनीय दौरा किया. वे करीब दो दिन तक वहां रहे और कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिकों व अधिकारियों के साथ कई अहम बैठकें कीं. हालांकि इसरो ने इस दौरे की औपचारिक पुष्टि नहीं की है.
विदेशी साजिश की भी आशंका!
आशंका जताई गई कि ये मिशन केवल तकनीकी कारणों से ही नहीं, बल्कि किसी अन्य वजह से भी विफल हो सकते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर NSA ने यह दौरा किया और PSLV मिशनों के फेल होने में सैबोटाज यानी जानबूझकर नुकसान पहुंचाने के एंगल से भी जानकारी जुटाई गई.
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कब हुआ NSA का VSSC का यह गोपनीय दौरा
बताया जाता है कि अजित डोभाल ने 22 और 23 जनवरी 2026 को VSSC का यह गोपनीय दौरा किया. वे दिल्ली से इंडिगो की फ्लाइट से पहुंचे और इस दौरान कोई वीआईपी प्रोटोकॉल या काफिला नहीं था. उनके साथ केवल चार सादे कपड़ों में सुरक्षाकर्मी थे. दो दिनों के भीतर VSSC के निदेशक और वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ बंद कमरों में कुल छह बैठकें हुईं. यह दौरा प्रधानमंत्री के सीधे निर्देश पर हुआ था, ताकि तकनीकी जांच के साथ-साथ सुरक्षा पहलुओं की भी समीक्षा की जा सके. सूत्रों के मुताबिक NSA डोभाल अपनी रिपोर्ट जल्द ही प्रधानमंत्री को सौंपेंगे.
PM मोदी के अंदर आता है ISRO का कामकाज!
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ऐसा इसलिए कि ISRO के कामकाज पर सीधे प्रधानमंत्री की नजर आती है और ये विभाग भी सीधे प्रधानमंत्री के अंदर आता है. प्रधानमंत्री मोदी के पास ही परमाणु उर्जा, सुरक्षा और स्पेस विभाग आता है. ऐसे में इस मामलो को प्रधानमंत्री किसी कीमत पर हल्के में नहीं ले सकते. ये ना सिर्फ भारत, सरकार, इसरो बल्कि उनके लिए भी व्यक्तिगत गर्व और चिंता की बात है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसलिए प्रधानमंत्री ने अपने सबसो भरोसेमंद और NSA अजित डोभाल को एक्टिव किया है. इसरो में जासूसी के इतिहास और विदेशी दखल के कारण इसे ऐसे ही रूटीन फ्लेयोर की तरह नहीं लिया जा सकता है.
इसरो की कमेटी की दलील से संतुष्ट नहीं सुरक्षा एजेंसियां!
इसरो की फेल्योर एनालिसिस कमेटी ने दोनों विफलताओं का कारण तीसरे चरण में तकनीकी खराबी बताया, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों को यह स्पष्टीकरण पूरी तरह संतोषजनक नहीं लगा. इसी वजह से सैबोटाज की आशंका को भी जांच के दायरे में लाया गया.
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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री का अलग बयान!
हालांकि बाद में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने संसद में स्पष्ट किया कि दोनों मिशनों की विफलता के कारण अलग-अलग थे और सैबोटाज का कोई सबूत नहीं मिला. रिपोर्ट्स के मुताबिक अजित डोभाल की जांच में भी सैबोटाज की पुष्टि नहीं हुई. मंत्री ने बताया कि इसरो ने आंतरिक समितियां गठित की हैं और थर्ड-पार्टी रिव्यू भी कराया जा रहा है.
दरअसल उस समय यह चर्चा तेज हो गई थी कि कहीं जानबूझकर भारत के स्पेस मिशनों को नुकसान तो नहीं पहुंचाया जा रहा. स्पेस साइंटिस्ट डॉ. चैतन्य गिरी का मानना था कि तकनीकी गलतियों के अलावा इंडस्ट्रियल सैबोटाज की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता.
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2 फरवरी को डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर साफ कर दिया कि PSLV के दोनों मिशनों में किसी भी तरह की जासूसी या सैबोटाज का एंगल नहीं है. उन्होंने बताया कि मई 2025 के मिशन की जांच के लिए बनी फेल्योर एनालिसिस कमेटी ने PMO को रिपोर्ट सौंप दी थी, हालांकि वह सार्वजनिक नहीं की गई. जनवरी 2026 के मिशन को लेकर जांच अभी जारी है और इसमें एक बाहरी विशेषज्ञ टीम भी शामिल है. उन्होंने बताया कि PSLV का अगला मिशन जून 2026 में प्रस्तावित है और वर्ष 2026 में कुल 18 मिशन किए जाने हैं, जिनमें 6 प्राइवेट मिशन भी शामिल हैं. मंत्री का बयान मामले को डाउनप्ले करने के तहत हो सकता है कि अगर इसे हाइप दिया गया तो जांच प्रभावित हो सकती है. अंदरखाने जांच की जा रही है.
आगे की रणनीति के तहत इसरो PSLV की सुरक्षा और क्वालिटी चेक प्रक्रिया को और सख्त कर रहा है. इन विफलताओं से लगभग 2,500 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है, लेकिन इसरो का कहना है कि ये तकनीकी सबक हैं, जो भविष्य के मिशनों को और मजबूत बनाएंगे. यह घटना दर्शाती है कि स्पेस मिशन कितने जटिल और संवेदनशील होते हैं.
2025 में कैसे फेल हुआ था PSLV-C61 मिशन?
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मई 2025 में इसरो का PSLV-C61 मिशन विफल हो गया था. इस मिशन के तहत EOS-09 उपग्रह को प्रक्षेपित किया गया था. इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने बताया कि PSLV-C61 का प्रदर्शन दूसरे चरण तक सामान्य रहा, लेकिन तीसरे चरण में तकनीकी खामी के कारण मिशन पूरा नहीं हो सका. इसे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था. EOS-09 को सूर्य समकालिक ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
EOS-09 एक एडवांस पृथ्वी अवलोकन उपग्रह था, जिसमें सी-बैंड सिंथेटिक एपर्चर रडार तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. यह किसी भी मौसम और दिन-रात में हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें लेने में सक्षम था और कृषि, वन प्रबंधन, आपदा प्रबंधन व रक्षा क्षेत्रों में अहम भूमिका निभा सकता था.
PSLV-C62 मिशन भी तीसरे चरण में रहा था फेल!
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इसके बाद 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 मिशन भी तीसरे चरण में तकनीकी गड़बड़ी के कारण असफल हो गया. इस मिशन का उद्देश्य EOS-N1 उपग्रह और 15 अन्य छोटे उपग्रहों को सूर्य समकालिक कक्षा में स्थापित करना था. तीसरे चरण के अंत में रॉकेट के मार्ग में हलचल देखी गई, जिससे मिशन आगे नहीं बढ़ सका.
PSLV चार चरणों वाला रॉकेट होता है. पहला और तीसरा चरण ठोस ईंधन से संचालित होता है, जबकि दूसरा और चौथा चरण तरल ईंधन पर आधारित होते हैं. दोनों असफल मिशनों में तीसरे चरण के अंत में तकनीकी गड़बड़ी सामने आई.
PSLV लगभग 33 साल पुराना रॉकेट है, जिसे इसकी ताकत और सफलता के कारण ‘बाहुबली’ कहा जाता है. इसकी पहली विकासात्मक उड़ान 20 सितंबर 1993 को हुई थी. 2023 में PSLV ने तीन दशकों की सेवा का ऐतिहासिक मील का पत्थर पूरा किया. इस दौरान न केवल भारत बल्कि 36 देशों के 431 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाया गया.
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PSLV का उपयोग चंद्रयान-1, मंगल ऑर्बिटर मिशन, आदित्य-L1 और एस्ट्रोसैट जैसे ऐतिहासिक मिशनों में किया गया है. वर्ष 2017 में PSLV ने एक ही मिशन में 104 उपग्रह लॉन्च कर विश्व रिकॉर्ड भी बनाया था.
इसरो के पास PSLV के स्टैंडर्ड, कोर-अलोन, XL, DL और QL वेरिएंट मौजूद हैं, जिनमें अंतर मुख्य रूप से स्ट्रैप-ऑन बूस्टर की संख्या और क्षमता को लेकर होता है.
इसरो ने पिछले 10 वर्षों में विदेशी सैटेलाइट लॉन्च से 439 मिलियन डॉलर कमाए: केंद्रीय मंत्री
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15 मार्च 2025 के आंकड़े के मुताबिक इसरो ने पिछले 10 वर्षों में विदेशी सैटेलाइट लॉन्च से करीब 439 मिलियन डॉलर कमाए. इसमें घरेलू कामकाज और अन्य प्रोग्राम्स के आंकड़े शामिल नहीं हैं. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने जानकारी दी थी कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पिछले 10 वर्षों में विदेशी सैटेलाइट लॉन्च से 439 मिलियन डॉलर का राजस्व अर्जित किया है.
लोकसभा में एक लिखित उत्तर में सिंह ने कहा था कि, "जनवरी 2015 से दिसंबर 2024 तक, कुल 393 विदेशी सैटेलाइट और 3 भारतीय कस्टमर सैटेलाइट को वाणिज्यिक आधार पर इसरो के पीएसएलवी, एलवीएम3 और एसएसएलवी लॉन्च वाहनों पर लॉन्च किया गया है." केंद्रीय मंत्री ने आगे जानकारी दी थि कि इसी अवधि के दौरान विदेशी सैटेलाइट की लॉन्चिंग से सरकार द्वारा उत्पन्न विदेशी मुद्रा राजस्व लगभग 143 मिलियन डॉलर और 272 मिलियन यूरो है.
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केंद्रीय मंत्री ने बताया कि 2014 से भारत ने 34 देशों के सैटेलाइट लॉन्च किए हैं. हालांकि ये अब और बढ़ गया है. पिछले साल की समान अवधि तक कुल विदेशी सैटेलाइट में से अमेरिका की 232 सैटेलाइट हैं, जो कि सबसे अधिक है. दूसरे देशों में यूके की 83, सिंगापुर की 19, कनाडा की 8, कोरिया की 5, लक्जमबर्ग की 4, इटली की 4, जर्मनी की 3, बेल्जियम की 3, फिनलैंड की 3, फ्रांस की 3, स्विट्जरलैंड की 2, नीदरलैंड की 2, जापान की 2, इजरायल की 2, स्पेन की 2, ऑस्ट्रेलिया की 1, संयुक्त अरब अमीरात की 1 और ऑस्ट्रिया की 1 सैटेलाइट थे. केंद्रीय मंत्री ने संसद को 61 देशों में विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ इसरो के सहयोग की भी जानकारी दी थी.
ह्यूमन स्पेसफ्लाइट मिश की तैयारी में इसरो!
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सरकार ने भी इसरो की सफलता और स्ट्राइक रेट को देखते हुए भारत के ह्यूमन स्पेसफ्लाइट मिशन, गगनयान कार्यक्रम के लिए फंडिंग को बढ़ाकर 20,193 करोड़ रुपये कर दिया है. गगनयान मिशन अब 2028 तक दो क्रू स्पेस फ्लाइट संचालित करने की योजना बना रहा है. कार्यक्रम में दो क्रू और छह बिना क्रू वाले कुल आठ मिशन होंगे.