‘गीली लकड़ी में मत जलाना...’ नाना पाटेकर ने क्यों जमा कर रखी थीं 12 मन लकड़ियां? वजह जानकर हो जाएंगे हैरान
Nana Patekar RIP: एक इंटरव्यू में नाना पाटेकर ने अपनी मौत और अंतिम संस्कार को लेकर खुलकर बात की थी. उन्होंने कहा था कि उन्हें पता है कि एक दिन इस दुनिया से जाना है और इसलिए उन्होंने अपनी चिता के लिए लकड़ियों का इंतजाम तक कर रखा है.
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Nana Patekar: नाना पाटेकर उन कलाकारों में गिने जाते हैं, जिनकी पहचान सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही. दमदार अभिनय, थिएटर से गहरा जुड़ाव, किसानों के लिए काम और देश के जवानों के प्रति सम्मान- उनकी जिंदगी के कई ऐसे पहलू हैं, जो उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाते हैं. लेकिन उनकी शख्सियत का एक और पहलू बेहद दिलचस्प था. नाना पाटेकर मौत को जिंदगी का अटल सच मानते थे और उन्होंने अपने अंतिम सफर के बारे में भी काफी पहले से सोच रखा था.
‘मेरी 12 मन लकड़ियां रखी हुई हैं’
सितंबर 2023 में दिए एक इंटरव्यू में नाना पाटेकर ने अपनी मौत और अंतिम संस्कार को लेकर खुलकर बात की थी. उन्होंने कहा था कि उन्हें पता है कि एक दिन इस दुनिया से जाना है और इसलिए उन्होंने अपनी चिता के लिए लकड़ियों का इंतजाम तक कर रखा है. उन्होंने कहा था कि “मुझे मृत्यु पर भरोसा है. मुझे 12 मन लकड़ी लगने वाली है, यही मेरी फाइनल प्रॉपर्टी है.. इसके साथ ही मैं चला जाऊंगा. मैंने अपनी 12 मन लकड़ियां रखी हुई हैं. वो सूखी हैं, उसी में मुझे जलाना."
‘गीली लकड़ी मत इस्तेमाल करना...’
नाना की बात करने का अंदाज भी बिल्कुल उनके जैसा ही था, गंभीर बात में भी हल्की-सी मुस्कान और जिंदगी की सच्चाई को बेहद सीधे तरीके से कह देना. उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा था कि अंतिम संस्कार के समय गीली लकड़ी का इस्तेमाल न किया जाए, क्योंकि उससे धुआं निकलेगा और वहां मौजूद लोगों की आंखों में पानी आ जाएगा. फिर उन्हें यह गलतफहमी हो सकती है कि लोग उनके लिए रो रहे हैं. नाना का कहना था कि कम से कम मरते वक्त ऐसी गलतफहमी नहीं होनी चाहिए.
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‘मुझे पूरी तरह भूल जाना’
नाना पाटेकर का जिंदगी को लेकर नजरिया काफी बेबाक था. उनका मानना था कि इंसान के जाने के बाद कुछ समय तक लोग उसे याद करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे जिंदगी आगे बढ़ जाती है. उन्होंने कहा, “आप मर जाओगे, कल को कोई आपको दो-चार दिन बाद याद नहीं करेगा. मैंने तो कह दिया है, मेरी तस्वीर भी मत लगाओ. पूरी तरह भूल जाओ. वो बहुत जरूरी है..” नाना सात भाई-बहनों में से थे और उन्होंने अपने परिवार के कई सदस्यों को अपने सामने खोया था. शायद इसी वजह से मौत और जिंदगी की नश्वरता को लेकर उनकी सोच इतनी गहरी थी.
फिल्मों से आगे थी नाना की पहचान
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर है. उन्होंने थिएटर से अभिनय की शुरुआत की और बाद में हिंदी व मराठी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई. ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी याद किए जाते हैं. उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.
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अभिनय के अलावा नाना सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे. किसान और ग्रामीण मुद्दों पर काम करने के लिए उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की स्थापना की. यही वजह है कि नाना पाटेकर को सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जमीन से जुड़े इंसान के रूप में भी याद किया जाता है.