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विजयादशमी पर इस तरह करें दुर्गा विसर्जन, जानें शुभ मुहूर्त, सिन्दूर खेला और बंगाल की खास परम्परा

जहां मां दुर्गा का आगमन 22 सितंबर को हुआ था, वहीं अब उनकी विदाई 1 अक्टूबर को की जाएगी. पंडालों से मां दुर्गा की मूर्ति और कलशों का विसर्जन गुरुवार के दिन मां के फिर आने की कामना के साथ किया जाएगा. ऐसे में शुभ मुहूर्त, बंगाल की खास परंपरा और सिन्दूर खेला के बारे में जरुर जानें.

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01 Oct 2025
( Updated: 10 Dec 2025
12:05 PM )
विजयादशमी पर इस तरह करें दुर्गा विसर्जन, जानें शुभ मुहूर्त, सिन्दूर खेला और बंगाल की खास परम्परा
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इस बार माँ दुर्गा का आगमन जहाँ 22 सितंबर को हुआ, वहीं अब पंडालों में रखी गई मूर्तियों और घरों में स्थापित कलश का विसर्जन विजयदशमी पर होने जा रहा है. पश्चिम बंगाल में देवी दुर्गा के इस दिन का पूरे विधि-विधान के साथ विसर्जन किया जाता है. इस दिन माँ को विदा कर उनके फिर आने की कामना की जाती है. तो आइए जानते हैं इस दिन दुर्गा विसर्जन के शुभ मुहूर्त, सिंदूर खेला और विधि के बारे में…

किस मुहूर्त में करें दुर्गा विसर्जन? 

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इस बार दुर्गा विसर्जन का शुभ मुहूर्त सुबह 06:15 मिनट से शुरू होकर सुबह 08:37 मिनट तक है. इस 2 घंटे 22 मिनट के अंतराल में आप दुर्गा विसर्जन कर सकते हैं. यह समय काफी शुभ रहेगा. इसके अलावा आप दुर्गा विसर्जन दशमी तिथि को श्रवण नक्षत्र, यानी सुबह 9:13 से लेकर शाम तक कर सकते हैं. 

दुर्गा विसर्जन में बन रहे शुभ योग 

इस बार दुर्गा विसर्जन के दौरान रवि योग और सुकर्मा योग बन रहे हैं. सुकर्मा योग सुबह से लेकर रात 11:29 तक रहेगा. वहीं रवि योग पूरे दिन रहेगा. इस दौरान माँ दुर्गा पालकी में विदा होंगी. माता का पालकी में विदा होना बहुत शुभ माना जाता है. पालकी में माँ का विदा होना लोगों के लिए सुख और समृद्धि लाएगा. 

बंगाल का प्रसिद्ध दुर्गा विसर्जन 

वैसे तो दुर्गा विसर्जन धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन बंगाल का दुर्गा विसर्जन बहुत प्रसिद्ध है. यह दिन सिर्फ माँ की विदाई के नजरिए से खास नहीं होता, बल्कि इसमें लाखों भक्तों की भक्ति भी समाहित होती है. इस दौरान भक्त शुभकामनाएँ देते हुए विदा के साथ माँ के फिर आने की कामना भी करते हैं. 

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बंगाल में सिंदूर खेला का महत्व 

सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है. इसलिए माँ दुर्गा को सुहागिन का रूप मानकर उन्हें सिंदूर लगाकर उनकी विदाई की जाती है. मान्यता है कि इसके बाद माँ अपने मायके से वापस अपने ससुराल, यानी कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करती हैं. ऐसा करने से सभी महिलाओं को माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है. 

सिंदूर खेला सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि एकता का भी प्रतीक

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बंगाल के अलावा अब सिंदूर खेला को कई हिस्सों में मनाया जाता है. कई जगहों पर इसे बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. क्योंकि अब यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान भी बन चुकी है. साथ ही महिलाओं का सिंदूर खेला एक साथ खेलना एक-दूसरे के प्रति प्रेम और एकजुटता को भी दर्शाता है.

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