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क्या आप जानते हैं भारतीय समझी जाने वाली कई सब्जियां और फल असल में विदेशी हैं? जानें इनके भारत पहुँचने की कहानी
भारत में सदियों से चले आ रहे व्यापारिक संबंधों, कोलोनियल रूल और इस तरह की कई परिस्थितियों ने इस देश को नए खाने की चीज़ों से परिचित कराया। पहले के समय में सिल्क रोड और समुद्री मार्गों के जरिए बाहर से व्यापारी अपने साथ नए फल और सब्जियां लेकर आए। कई exotic पौधे उस समय केवल शाही बागानों या तटीय बंदरगाहों तक ही सीमित थे, लेकिन आज वो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
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जब Indian cuisine की बात होती है तो दिमाग में स्वादिष्ट मसालों, कई प्रकार की सब्जियों और फसल की तस्वीर आ जाती है। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी की हमारी रसोई में इस्तेमाल होने वाली ज़्यादातर चीज़ें असल में विदेशी मूल की हैं।
भारत में सदियों से चले आ रहे व्यापारिक संबंधों, कोलोनियल रूल और इस तरह की कई परिस्थितियों ने इस देश को नए खाने की चीज़ों से परिचित कराया। पहले के समय में सिल्क रोड और समुद्री मार्गों के जरिए बाहर से व्यापारी अपने साथ नए फल और सब्जियां लेकर आए। कई exotic पौधे उस समय केवल शाही बागानों या तटीय बंदरगाहों तक ही सीमित थे, लेकिन आज वो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
तो आज हम जानेंगे कुछ ऐसे उपज के बारे में जिन्होंने बाहर से आकर हमारे भोजन को एक नया स्वाद दिया।
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भारतीय रसोई की जान बने ये विदेशी मेहमान
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हमारी रसोई में रोज़ाना इस्तेमाल होने वाली कुछ सब्जियां मूल रूप से दूसरे महाद्वीपों में उगी थीं जैसे आलू, टमाटर, मिर्च और पत्तागोभी। अमेरिका और यूरोप से आने वाली ये सब्जियां भारतीय मिट्टी और जलवायु में इतनी अच्छी तरह से घुल मिल गई की आज इनके बिना खाना बनाना अधूरा सा लगता है।
ये फल भी हैं विदेशी मूल के
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अनानास, पपीता, काजू, अमरूद और शरीफा या सीताफल जैसे फल मूल रूप से भारत के नहीं थे। पुर्तगाली और अन्य यूरोपीय व्यापारियों के ज़रिए ये फल भारत पहुंचे। भारत के tropical और तटीय क्षेत्रों में ये पौधे बेहद अच्छी तरह से ढल गए। आज pineapple चटनी हो, पपीते का सलाद हो या काजू की मिठाइयां, यहाँ की पसंदीदा चीज़ों में से एक मानी जाती है।
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कॉफी और अरंडी जैसी फसलें भी बाहर की देन हैं। इन फसलों ने भारतीय किसानों को वैश्विक व्यापार नेटवर्क से जोड़ दिया। कई फसलों को भारत में औद्योगिक जरूरतों के लिए भी लाया गया। अरंडी और कुछ अन्य तेल की फसलों को उनके medicinal properties की वजह से प्रोत्साहन मिला। यमन जैसे क्षेत्र से आने वाली कॉफ़ी के उत्पादन को 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासकों ने दक्षिण भारत की पहाड़ियों पर बहुत आक्रामक तरीके से बढ़ावा दिया। जिस वजह से कुर्ग और वायनाड जैसे क्षेत्र कॉफी उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में उभरे।