हाईकोर्ट जज से उलझे वकील पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI बोले- आंख दिखाओगे तो हम भी...
झारखंड हाईकोर्ट के जज से तीखी बहस के मामले में एडवोकेट महेश तिवारी को सुप्रीम कोर्ट में कड़ी फटकार लगी. अवमानना नोटिस को चुनौती देने पहुंचे वकील को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चेताया और कहा कि अदालत की गरिमा से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और माफी चाहिए तो ईमानदारी से मांगी जाए.
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देश के सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने पूरे न्यायिक तंत्र की गरिमा और अदालत में वकीलों के आचरण को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी. झारखंड हाईकोर्ट के एक जज से तीखी बहस करने वाले एडवोकेट महेश तिवारी को सुप्रीम कोर्ट में जमकर फटकार लगी. यह मामला सिर्फ एक वकील और जज के बीच बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे यह सवाल भी उठा कि अदालत की सीमाएं और जिम्मेदारियां कहां तक हैं.
दरअसल, एडवोकेट महेश तिवारी के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट ने अवमानना का नोटिस जारी किया था. यह नोटिस पिछले साल 16 अक्टूबर को हुई एक सुनवाई के दौरान हुए विवाद के बाद जारी हुआ. उसी नोटिस को चुनौती देने के लिए महेश तिवारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. लेकिन यहां उन्हें राहत की जगह कड़ी चेतावनी का सामना करना पड़ा. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त लहजे में कहा कि इस तरह का व्यवहार किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति माफी मांगना चाहता है तो उसे ईमानदारी से माफी मांगनी चाहिए. अदालत ने यह भी साफ किया कि जजों को आंख दिखाने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
गलतफहमी में ना रहें
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई यह सोचता है कि सुप्रीम कोर्ट से आदेश लेकर वह खुद को बड़ा साबित कर लेगा, तो यह गलतफहमी है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर वकील झारखंड हाईकोर्ट के जज से माफी मांगते हैं, तो हाईकोर्ट को सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाना चाहिए. इससे साफ होता है कि सुप्रीम कोर्ट अनुशासन के साथ-साथ सुधार का रास्ता भी खुला रखना चाहता है.
क्या है पूरा मामला?
पूरा विवाद 16 अक्टूबर 2025 को झारखंड हाईकोर्ट में शुरू हुआ था. एडवोकेट महेश तिवारी अपनी मुवक्किल की ओर से पैरवी कर रहे थे. उनकी मुवक्किल के घर की बिजली 1.30 लाख रुपये का बकाया होने के कारण काट दी गई थी. इस पर वकील ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल 25 हजार रुपये जमा करने को तैयार हैं ताकि बिजली कनेक्शन बहाल किया जा सके. इस पर जस्टिस राजेश कुमार ने निर्देश दिया कि पहले कुल बकाया राशि का 50 प्रतिशत जमा करना होगा. इसके बाद एडवोकेट महेश तिवारी इस बात पर सहमत हुए कि उनकी मुवक्किल 50 हजार रुपये जमा करेंगी. मामला यहीं तक शांतिपूर्ण ढंग से निपट गया था. लेकिन असली विवाद तब शुरू हुआ, जब जस्टिस राजेश कुमार दूसरे मामले की सुनवाई करने लगे. उन्होंने महेश तिवारी के बहस करने के तरीके पर टिप्पणी कर दी. इसी बात पर वकील भड़क गए और उन्होंने कहा कि वह अपनी दलीलें अपने तरीके से ही पेश करेंगे, न कि जज के बताए तरीके से.
Ranchi High Court: heated argument between Judge & Lawyer.
— Shashank Shekhar Jha (@shashank_ssj) October 17, 2025
Now, Criminal contempt has been initiated against Advocate Mahesh Tiwari by full bench.
Adv Mahesh Tiwari: "I don't regret anything and everything I said was said in full conscious state".
pic.twitter.com/4p9CBh0iI6
झारखंड बार काउंसिल के अध्यक्ष भी सुनवाई में रहे मौजूद
इस दौरान झारखंड बार काउंसिल के अध्यक्ष भी कोर्ट में मौजूद थे. जज ने उनसे वकील के आचरण पर संज्ञान लेने को कहा. इसके बाद माहौल और गरमा गया. एडवोकेट महेश तिवारी अपनी सीट से खड़े हुए और जज से कहा कि वकीलों को दबाने की कोशिश न की जाए और सभी अपनी हद में रहें. वकील ने यह भी कहा कि वह 40 साल से वकालत कर रहे हैं और अपने अनुभव के आधार पर बहस करने का पूरा अधिकार रखते हैं. उन्होंने यहां तक कह दिया कि न्यायपालिका की वजह से देश में आग भड़क रही हैं. इस बयान को अदालत की गरिमा के खिलाफ माना गया. मामला बढ़ने पर झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने एडवोकेट महेश तिवारी के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कर दिया. यही नोटिस बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का कारण बना.
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बताते चलें कि यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि अदालत में स्वतंत्रता और अनुशासन के बीच संतुलन कितना जरूरी है. वकील न्याय के स्तंभ हैं, लेकिन न्यायपालिका की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितने ही अनुभवी क्यों न हों.
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