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रात के अंधेरे में धधकती चिताएं और घुंघरुओं की गूंज... काशी के महाश्मशान में क्यों नाचती हैं नगर वधुएं?

काशी के मणिकर्णिका घाट पर चैत्र नवरात्र की सप्तमी को 382 साल पुरानी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जहां जलती चिताओं के बीच नगर वधुएं बाबा मसान नाथ को नृत्यांजलि अर्पित करती हैं.

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क्या मातम के बीच भी उत्सव हो सकता है? यह सवाल काशी के मणिकर्णिका घाट पर हर साल सच साबित होता है. वाराणसी के इस महाश्मशान में, जहां 24 घंटे चिताएं जलती हैं और मोक्ष की मान्यता जुड़ी है, वहीं चैत्र नवरात्र की सप्तमी पर पिछले करीब 382 वर्षों से एक अनोखी परंपरा निभाई जा रही है. इस दिन जलती चिताओं के बीच नगर वधुएं घुंघरुओं की झंकार के साथ बाबा मसान नाथ को नृत्यांजलि अर्पित करती हैं. दुख और उत्सव का यह अद्भुत संगम काशी की सांस्कृतिक विरासत को अनोखी पहचान देता है, जहां शोक के बीच भी जीवन के उत्सव का संदेश नजर आता है. यही बुधवार को भी निभाई गई.

कब शुरू हुई परंपरा?

कथाओं के अनुसार, सैकड़ों साल पहले राजा मान सिंह ने इसी दिन महाश्मशान नाथ मंदिर का पुनः उद्धार कराया था. इस अवसर पर उन्होंने सांस्कृतिक आयोजन के लिए कई संगीतकारों और कलाकारों को निमंत्रण भेजा, लेकिन महाश्मशान में आने के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ. तब नगर वधुओं ने राजा मान सिंह से बाबा महाश्मशान नाथ को नृत्यांजलि अर्पित करने की इच्छा जताई, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. तभी से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है. इस दिन नगर वधुएं यहां नृत्य करती हैं और भगवान मसाननाथ से प्रार्थना करती हैं कि अगले जन्म में उन्हें नगर वधू का जीवन न मिले. इस अद्भुत परंपरा को देखने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं. मान्यता है कि नगर वधुओं के नृत्य से प्रसन्न होकर बाबा मसाननाथ उन्हें अगले जन्म में इस जीवन से मुक्ति प्रदान करते हैं.

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नगरवधुओं को नहीं भेजा जाता कोई निमंत्रण 

जानकारी देते चलें कि इस कार्यक्रम के लिए नगर वधुओं को किसी भी प्रकार का आमंत्रण नहीं भेजा जाता है. वे स्वयं ही यहां पहुंचती हैं और जलती चिताओं के बीच नृत्य कर अगले जन्म में मोक्ष का आशीर्वाद मांगती हैं. यह दिन ऐसा होता है जब एक तरफ चिताएं जलती रहती हैं और माहौल गमगीन होता है, तो दूसरी ओर नगर वधुओं के नृत्य से उत्साह का वातावरण बन जाता है. इस अनूठे संगम को देखने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. महाश्मशान नाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर के अनुसार, धार्मिक मान्यता है कि चैत्र शुक्ल सप्तमी के दिन जो भी नगर वधुएं यहां आकर महाश्मशान नाथ के समक्ष बाबा मसाननाथ को नृत्यांजलि अर्पित करती हैं, उन्हें अगले जन्म में इस जीवन से मुक्ति मिल जाती है.

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बताते चलें कि इस तरह काशी का मणिकर्णिका घाट एक बार फिर यह साबित करता है कि यहां जीवन और मृत्यु, शोक और उत्सव एक साथ चलते हैं. यह परंपरा न सिर्फ आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देती है कि हर अंत के पीछे एक नई शुरुआत छिपी होती है. यही काशी की पहचान है, जो इसे दुनिया से अलग बनाती है.

वाराणसी से संवाददाता शिवम गुप्ता की रिपोर्ट

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