नीरजा से स्मित तक...साल बदले, पर नहीं बदला भारतीयों का जज्बा! आसमान में देश का इकबाल बुलंद करने वाले भारत के दो नगीने
वक्त बदला, साल बदले और बदल गए हालात, लेकिन जो नहीं बदला, वो है आसमान का सीना चीरकर देश का मान बढ़ाने वाले भारतीयों का जज्बा! नीरजा भनोट से लेकर स्मित तक, कहानी उन दो नगीनों की भारत का इकबाल बुलंद कर दिया.
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हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ता विमान जब अचानक संकट में घिरता है तो दिमाग काम करना बंद कर देता है. यात्रियों के पास सोचने के लिए बहुत कम समय होता है. ऐसे वक्त में विमान के पायलट और चालक दल का एक फैसला सैकड़ों जिंदगियों का भविष्य तय कर सकता है. स्मित मच्छार और नीरजा भनोट दो ऐसे ही नाम हैं जिन्होंने जान पर खेलकर दुनिया को इंसानियत का पाठ पढ़ाया. ये नहीं देखा कि लोग अपने हैं या पराए! याद रखा तो सिर्फ कर्तव्य और मानव सेवा का मर्म. 1986 की नीरजा भनोट के शौर्य से लेकर 2026 में कैप्टन स्मित मच्छार की जांबाजी तक, दो पीढ़ियों के ये दो नाम भारत के इकबाल में चार चांद लगाते हैं. शुरुआत भनोट से! 5 सितंबर 1986 को पैन एम की फ्लाइट 73 कराची एयरपोर्ट पर आतंकवादियों ने हाईजैक कर ली थी. विमान में सैकड़ों यात्री सवार थे और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी. उस समय विमान की वरिष्ठ फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने असाधारण साहस का उदाहरण पेश किया.
भारत के दो नगीने नीरजा और स्मित
कॉकपिट क्रू के विमान से निकल जाने के बाद यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी नीरजा और उनके सहयोगियों पर आ गई थी. नीरजा ने आतंकवादियों की मांग के अनुसार यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा किए, लेकिन अमेरिकी नागरिकों की पहचान छिपाने के लिए कई पासपोर्ट अलग कर दिए. जब हालात बिगड़े और विमान के अंदर गोलीबारी शुरू हुई तो उन्होंने यात्रियों को आपातकालीन निकास की ओर जाने में मदद की.
इस दौरान नीरजा ने बच्चों और दूसरे यात्रियों को बचाने की कोशिश की. वह खुद आतंकवादियों की गोली का शिकार हुईं और उनकी मौत हो गई. भारत सरकार ने उनके साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया. अपने-पराए का भेद मिटा अदम्य साहस दिखाने वाली नीरजा को पाकिस्तान ने भी सम्मानित किया. उन्हें मरणोपरांत 'तमगा-ए-इंसानियत' से नवाजा गया.
समय बदला, जमाना बदला लेकिन अगर कुछ नहीं मिला तो भारतीयों के हर परिस्थिति में कुछ कर गुजरने का जज्बा. करीब चार दशक बाद विमानन जगत में एक और ऐसी घटना घटी, जिसमें एक भारतीय पायलट ने जान पर खेलकर 174 लोगों की जिंदगियां बचाने में अहम योगदान दिया.
जान पर खेलकर इंसानियत को जिंदा रखने वाले नीरजा और स्मित की कहानी
भारत के सीने पर 30 सितंबर 2026 का दिन खुरच कर लिख दिया गया है. इसी दिन फ्लाईदुबई की दुबई-तेल अवीव उड़ान के दौरान कॉकपिट में एक गंभीर हिंसक वारदात हुई. भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर साथी पायलट ने कथित तौर पर चाकू से हमला किया. गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद स्मित ने विमान और उसमें सवार यात्रियों की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी नहीं भूली.
बाद में यात्रियों की मदद से बड़ा विमान हादसा टाल दिया गया. घटना के बाद विमान का रुख बदला गया और उसे सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतारा गया. स्मित को अस्पताल ले जाया गया और उनकी स्थिति स्थिर बताई गई.
नीरजा और स्मित ने अपने-पराए का भेद मिटाया
नीरजा और स्मित की घटनाओं में करीब 40 साल का अंतर है. परिस्थितियां भी बिल्कुल अलग थीं. नीरजा के सामने हथियारबंद अपहरणकर्ता थे, जबकि स्मित का दुश्मन उनका साथी पायलट ही था. लेकिन दोनों घटनाओं में एक बात समान रही: 'संकट की घड़ी में दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना और अपना कर्तव्य.'
जिंदगी की जंग हार कर भी इंसानियत को जिता गई थीं नीरजा भनोट!
नीरजा की कहानी बलिदान की कहानी बन गई. वह यात्रियों को बचाते हुए खुद अपनी जिंदगी हार गईं. स्मित की कहानी में भी खतरा उतना ही वास्तविक था, लेकिन वह विमान को सुरक्षित उतारने और यात्रियों की जान बचाने के बाद इलाज के लिए अस्पताल पहुंच सके.
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इन घटनाओं की खासियत यह भी है कि इनमें बहादुरी किसी युद्धक्षेत्र में नहीं दिखाई गई. एक विमान के भीतर, सीमित जगह और संकटकाल में लिए गए त्वरित निर्णयों ने इन भारतीयों को यादगार बना दिया.